बापू , आज डर लगता है!

अरविन्द मोहन
आज हम न सिर्फ झूठ के प्रयोग करने लगे हैं, बल्कि झूठ का प्रयोग करने वालों को नेता भी मानने लगे हैं
आज हम न सिर्फ झूठ के प्रयोग करने लगे हैं, बल्कि झूठ का प्रयोग करने वालों को नेता भी मानने लगे हैं

अरविन्द मोहन
जिसे तुमने पाप, अन्याय, उत्पीड़न बताया, आज उसका चारों ओर बोलबाला है

वे दूर देश भारत के धोती पहनने वाले एक बुजुर्ग थे। फिर भी जब उनकी मौत हुई, तब पूरी मानवता रो पड़ी    - -लुई फिशर

दक्षिण अफ्रीका में 7 जुलाई 1893 को तुम्हें जब पीटर मारिट्जबर्ग स्टेशन पर रेलगाड़ी से फेंका गया, उस दिन तुमने एक बड़ा संकल्प किया था। लेकिन वह दिन गोरी हुकूमत के नाश की शुरुआत का नहीं, बल्कि एक नई दुनिया बनाने या बिगड़ी दुनिया को पटरी पर लाने की तुम्हारी मुहिम की शुरुआत है। तबसे हत्या तक के चौवन-पचपन वर्षों में तुमने क्या किया, उसका मूल्यांकन आज भी जारी है और तुम्हारे काम पर पानी फेरने का अभियान भी जारी है। खास बात यह है कि तुमने कभी यह दावा नहीं किया कि तुमको कोई इल्हाम हुआ है, कोई प्रेरणा आई है। तुमने यह भी नहीं जताया कि तुम अपना, बा का, अपने बच्चों का, मगनलाल-छगनलाल जैसे भतीजों और मनु गांधी जैसी न जाने कितने रिश्तेदारों से लेकर हजारों करीबियों का जीवन अपनी मुहिम में झोंककर किसी पर कोई एहसान नहीं किया। तुमने यह भी नहीं जताया कि तुम कुछ खास कर रहे हो। सब कुछ तुम्हारा, तुम्हारे आसपास के लोगों का, देश-समाज का, इसी दुनिया का था। सत्याग्रह भी, अहिंसा भी,  त्याग-निर्भयता भी, व्यक्ति तैयार करने का तरीका भी, अन्याय दूर करने का तरीका भी, सब कुछ ‘स्वराज’ की वापसी का अभिक्रम था। स्वराज हासिल करना ही सर्वोच्च ध्येय था।

1909 में हिन्द स्वराज लिखने के बाद तुमको उसमें बदलाव की जरूरत नहीं लगी। तुमने सत्य को ऊपर रखा, सभी धर्म और अच्छे लोग ऐसा करते रहे हैं लेकिन तुमने ‘ईश्वर सत्य है’ की जगह ‘सत्य ही ईश्वर’ कहा। अहिंसा का पाठ महात्मा बुद्ध और महावीर के देश में क्या बताना था, लेकिन तुमने अहिंसा को अभ्यास से साधने और सामाजिक अन्याय दूर करने का साधन बना दिया। अहिंसा को गरीबों का हथियार बनाने के लिए तुमने उसका ‘प्रशिक्षण’ शुरू किया और प्रशिक्षण का मूल तत्व निर्भय होना बना दिया, जिसका प्रयोग तुमने खुद पर किया था। चंपारण में तुमने डर दूर करने का अपने उदाहरण से भी ज्यादा प्रभावी तरीका अपनाया। तुमने दक्षिण अफ्रीका में ही यह ‘इंजीनियरिंग’ शुरू की थी। धर्मपाल जी जैसे अनेक इतिहासकार यह बता रहे हैं कि सत्याग्रह का यह हथियार भी भारतीय समाज के लोग और कई समूह अपनाते रहे हैं। तुमने उसे राजनैतिक-सामाजिक अन्याय दूर करने का प्रभावी हथियार बना दिया।

