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सख्त कदम उठाइए, वरना घिरने लगी है मंदी

मंदी के दौर में पहुंच चुकी अर्थव्यवस्था को कड़वी दवा की जरूरत, अगर श्रम सुधार, भूमि अधिग्रहण कानून में सुधार लाया जाता है और सरकार अंतरराष्ट्रीय ट्रेड वार का फायदा उठा लेती है तो अर्थव्यवस्थाअ रफ्तार पकड़ लेगी
टेक्सटाइल, कंस्ट्रक्शन, जेम्स ऐंड ज्वैलरी जैसे सेक्टर ज्यादा रोजगार देने वाले हैं। इन्हें बूस्ट देकर अर्थव्यवस्थाव में तेजी आ सकती है

नई सरकार के लिए यह बेहद जरूरी है कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को समझा जाए और उसके आधार पर कदम उठाए जाएं। सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में है। यह साफ तौर पर दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंदी के साए भी लंबे होते जा रहे हैं। सबसे पहले बात अर्थव्यवस्था के अहम सूचकांक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की करते हैं। वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 6.5 फीसदी पर आ गई है, जो औसत ग्रोथ सात फीसदी से काफी कम है। स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर है।

दूसरा अहम सूचकांक औद्योगिक उत्पादन है जो फ्लैट बना हुआ है। मार्च 2019 में यह 0.1 फीसदी की ऋणात्मक दर पर है। इसी तरह एफएमसीजी सेक्टर में भी गिरावट है। मार्च 2019 में यह 0.3 फीसदी पर आ गया है जबकि फरवरी 2019 में यह 4.2 फीसदी की ग्रोथ पर था। ऑटोमोबाइल सेक्टर जो काफी समय से अच्छा प्रदर्शन कर रहा था, वहां भी अब मंदी का असर दिख रहा है। अप्रैल 2019 में वाहनों की बिक्री में 10 साल की सबसे बड़ी गिरावट है। अप्रैल में सभी तरह के वाहनों की बिक्री 16 फीसदी गिरकर 20.01 लाख पर पहुंच गई है।

इसके अलावा मांग और आपूर्ति का अहम सूचकांक मुख्य महंगाई (कोर इन्फ्लेशन) दर 4.5 फीसदी पर आ गई है, जो अर्थव्यवस्था में मंदी को दिखाती है। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था के कई सूचकांक मंदी की ओर इशारा कर रहे हैं। मंदी के कारण निजी क्षेत्र के निवेश में तेजी आने में समय लगेगा।

ऐसी स्थिति में नई सरकार के सामने क्या एजेंडा होना चाहिए? मेरा मानना है कि सबसे पहले सरकार को इस पर मंथन करना चाहिए कि कैसे इस मंदी के दौर से निकला जाए। मेरा अभी भी मानना है कि स्थिति उतनी भयावह नहीं हुई है। अगर तेजी से सख्त कदम उठाए जाएं, तो अर्थव्यवस्था में मजबूती लाई जा सकती है।

सरकार के लिए अच्छी बात यह है कि अभी वह सख्त कदम उठा सकती है। किसी भी नई सरकार के लिए उसका पहला साल इसके लिए सबसे मुफीद होता है क्योंकि शुरुआत उसे चुनावों की चिंता नहीं रहती है। ऐसे में उसे सबसे पहले सार्वजनिक खर्च बढ़ाने पर जोर देना होगा। उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि उसका राजकोषीय प्रबंधन बिगड़ने न पाए। पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली अंतरिम बजट में इसके पहले कह चुके हैं कि वह संसाधन बढ़ाने के लिए इन्‍फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में एसेट मोनेटाइजेशन जैसे कदम उठाएंगे। अब समय आ गया है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। सरकार के पास एसेट मोनेटाइजेशन के लिए सड़क, पॉवर जैसे कई क्षेत्र हैं, जहां मोनेटाइजेशन के कदम उठाए जा सकते हैं।

