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आवरण कथा/आयुर्वेद/नजरिया: घालमेल करना बंद करें

भारत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विविधता से समृद्ध विशेष देश है, जहां हर मौके- जरूरत के लिए कई विकल्प उपलब्धा हैं।
प्रो. डॉ. जे.ए. जयलाल

भारत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विविधता से समृद्ध विशेष देश है, जहां हर मौके- जरूरत के लिए कई विकल्प उपलब्‍ध हैं। स्वास्थ्य सेवा में भी भारत को पारंपरिक और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों की देन मिली हुई। हालांकि, विज्ञान की ताकत से आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने इन पारंपरिक पद्धतियों से कहीं ज्यादा प्रगति कर ली है।

आयुर्वेद और दूसरी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में रहस्यवादी धाराओं की समझ बेहद कम है और अध्ययन भी नहीं हुआ। इससे उनका बेहतर इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। कुछ ऐसे कारण हैं जो उन्हें तर्कसंगत, पारदर्शी तरीके से काम करने में अड़चन पैदा करते हैं, जिसका असर यह होता है कि समाज को उसका लाभ नहीं मिल पाता है और समृद्ध परंपरा के साथ न्याय नहीं हो पा रहा है।

इनमें एक वजह यह है कि इन पद्धतियों का नियमन न होने से इसके चिकित्सक आसानी से आधुनिक औषधि, जांच और अन्य तकनीकों को अपने उपचार में शामिल कर लेते हैं और स्वघोषित 'डॉक्टर' की उपाधि हासिल कर लेते हैं। इससे न केवल इन पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की शुद्धता नष्ट होती है बल्कि उनकी विशिष्टता भी समाप्त हो जाती है। इसमें दूसरी वजहें भी जुड़ जाती हैं।

आयुर्वेद और दूसरी पारंपरिक पद्धतियों में निगरानी और नियमन न होने की वजह से उपचार में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटी की उपलब्धता भी एक समस्या बनी हुई है। अभी इसके चिकित्सक इन्हें रहस्य बनाए हुए हैं और अपने फायदे के लिए किसी खजाने से कम नहीं समझते। इसी तरह, अपने फायदे के लिए कई कॉरपोरेट भी अपने उत्पादों के लिए बड़े-बड़े दावे करते हैं। साथ ही, इस क्षेत्र से जुड़ी कुछ दवा निर्माता कंपनियों और चिकित्सकों ने भी हर बीमारी का इलाज करने का दावा करना शुरू कर दिया है। इसकी वजह से भारत में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं हो पा रही है, जो लोगों की जरूरत को पूरी कर सके।

भारत में इस समय 414 आयुर्वेद कॉलेज और 536 आधुनिक चिकित्सा के कॉलेज हैं। इसके बावजूद संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार 90 फीसदी से अधिक भारतीय एलोपैथी पर भरोसा करते हैं। हमारे पास लगभग 7.5 लाख आयुर्वेद स्नातक हैं, लेकिन उनमें केवल एक छोटा-सा प्रतिशत सही मायने में आयुर्वेद की चिकित्सा दे रहा है और वह अपना समय रिसर्च और प्रमाण आधारित एक स्वतंत्र व्यवस्था बनाने पर लगा रहा है। इसके उलट कई लोग विज्ञापनों के जरिए बड़े-बड़े दावे करने में व्यस्त हैं। वे ऐसा बेहद आसानी से करते जा रहे हैं।

कोई आयुर्वेद कॉलेज शुरू करने के लिए आसान न्यूनतम मानक तय किए जाने से 'डॉक्टर' की डिग्री लेना भी सरल हो गया है। इसकी वजह से पाठ्यक्रम में विशेषज्ञता हासिल करना भी मुश्किल हो जाता है। साथ ही ऐसा कोई पाठ्यक्रम भी नहीं बनाया जाता जो बीमारियों को आधुनिक तरह से समझने में मदद कर सके। कई लोग इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को भी विवादों में डालकर बाजार को हड़पने की कोशिश करते रहे हैं।

इसके उलट आधुनिक चिकित्सा पद्धति को महामारी कोविड-19 से लड़ाई में काफी संघर्ष करना पड़ा। इस चिकित्सा पद्घति ने गहन रिसर्च किया और उससे मिले ज्ञान का इस्तेमाल इलाज में किया और इलाज के अनुभवों को भी साझा किया। महामारी से इस लड़ाई में फ्रंटलाइन पर मौजूद 760 डॉक्टरों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी।

उन्होंने भारतीय वैक्सीन को विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो दुनिया में प्रमाणित, अनुमोदित और स्वीकृत है। इसके लिए आधुनिक चिकित्सा पद्धति में संक्रमण की रोकथाम, चिकित्सीय नियंत्रण और संक्रमण मुक्त हुए लोगों की सेहत दुरुस्त रखने के लिए सफल अध्ययन करके अस पर अमल किया। दूसरी ओर, हमने देखा कि 'भारतीय चिकित्सा पद्धति को अपनाने वाले कुछ लोग' (और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री) कोविड-19 की रोकथाम और उसका इलाज करने का दावा एक 'अचंभित करने वाली दवा' के जरिए कर रहे थे। इसके लिए 45 बिना लक्षण वाले लोगों पर अध्ययन का दावा कर उसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करने की भी कोशिश की गई। इससे साफ है कि हमारी महान पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को कितने निचले स्तर तक पहुंचा दिया गया है।

बहरहाल, मेरी सही मायने में ऐसी ख्वाहिश है और उम्मीद करता हूं कि अनिश्चितता के इस समय में पारंपरिक चिकित्सा पद्धति प्राचीन ग्रंथों से प्राप्त खजाने का सही मायने में अध्ययन करे और उनसे मिले ज्ञान को शामिल कर, उनका वैज्ञानिक विश्लेषण करके ऐसी किफायती पद्धति विकसित करे, जो लोगों को फायदा पहुंचा सके। चाहिए तो यह कि हम अपनी एक अच्छी पुरानी व्यवस्था को आधुनिक चिकित्सा द्वारा अपनाई गई तकनीकों के जरिए खरा बनाकर उसे तैयार करें। हमें आज एक घाल-मेल वाली नहीं बल्कि आधुनिक और शुद्ध परंपरागत चिकित्सा पद्धति की जरूरत है।

(लेखक इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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