चंपारण प्रयोग से निकलीं तीनों बातें-सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह दूर तक प्रभाव छोड़ने वाले साबित हुईं तो इसलिए कि लोगों से डर निकालने का तुम्हारा तरीका न सिर्फ दिलचस्प था बल्कि बहुत सरल था। उससे आई ‌निडरता ने चंपारण के खौफ और तिनकठिया प्रणाली का अंत ही नहीं किया बल्कि पूरे देश और दुनिया से तब की सबसे बड़ी बुराई उपनिवेशवाद के खात्मे की शुरुआत हो गई। तुमने अंग्रेजों से नहीं, उनके शोषण से नफरत का जो नारा बुलंद किया, वह कुछ अंग्रेजों को भी पसंद आया। तभी तो नील की खेती खत्म करने के लिए बने आयोग में आए निलहों के संघ के प्रतिनिधि ने लगभग हर बात में तुम्हारा समर्थन किया (जिसके लिए उसे अपने एसोसिएशन से डांट पड़ी)।

तुम्हारे सबसे प्रमुख शिष्यों में एक लोहिया का कहना था कि बीसवीं सदी गांधी और एटम बम के लिए जानी जाएगी। अब महत्वपूर्ण यह है कि बम की विनाशलीला देख-जानकर भी दुनिया में नागाशाकी-हिरोशिमा वाले बमों से भी हजार गुना ज्यादा विनाशक बम बनाते जा रहे हैं और बम की धमकियां भी रोज-ब-रोज सुनाई देने लगी हैं। बम सिर्फ हेनरी ट्रूमैन (अमेरिका) ही नहीं चलवा सकते थे, अब इमरान खान (पाकिस्तान) और किम जोंग उन (उत्तर कोरिया) भी चेतावनी और धमकियां दे रहे हैं। मूर्खता का यह हाल है कि सबसे ज्यादा बमों के जखीरे पर बैठा (डोनाल्ड) ट्रम्प (अमेरिका) कहता है कि मेरे बटन का आकार तुम्हारे बटन से (किम के कोरिया के बमों से) ज्यादा बड़ा है।

 बापू, तुम्हारा नाम और काम याद करने वाले, उसकी प्रेरणा से अपने आसपास के अन्याय का अहिंसक प्रतिकार करने वाले, दुनिया और प्रकृति को बचाए रखने वाले आंदोलन कम नहीं हो रहे हैं, लेकिन वे प्रवृत्तियां अपने मुल्क से लेकर सारी दुनिया में तुम्हारे जाने के बाद से मजबूत होती गई हैं, जिसके खिलाफ तुमने अपना और अपनों का जीवन खपा दिया। और हम तुम्हारा नाम जपते-जपते ऐसे नमूनों को अपना नेता चुनते जा रहे हैं जिनका नाम लेने में भी शर्म आए। आज दुनिया के करीब आधा दर्जन प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के मुखिया ऐसे लोग हैं जो उन सारे मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो हर तरह से इस दुनिया और मानवता के खिलाफ हैं।

विडंबना यह है कि इनको उसी लोकतंत्र के माध्यम से चुना गया है जिसे अब तक के इतिहास की सबसे काबिल शासन व्यवस्था माना जाता है। अब लोगों को हत्यारों, बाजार से भारी मुनाफा और लूट के जरिए अमीर बने तथा हर किस्म के कुकर्म के नामी इन ‘महापुरुषों’ का चुनाव करते कोई शर्म नहीं आती। और लोकतंत्र में जनादेश पाकर ये हिटलर-स्टालिन को भी पीछे छोड़ने में कोई झिझक नहीं दिखाते।

 बापू, तुम तो निलहों के अत्याचार की कहानी सुनकर चंपारण चले गए थे, आज तीन लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या के बाद कोई आर्थिक नीति बदलने की बात नहीं करता, और कोई नया चंपारण सत्याग्रह करने वाला भी नजर नहीं आता। क्या इसके बाद आने वाली मंदी, अकाल और महामारियों के दौर में अब दुनिया के गरीब पटपटाकर मरेंगे (जिसकी झलक चमकी बुखार, कालाहांडी-पलामू में दिखने लगी है) और तब भी हमारे मंत्री क्रिकेट का स्कोर पूछेंगे, विधानसभा में बैठकर पोर्न देखने वाले को उप-मुख्यमंत्री बनाया जाएगा।