किसी भी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए जरूरी है कि फाइनेंशियल सेक्टर की हालत बेहतर रहे। नई सरकार को इस दिशा में भी तेजी से कदम उठाने होंगे। खास तौर से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की गैर-निष्पादित संपत्तियां (एनपीए) जिस स्तर पर पहुंच गईं हैं, वह चिंता का विषय है। इस समय एनपीए बैंकों द्वारा दिए गए कुल कर्ज का करीब 10 फीसदी तक पहुंच गया है। इसे कम करने के लिए तुरंत कदम उठाए जाने की जरूरत है। ऐसा करने से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता में इजाफा होगा। सार्वजनिक बैंकों के अलावा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियांे (एनबीएफसी) की स्थिति भी अभी अच्छी नहीं है। आइएल एेंड एफएस संकट के बाद एनबीएफसी सेक्टर के लिए पूंजी जुटाना काफी मुश्किल हो गया है। इस कारण उनके कर्ज देने की क्षमता में कमी आई है। यहां भी नई सरकार को अहम कदम उठाने होंगे। अगर वह ऐसा करती है तो निश्चित तौर पर क्रेडिट ग्रोथ में बढ़ोतरी होगी।

सरकार को इसके अलावा (गुड्स एेंड सर्विसेज टैक्स) जीएसटी में बचे हुए रिफॉर्म में भी तेजी से कदम उठाना होगा। अभी तक 900 से ज्यादा संशोधन किए जा चुके हैं। लेकिन अभी भी कुछ खामियां हैं। खास तौर से रिटर्न फाइलिंग की प्रक्रिया को ज्यादा सरल करने की जरूरत है। इसके साथ ही पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाना जरूरी है। अगर नई सरकार इन मसलों को जल्द से जल्द हल कर देती है, तो फिर जीएसटी का फायदा इकोनॉमी में दिखने लगेगा।

एक और अहम क्षेत्र कृषि का है, जहां ध्यान देने की जरूरत है। इस दिशा में अब लुभावने से ज्यादा ठोस कदम उठाने की जरूरत है। यह कदम भी समयबद्ध तरीके से लागू किए जाने चाहिए, जिससे उसका परिणाम भी दिखने लगे। किसानों के लिए बेहतर मार्केट की आवश्यकता है, जहां उनको अपनी उपज का वाजिब दाम मिल सके। इसी तरह बिचौलियों की भूमिका कम करने की जरूरत है। कुल मिलाकर कर्जमाफी जैसे लुभावने कदमों से बचकर, किसानों की आय बढ़ाने के लिए ठोस कदम की जरूरत है।

इस समय निजी क्षेत्र भी निवेश से बच रहा है। इसके लिए घरेलू से लेकर विदेशी फैक्टर जिम्मेदार हैं। यहां आप बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकते हैं। लेकिन यह जरूर है कि ईज ऑफ डुइंग बिजनेस की दिशा में कदम उठाकर निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। मसलन, भूमि अधिग्रहण और श्रम कानूनों में सुधार कर, उन्हें निवेश के लिए आकर्षित किया जा सकता है। अगर निजी क्षेत्र को आसानी से बिजली, जमीन मिल जाती है और श्रम कानून लचीले होते हैं, तो वह निश्चित तौर पर निवेश के लिए आगे आएगा। लेकिन निजी क्षेत्र में निवेश बहुत जल्द नहीं बढ़ने वाला है, यह धीरे-धीरे होगा। लेकिन इस दिशा में लगातार कदम उठाने होंगे। जहां तक श्रम सुधार और भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की बात है, तो यह काम सरकार के लिए आसान नहीं होगा। लेकिन ऐसे कदम उठाने का यह सही समय है। इस दिशा में सरकार संबंधित पक्षों के साथ आम सहमति बनाकर कदम उठाए, तभी उसका असर दिखेगा।

सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती नए रोजगार के अवसर में कमी होना है। लेकिन यह बात भी समझना होगा कि यह कोई आज का चैलेंज नहीं है। ऑटोमेशन और मशीनीकरण की वजह से नौकरियों के अवसर कम हो रहे हैं। आज के दौर में 10 साल पहले वाली स्थिति नहीं है। जब ज्यादा श्रमिकों की जरूरत होती थी। मंदी के साथ ऐसी परिस्थितियों में नौकरी के अवसर पैदा करना किसी भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे क्षेत्र पर खास तौर से फोकस करे, जहां पर श्रमिकों की मांग ज्यादा है। जैसे कि टेक्सटाइल सेक्टर, कंस्ट्रक्शन सेक्टर, जेम्स एेंड ज्वैलरी सेक्टर काफी ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्र हैं। इन सेक्टर को बूस्ट करने की जरूरत है। इसके अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में भी रोजगार की काफी संभावनाएं हैं।

सरकार को नीतिगत स्तर पर जल्द से जल्द कदम उठाने होंगे। अगर ऐसा होता है तो भारत में एक कुशल श्रमिक वर्ग भी तेजी से तैयार हो सकेगा, जिसका फायदा अर्थव्यवस्था में तेजी के रूप में मिलेगा। एक और क्षेत्र जो रोजगार बढ़ाने में काफी कारगर साबित हो सकता है, वह छोटे और मझोले उपक्रम वाला क्षेत्र है। जीएसटी लागू होने के बाद इस सेक्टर में सबसे अहम बदलाव यह आया है कि अब असंगठित क्षेत्र संगठित क्षेत्र में तब्दील हो रहा है। यहां पर रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। सरकार को इस दिशा में कदम उठाने होंगे। अगर ऐसा वह करती है तो रोजगार की समस्या में काफी हद तक सुधार हो सकता है।

इस समय ट्रेड वार का एक नया संकट खड़ा हो रहा है। इसकी चुनौतियों से निपटने के लिए हमें तैयार रहना होगा। लेकिन हमें वैश्विक अनिश्चितताओं से निपटने के लिए भी तैयार रहना होगा, क्योंकि ट्रेड वार से वैश्विक ग्रोथ में कमी आएगी, जिसका असर भारत पर भी दिखेगा। वैसे, इस चुनौती में भी हम अपना फायदा कर सकते हैं। अगर अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार गहराता है, तो यह तय है कि बहुत कंपनियां वहां से दूसरी जगहों पर शिफ्ट होंगी। भारत इसे मौके के रूप में देख सकता है। अगर बेहतर इन्‍फ्रास्ट्रक्चर और नीतियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नजर आईं तो भारत एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है और नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे, लेकिन इसके लिए सरकार को तेज और सख्त कदम उठाने होंगे, तभी जाकर कंपनियां भारत में निवेश करेंगी।

मौजूदा सरकार के हित में दो चीजें हो रही हैं। एक तो कच्चे तेल के दाम अभी 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बने हुए हैं। दूसरा, भारतीय मौसम विभाग ने सामान्य मानसून की भविष्यवाणी की है। अगर यह दोनों चीजें सामान्य रहती हैं, तो इसका फायदा भी अर्थव्यवस्था में तेजी आने के रूप में दिखेगा। जो इस समय की जरूरत है। लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो वह हमारे लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। हालांकि इस दिशा में ज्यादा कुछ किया नहीं जा सकता है।

मंदी के बावजूद नई सरकार के पास अभी कई विकल्प हैं, जिनके जरिए वह अर्थव्यवस्था को बूस्ट कर सकती है। हमारा अनुमान है कि 2019-20 में जीडीपी ग्रोथ 7.3 फीसदी पहुंच सकती है। अब देखना यह है कि नई सरकार इसके लिए क्या रुख अपनाती है।

( लेखक रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्‍त्री हैं)

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