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तमिलनाडु : चिन्नमा चर्चा के पेचोखम

शशिकला की वापसी से अन्नाद्रमुक की करीने से बनाई योजनाओं में लग सकता है पलीता
पैर जमाने की कोशिशः शशिकला के शक्ति प्रदर्शन के बावजूद सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के नेता उनके साथ सुलह के मूड में नहीं हैं। इसका फायदा द्रमुक को मिल सकता है

तमिलनाडु के राजनीतिक कैनवास में प्रतीकों की खास अहमियत है। इन प्रतीकों में पुराने नेताओं की प्रतिमाएं, पुण्यतिथियों पर उनकी समाधियों पर अनिवार्य उपस्थिति, यहां तक कि उनके पुराने घर भी हैं। इन सबके बीच शशिकला नटराजन की चेन्नै वापसी ने दो और प्रतीकों को दोबारा जिंदा कर दिया है। एक, अन्नाद्रमुक का झंडा और दूसरा, पार्टी के रंग की लंबी शॉल, जो वे अपने गले में लपेटे रहती हैं।

पुलिस शिकायतों और धमकियों को धता बताकर शशिकला खुली कार में चेन्नै पहुंचीं, जिसकी बोनट पर अन्नाद्रमुक का झंडा लहरा रहा था। जब वे किसी मंदिर या चेन्नै के उपनगर में अन्नाद्रमुक के संस्थापक एमजीआर के घर दर्शन के लिए उतरीं तो शॉल उनके गले में लिपटी रही। दो और प्रतीक स्थलों पर जाने की उन्होंने योजना बनाई थी- एमजीआर और जयललिता की समाधि और अब संग्रहालय में तब्दील हो चुके पोएस गार्डन स्थित जयललिता के निवास पर, जिसे अन्नाद्रमुक सरकार ने आनन-फानन बंद कर दिया।

ऐसा करके सत्तारूढ़ पार्टी ने शशिकला के असर के बारे में अपनी घबराहट को ही प्रदर्शित किया। शशिकला ने भी अपनी मंशा के बारे में किसी को अंधेरे में नहीं रखा। उन्होंने कहा, “मैं आश्वस्त करूंगी कि अन्नाद्रमुक का काडर एकजुट रहे ताकि हमारा साझा दुश्मन (द्रमुक) सत्ता में वापसी न कर सके।” लेकिन अन्नाद्रमुक के नेताओं ने उनकी इस मंशा को न सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि उन्हें द्रमुक की बी-टीम कहा, जो द्रमुक विरोधी वोटों का बंटवारा चाहती हैं, ताकि वह एकमुश्त अन्नाद्रमुक के पाले में न जाए।

राजनीतिक टिप्पणीकार रवींद्रन तुरैसामी कहते हैं, “अन्नाद्रमुक को पूरा यकीन है कि शशिकला की वजह से एएमएमके के छह फीसदी वोट में मामूली बढ़त ही हो सकती है। अन्नाद्रमुक के दो पत्ती वाले चुनाव चिन्ह पर स्थायी कब्जा और पलानीस्वामी के अपने दम पर नेता की तरह उभरने से शशिकला के पास ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं है। फिर अन्नाद्रमुक के नेता नई-नई मिली अपनी आजादी को छोड़ने के मूड में भी नहीं हैं और न ही विधानसभा चुनावों के पहले किसी सुलह-समझौते के आसार हैं।”

शशिकला समर्थकों का तर्क है कि उनका अभूतपूर्व स्वागत न सिर्फ एएमएमके काडर (उनके भतीजे टी.टी.वी. दिनाकरन ने ऐसा माहौल बनाया) ने, बल्कि अन्नाद्रमुक के काडर ने भी किया। इससे साबित होता है कि उन्हें जयललिता के स्वाभाविक राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। शशिकला के पक्के प्रशंसक पूर्व मंत्री सेंतामिझन कहते हैं, “ईपीएस और ओपीएस दोनों को इस असलियत पर गौर करना चाहिए और चिनम्मा के साथ सौहार्द स्थापित करना चाहिए।”

लेकिन सत्तारूढ़ टोली शशिकला के साथ समझौते के मूड में नहीं है, बल्कि उसने शशिकला के भ्रष्टाचार मामले में सहयोगी रहे उनके दो रिश्तेदारों की संपति की कुर्की का आदेश देकर बेरुखी ही जताई है। इसका साफ संदेश यही है कि अदालत ने भ्रष्टाचार मामले में शशिकला की जिस अवैध संपति की पहचान की है, उसकी किसी भी समय कुर्की हो सकती है।

दरअसल, अन्नाद्रमुक नेताओं को पूरा भरोसा है कि भाजपा, पीएमके, डीएमडीके और अन्य दलों के साथ उनका गठबंधन शशिकला के असर को बेमानी बना देगा। शशिकला की रिहाई से पहले पलानीस्वामी ने किसानों के सहकारी बैंकों के लोन माफ करने, जल्लीकट्टू विरोध के दौरान दर्ज मामले वापस लेने जैसी घोषणाएं कीं। मत्स्य पालन मंत्री डी. जयकुमार कहते हैं, “देखते जाइए, ऐसी और घोषणाएं होंगी और हमारा घोषणापत्र सुर्खियों में होगा।”

तटस्थ जानकारों को मानना है कि पारंपरिक रूप से अन्नाद्रमुक समर्थक थेवर समुदाय पर शशिकला का प्रभाव दक्षिण तमिलनाडु और तंजावुर डेल्टा क्षेत्र में कम से कम 50 सीटों के नतीजे तय कर सकता है। तुगलक पत्रिका के एस. रमेश कहते हैं, “इसी एक कारण से अन्नाद्रमुक नेताओं को एएमएमके के नेताओं के साथ बातचीत शुरू करनी चाहिए ताकि कोई बीच का रास्ता निकल सके। अगर दोनों पार्टियों में सीट बंटवारे की भी समझदारी बन जाती है, तब भी द्रमुक को कड़ी चुनौती मिलेगी।” 

दोनों के बीच बढ़ी दरार से द्रमुक की बांछें खिल गई हैं। उसके नेताओं को लगता है कि शशिकला की वापसी से उसे सबसे ज्यादा लाभ होगा। द्रमुक विधायक एम. सुब्रह्मण्यम कहते हैं, “जो लड़ाई ईपीएस बनाम स्टालिन थी, वह अब ईपीएस बनाम शशिकला बनाम स्टालिन बन गई है। वे आपस में ही लड़ रहे हैं, जो हमारे लिए फायदेमंद है।” जब तक भाजपा दोनों पक्षों को बैठाकर समझौते के लिए मजबूर नहीं करती, तब तक अन्नाद्रमुक की सत्ता में तीसरी बार वापसी की जंग कमजोर ही रहेगी।

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