  बापू, 1942 में लुई फिशर के इंटरव्यू में तुमने कहा था कि अंग्रेजों को देश से निकालने का खयाल तुम्हें पहली बार चंपारण में ही आया था। तुमने यह बात पच्चीस साल मन में छुपाए रखी। फिर यह भी समझ आया कि तुमने किस आसानी से खादी और चरखे के लिए इतिहास को डेढ़-दो सौ साल पीछे कर दिया। मैनचेस्टर कि सबसे आधुनिक मिलों को पीटने के बाद वहां जाकर बेकार हुए मजदूरों को भी समझा दिया कि आपकी बेकारी हमारे गरीब बुनकरों से बेहतर है। फिर यह भी समझ आया कि तुम क्यों आजादी के दिन दिल्ली की जगह नोआखाली में थे। असल में तुम्हारी प्राथमिकताओं को सामान्य काल और दुनियादारी की गिनती से नहीं समझा जा सकता। तुम बकरी की टांग टूटने पर उसे अपना पहला काम बना सकते थे। तुम्हें यह भरोसा भी था कि आज जिन्ना की जिद के आगे मुल्क भी बांटकर चैन आए तो कर लो, फिर इस बंटवारे को भी मिटाया जा सकता है। तुम कस्तूरबा का प्रसव कराने से लेकर अपने साथ के किशोरियों को मासिक-धर्म के समय साफ-सफाई रखने का पाठ पढ़ा सकते थे। तुम्हारे लिए सौ-दो सौ साल का कालखंड भी प्रयोग का मैदान था और आधी दुनिया के मालिक, ब्रिटिश साम्राज्य को औकात दिखाना भी। तुमको दूसरों का पखाना साफ करने में शर्म नहीं आती थी और लंबी-चौड़ी भाषणबाजी छोड़कर चरखा चलाना जरूरी लगता था। तुमने सही अर्थों में डर पर जीत हासिल कर ली थी, पर तुम लोक-लाज से सबसे ज्यादा डरते भी थे-गरीब की कमजोर की आवाज से डरते थे। ऐसी आवाज सुनने वाले शासनतंत्र को ही रामराज्य मानते थे, उसे ही स्वराज कहते थे।

 ऐसा नहीं है कि तुमने जो चाहा कर लिया, अपनी ‘फौज’ से जो चाहा करा लिया। ऐसा होता तो तुम क्यों बार-बार स्वतंत्रता आंदोलन को भी आगे-पीछे करते रहे, दो बार घोषणा करके और अपने बनाए आश्रमों-साबरमती और सेवाग्राम का भी त्याग करते रहे। सवा सौ साल जीने की इच्छा जाहिर करके मरने की बात करने लगे।

 आज डर लगता है कि तुम अपने स्वराज की, पश्चिम की शैतानी सभ्यता के खिलाफ की लड़ाई, अपने समाज को बुराइयों से मुक्त करने और मजबूत करने की, एक टिकाऊ और विकेंद्रित विकास के मॉडल को (जिसका स्वरूप तुमको हिंदुस्तान के गांवों में दिखता था, जबकि जवाहरलाल जी और बाबा साहब को गांव जहालत और सामंतवाद का अड्डा लगते थे) आगे बढ़ाने की बात करते थे। यह तुम्हारी प्राथमिकता में दक्षिण अफ्रीका से ही आ गया था। वह आज पीछे छूट रहा है। उसकी याद विश्व व्यापार संगठन का विरोध करनेवालों को, टिकाऊ विकास का विकल्प तलाशने वालों को, संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (जिसे पहले मिलेनियम डेवलपमेंट गोल कहा गया था) को तो आती है लेकिन अमेरिका-यूरोप के शासकों को ही नहीं। गरीब देशों के शासन करने वालों को एकदम नहीं आती। तुम्हारे चरखे के सामने नंगे पीठ चरखा चलाते बैठकर तस्वीर खिंचाने वाले न कहीं हत्या कराने से बाज आते हैं, न दिन में दस बार कपड़े बदलकर नाटक करने से। कोई अपनी दरिद्रता का दिखावा करता है तो कोई अपनी संपन्नता की नुमाइश, लेकिन सबके सोच-समझ और नीतियों की दिशा एक ही है-तुम्हारी बताई दिशा से उल्टी।

