अंदरखाने

माइकल वॉन
माइकल वॉन

“ब्रिटेन में लोग मेरे मुंह पर अंडे मार रहे हैं... लेकिन मुझे अच्छा क्रिकेट देखना पसंद है, और भारत में ये भरपूर है- माइकल वॉन, पूर्व कप्तान, इंग्लैंड क्रिकेट टीम

रसूखदार पोस्ट की चाहत

मध्य प्रदेश में इन दिनों एक रसूखदार पोस्ट के लिए पूर्व आइएएस अधिकारियों में होड़ मची हुई है। असल में राज्य में रेरा चेयरमैन का पद खाली है। रेरा चेयरमैन की पोस्ट, उच्च न्यायालय के न्यायधीश के समकक्ष होती है। इसे देखते हुए कई अपर मुख्य सचिव स्तर के सेवानिवृत अधिकारी लॉबिंग में जुटे हैं। लेकिन इस दौड़ में एक वर्तमान आइएएस अधिकारी दांव मारने की चर्चा है। वह अधिकारी तय समय से पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने वाले हैं। इसके अलावा वह संघ के भी करीबी माने जाते हैं। अब देखना है उनकी चाहत पूरी होती है या नहीं।

याद आया वादा

पहले कोरोना से बचाव की कसरत और अब सरकार बचाने की कवायद। हरियाणा की भाजपा-जजपा गठबंधन सरकार की हालत ‘आसमान से गिरा खजूर पर अटका’ जैसी है। अक्टूबर 2019 में सत्ता में आई इस गठबंधन सरकार से पहले दोनों दलों को जनता से चुनाव दौरान किए वादे पूरे करने के लिए एक ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ पेश करना था। पर सवा साल बीतने के बावजूद सरकार की कोई बड़ी पहल सामने नहीं आई है। हरियाणवी युवाओं के लिए 75 फीसदी आरक्षण को छोड़कर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की कोई बड़ी पहल सामने नहीं आई है। गृह मंत्री अनिल विज की अध्यक्षता में कॉमन मिनिमम प्रोग्राम कमेटी भी बनी पर इसकी दो बैठकों के बाद पिछले एक साल से कोई बैठक ही नहीं हुई। चर्चा है कि जजपा के दबाव में मुख्यमंत्री को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की याद आ रही है इसलिए आगामी केंद्रीय बजट में केंद्र से 5000 करोड़ रुपए का पैकेज कोविड के बदले में मांग रहे हैं।

एक्शन मोड में कप्तान साहब

झारखंड में वर्दी वाले कप्‍तान साहब अचानक आक्रामक हो गये हैं। हाल में बिना सिर वाली एक लाश को लेकर राजनीति तेज हो गई थी। विपक्ष पूरी तरह आक्रामक था। दुष्‍प्रचार और आंदोलन ज्‍यादा होने से वर्दी वाले लोग बैकफुट पर आ गये थे। हमला राजा के काफिले पर भी हो गया। जवानों का मनोबल न टूटे इसके लिए कप्‍तान साहब ने कड़े शब्‍दों में कह दिया गुंडों को वही लाकर हाथ-पैर तोड़ देंगे। उनकी टीम ने मेहनत की तो केस सुलझ गया। एक केस का सुलझना कई केस जीतने जैसा हो गया। आक्रामक विपक्ष बैकफुट है। मगर बदनामी का गुस्‍सा साहब के जेहन में है। हत्‍या का मामला तो सुलझ गया मगर राजा के काफिले पर हमले का मामला जिंदा है। तीन दर्जन लोग पकड़े गये हैं। इसके बाद कई विपषी नेताओं की नींद उड़ गई है।

पीछे हटे महाराज

छत्तीसगढ़ में जब 15 साल बाद कांग्रेस सरकार बनी थी। तो मुख्यमंत्री की कुर्सी की दौड़ में महाराज भी शामिल थे। लेकिन 10 जनपथ से हरी झंडी नहीं मिल पाई और सत्ता किसी और के पास चली गई। इस बीच महाराज ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला भी अपने समर्थकों के जरिए उछालते रहे हैं। यानी ढाई साल बाद उन्हें कुर्सी मिल जाय। लेकिन लगता है कि अब वह दांव भी काम नहीं आ रहा है। इसलिए महाराज ने अब पीछे हटना ही मुनासिब समझा है। क्योंकि आलाकमान खास कर राहुल गांधी से उनकी दूरी जगजाहिर है। ऐस में अब कुर्सी का मोह त्यागना ही समझदारी दिख रही है।

नेताजी को स्‍कूल पसंद है

राजनीति से दूरी बनाने को मजबूर हो चुके, कांग्रेस के एक नेताजी का ध्‍यान अब खेतीबारी और स्‍कूल पर केंद्रित हो रहा है।  केंद्र में मंत्री रहे, नेता जी का जनाधार आज भी कम नहीं है मगर ज्‍यादा महत्‍वाकांक्षा और अपनी उपेक्षा को लेकर सिपहसालारों से पंगा लेना उन्‍हें महंगा पड़ रहा है। ऐसे में अपने गृहराज्य झारखंड में तन्मयता से फॉर्म हाउस को आबाद करने में जुटे हैं। इसके अलावा कानपुर वाले एक ब्रांडेड स्‍कूल की फ्रेंचाइजी भी ले चुके हैं।

कमजोरी के खुलासे का डर

झारखंड में मंत्री जी सेहत वाला महकमा संभालते हैं। राजनीति में अपना महत्‍व बनाये रखने के लिए कैदी नेताजी से थोड़ा करीब हुए थे। खैर, राजाजी को यह सब बहुत पसंद नहीं आता है। इसलिए उनके पर बांध दिये गये । महकमे के सचिव सीधा राजाजी से ही गाइड होते हैं। आलम यह है कि उनकी अपने विभाग में बहुत चल नहीं पाती है। एक बड़े अस्‍पताल के निदेशक का मामला भी ऊपर-ऊपर सेट हो गया। दुखड़ा रोयें भी तो कमजोरी जाहिर हो जायेगी।

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