अंदरखाने

उमर अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला

भाजपा ने इस चुनाव में अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को प्रतिष्ठा का मुद्दा बना दिया था। लोगों ने अपना फैसला सुना दिया है और यह उन लोगों के लिए है जो लोकतंत्र में भरोसे की बात करते हैं                    

उमर अब्दुल्ला, पूर्व मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर

 

कोविड और बजट

कोविड महामारी के दौर में अब केंद्र सरकार नया बजट पेश करने जा रही है। ऐसे में सरकार से बड़े राहत की उम्मीद सभी लोगों को है। इसकी उम्मीद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बढ़ा दी है। उनका कहना है कि यह ऐसा बजट होगा , जो कि पहले कभी नहीं पेश किया गया। लेकिन वित्त मंत्रालय में बाबुओं की अलग ही परेशानी है। वह कह रहे पिछले बजट के तो सारे दावे कोरोना और आर्थिक सुस्ती की वजह से धराशायी हो गए हैं। ऐसे में अब ऐसा क्या बजट बनेगा जो सबसे जुदा हो। हम तो इसी माथापच्ची में फंस गए हैं कि क्या खोया और क्या पाया।

दूर होती दिल्ली

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सत्ता गंवाने के बाद दिल्ली की राजनीति में फिर से राज्य के एक बड़े नेता सक्रिय होने की कवायद में लगे थे। लेकिन जैसे ही इस बात की खबरें आनी शुरू हुईं कि राहुल गांधी दोबारा पार्टी के अध्यक्ष बन सकते हैं, उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। असल में सोनिया के करीबी माने वाले वरिष्ठ नेता को उम्मीद थी कि अहमद पटेल और मोती लाल वोरा की मृत्यु के बाद खाली हुई जगह उन्हें मिल जाएगी, लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिख रहा है। अब नेता जी की परेशानी यह है कि मध्य प्रदेश में उनके लिए करने को ज्यादा कुछ रह नहीं गया और दिल्ली उनसे दूर होती जा रही है। इस बीच राज्य से भी एक बड़ा पद हाथ से न‌िकल गया है, सो परेशानी जायज है। ऐसे में लगता है कि एक सभा में द‌िया गया उनका यह बयान कि 'मैं अब आराम करना चाहता हूं', हकीकत में तब्दील हो सकता है।

ख्वाब अधूरा न रह जाए

बिहार में एनडीए सरकार के फिर सत्‍ता में आते ही लाल बत्‍ती को लेकर कई नेताओं की उम्‍मीदें बढ़ गई थीं। बदले समीकरण ने कई लोगों की उम्मीदें जगा दी थीं। भाजपा के बड़ा भाई बन जाने और पार्टी के कुछ दिग्‍गजों के किनारे लगने से लग रहा था कि दूसरी पंक्ति के नेताओं को लाल बत्ती मिलने वाली है। कैबिनेट विस्‍तार में 16 और लोगों को जगह मिलने की चर्चा भी थी। इसमें से भाजपा के 9-10 लोगों को जगह मिलने की उम्मीद थी। मगर मामला अटक गया और अब खरमास आ गया है। ऐसे में जो भी होना है वह 14 जनवरी के बाद ही होगा। देरी से इस बात का डर है कि कहीं पत्ता न कट जाए। सो ये सब नेता जुगत में लगे हुए हैं, लेकिन एक महीने में गंगा में कितना पानी बह जाए, यह किसे पता है।

किसानों का सबक

किसान आंदोलन का रुख मोड़ने के लिए भाजपा आलाकमान के निर्देश पर हरियाणा सरकार ने लाख कोशिशें कीं, पर किसानों ने उन्हें सिरे नहीं चढ़ने दी। पंजाब की सतलज-यमुना लिंक नहर से अपने हिस्से के पानी की मांग उठाने वाली भाजपा ने 20 दिसंबर को नारनोल में जलधिकार किसान रैली में पानी का मुद्दा उठाया। जवाब में किसानों ने सरकार को घेर लिया। उनका कहना था जब किसानों के पास जमीनें ही नहीं रहेंगी तब वे पानी लेकर क्या करेंगे? किसानों के रुख को देखते हुए फिलहाल मामले को ठंडे बस्ते में डालने की सलाह ऊपर से आई है।

कैसे खत्म हो आंदोलन

केंद्र सरकार के लिए किसान आंदोलन को खत्म करना एक चुनौती बन गया है। ऐसे में बैकडोर कवायद काफी चल चल रही है। इस बात को लेकर नेताओं और अधिकारियों की क्लास भी लग रही है। ऐसे में अब एक वरिष्ठ अधिकारी को इस बात का जिम्मा सौंपा गया है कि वे नए कृषि कानून के फायदे की बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं। इसके लिए अधिकारियों और नेताओं की पूरी फौज मीडिया, सोशल मीडिया में नए कृषि कानून के पक्ष में माहौल बनाने में लग गई है।

सिपहसालारों के जाने का दुख

कांग्रेस के दो बड़े सिपहसालार अहमद पटेल और मोती लाल वोरा, इस दुनिया से चले गए। इनके चले जाने से बिहार के कुछ बड़े नेताओं को ज्‍यादा ही सदमा पहुंचा है। दरअसल, कहीं दाल गलानी होती तो प्रदेश के नेता आलाकमान के करीबी नेताओं के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। चाहे अहमद पटेल हों या मोती लाल वोरा, लोगों के लिए करियर के उम्‍मीद थे। अब वे संबंधों के नए तार जोड़ने में लगे हैं। एक दिन में रिश्‍ता तो बनता नहीं, सो तकलीफ जायज है।

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