बापू, तुमने जिस समाज को अपनी अच्छाइयों को बढ़ाकर बड़े लक्ष्य हासिल करने की ओर प्रेरित किया, आज वही समाज फिर दलितों के उत्पीड़न में, अल्पसंख्यकों की पिटाई में, औरतों पर अत्याचार में मर्दानगी महसूस करने लगा है। तुम पर तो अपने जमाने में भी काफी हमले होते रहे हैं, लेकिन आज तुम्हारा पूरा नाम न जानने वाले, एक किताब न पढ़ने वालों को भी तुम्हारे ‘सेक्स लाइफ’ और ‘गलत फैसलों’ की ऐसी-ऐसी जानकारी सोशल मीडिया से हासिल है कि तुम खुद भी हैरान हो जाओगे। जो संघ परिवार तुम्हें ‘प्रात:स्मरणीय’ कहता है, उसी के दफ्तरों और लोगों के बीच गोडसे और हिटलर की किताबें सबसे ज्यादा बिकती हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि जब तुमको इतना ‘नीच, घटिया और बुरा’ बता दिया जाए, तो तुम्हारे कामों पर पानी फेरना आसान हो जाएगा। तुमको सिर्फ सेक्स मैनियाक और स्वार्थी ही नहीं बनाया जा रहा है, बाबाओं और माताओं से प्रभावित हिंदू बताया जा रहा है, गुजराती बताया जा रहा है। खुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बताने वाला तुमको खुलेआम गुजराती चालाक बनिया बता रहा है क्योंकि वह खुद भी गुजराती बनिया है।

और तो और, जिस पार्टी को तुमने आसमान पर चढ़ाया और जो आज भी तुम्हारी विरासत की सबसे बड़ी दावेदार है, उसका अध्यक्ष खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण बताने और मंदिर-मंदिर पूजा करते घूमने को कुशल रणनीति मानता है। तुम्हारे नाम पर बने मठों में रहने वाले कितने लोग अब किसी भी अर्थ में गांधी के अनुयायी रह गए हैं, अन्याय के प्रतिरोध को सर्वोच्च मूल्य मानते हैं, तुम्हारे एकादश व्रतों पर चलते हैं, उन्हें उंगलियों पर भी गिना जा सकता है। उन्होंने शहद चाटना और पपीता खाने का तुम्हारा गुण तो सीख लिया लेकिन परीक्षा के हर बडे़ अवसर पर वे बहाने बनाकर संघर्ष से मुंह फेर लेते हैं। कोई अजित सिंह मंत्री बनता है तो सारे खादी संस्थानों में उसके लोग आ जाते हैं, कोई संघ वाला आया तो सब संघी हो गए। बड़े नामी गांधीवादी विद्वान धर्मपाल ने तुम्हारे कितने प्रतिभाशाली अनुयायियों को स्वराज समझाते हुए संघी बना दिया, इसका हिसाब मुश्किल है। सारी समाज सेवा आज देशी-विदेशी पैसों पर चलने वाले एनजीओ के जिम्मे है और शायद उसमें कुछ ज्यादा अच्छे लोग हो सकते हैं-कैरियरिस्ट तो भरे ही हैं। जब हम आज के तुम्हारे ‘दुश्मनों’ के ट्विटर और सोशल मीडिया के फालोअरों की फौज की संख्या सुनते हैं तो सचमुच दिल बैठने लगता है।

आज हम न सिर्फ झूठ के प्रयोग करने लगे हैं बल्कि झूठ का प्रयोग करने वालों को नेता भी मानने लगे हैं। डर इसलिए भी लग रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार, प्रयोग चंपारण और गांधी तथा कस्तूरबा से संबंधित छह पुस्तकों के लेखक)

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