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अंदरखाने

सियासी दुनिया की हलचल
सुब्रह्मण्यम स्वामी, वरिष्ठ भाजपा सांसद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोविड-19 प्रबंधन की जिम्मेदारी नितिन गडकरी को सौंप देनी चाहिए, और भारतीय जनता पार्टी को अपने आलीशान ऑफिस को अस्पताल में तब्दील कर देना चाहिए।

सुब्रह्मण्यम स्वामी, वरिष्ठ भाजपा सांसद

 

मंत्री की परेशानी

झारखंड में कोरोना के दौर में स्वास्थ्य महकमा संभालने वाले मंत्री जी की सेहत खुद ठीक नहीं है। विभागीय सचिव से उनकी नहीं बन रही थी। डॉक्टरों के खिलाफ एक टिप्पणी आधार बनी और बड़ी मशक्कत के बाद सचिव महोदय चलता कर दिए गए। दूसरे सचिव आए। सब ठीक चल रहा था। मगर सचिव महोदय को कोरोना लग गया। इस बीच कोरोना प्रबंधन को लेकर उनकी पार्टी के लोग भी उनकी खिंचाई करते रहे। विरोधियों को भी मौका मिल गया है। अब जिस अधिकारी को स्वास्थ्य विभाग का प्रभार मिला है, उनका

ऊपर से सीधा संबंध है। ऐसे में मंत्री महोदय फिर परेशान हैं।

सही जानकारी की सजा

मध्य प्रदेश सरकार ने कोविड-19 के वास्तविक आंकड़े जाहिर न करने के मौखिक निर्देश सभी कलेक्टरों को दिए हैं। ज्यादातर कलेक्टर निर्देश का शब्दश: पालन कर रहे हैं, लेकिन एक जिले के कलेक्टर को यह सही नहीं लगा कि लगातार आंकड़े कम करके बताए जाएं। उन्होंने सही आंकड़े देने शुरू कर दिए। कलेक्टर साहब को ऊपर से ऐसा न करने के संकेत भी मिले, मगर वे नहीं माने। आखिर उनका तबादला कर दिया गया। कलेक्टर साहब को अब शायद एहसास हो रहा हो कि सही जानकारी देने की सजा क्या होती है। कलेक्टर की जिम्मेदारी मिलना आसान नहीं है और उन्हें तो फरमान न मानने के लिए हटाया गया है। ऐसे में अब उनके लिए दोबारा कलेक्टर बनना वाकई आसान नहीं होगा।

अब किस ओर नाव

बिहार के एक नेता अपने काम से ज्यादा अपनी महत्वाकांक्षा के लिए जाने जाते हैं। कभी सूबे की बागडोर उनके पास थी। जिसने बागडोर पकड़ाई उसी से बगावत कर बैठे। ऐसे में पैदल हो गए। सपने बड़े पाल रखे थे, अपनी पार्टी बना ली। संयोग अनुकूल हुआ तो दो-चार विधायक भी जीत गए। कांटे की लड़ाई में किसी तरह जोड़-घटाव कर सरकार बनी तो अपने पुराने नेता में आस्था जताते हुए सरेंडर की मुद्रा में सहयोगी की भांति साथ आ गए। मगर मन है कि मानता नहीं। अपने लिए विधानपरिषद की सदस्यता चाहते थे, लेकिन बात नहीं बनी। इसलिए सरकार पर बीच-बीच में दबाव बनाते रहते हैं। उनकी इस फितरत के कारण विरोधी पार्टी वाले भी उन पर डोरे डाल रहे हैं। अब देखना है कि उनकी नैया किस ओर जाती है।

लत जो लगी है

झारखंड सरकार ने लॉकडाउन को 'स्वास्थ्य सुरक्षा सप्ताह' का नाम दिया है। सिर्फ जरूरी विभाग खुले हैं। साहब का विभाग भी बंद है। मगर उन्होंने अधीनस्थों को कह दिया है, दफ्तर आइए और काम कीजिए। काम नहीं होगा तो काम कैसे चलेगा। विभाग के माननीय को मासिक कुछ चाहिए। दफ्तर बंद रहेगा तो टास्क कैसे पूरा होगा। अब कर्मचारी परेशान हैं कि उनके मासिक के चक्कर में कहीं कोरोना का शिकार न बन जाएं। लेकिन मासिक में उनका भी तो हिस्सा है, सो मन दबाए हुए हैं।

कांग्रेसियों की पसंद दीदी

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जीत ने कांग्रेस में विरोध की आवाज उठाने वाले नेताओं के तेवर बदल दिए हैं। गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल से लेकर सभी प्रमुख नेताओं ने उनकी तारीफ की है। हर तरफ कयास यही लगाया जा रहा है कि अचानक इन नेताओं के कसीदे पढ़ने की वजह क्या है। दरअसल, चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस में गए यशवंत सिन्हा को उच्च सदन में भेजे जाने की चर्चा है। कहीं कुछ असंतुष्ट कांग्रेसी भी अपनी जगह आरक्षित करने की कोशिश में तो नहीं!

पीके आएंगे काम

बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की धमाकेदार जीत के बाद प्रशांत किशोर यानी पीके भले ही संन्यास की बात कर रहे हैं लेकिन मध्य प्रदेश कांग्रेस उन्हें राज्य में अपने लिए रणनीति तैयार करने का जिम्मा देना चाहती है। दमोह उपचुनाव में मिली जीत के बाद कांग्रेस को राज्य के अगले विधानसभा चुनाव में बड़ी संभावना नजर आ रही है। पार्टी नेताओं को लगता है कि कोरोना के बाद राज्य में भाजपा के खिलाफ असंतोष बढ़ेगा। इसी असंतोष को भुनाने की रणनीति पार्टी पीके से तैयार करवाना चाहती है।

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