अंदरखाने

हंसल मेहता
हंसल मेहता

पहले क्लैम्पडाउन, फिर लॉकडाउन और अब शटडाउन, एक दिन सब कुछ कब्जे में ले लेंगे। हंसल मेहता, फिल्म निर्देशक, (ओटीटी प्लेटफॉर्म को सरकार की निगरानी में लेने के फैसले पर)

 

आइटी मास्टर

सत्ताधारी दल की पार्टी के एक आइटी मास्टर की खासी चर्चा है। चर्चा का कारण उनके काम करने का रवैया है। विरोधियों का कहना है कि मास्टर साहब की पूछ ज्यादा हो गई है, तो वे अपने को ही किनारे करने में लग गए हैं। आलम यह है कि वे कई पार्टी सर्मथकों के ही यूट्यूब अकाउंट, ट्विटर अकाउंट, फेसबुक अकाउंट ब्लॉक करा रहे हैं। ऐसे ही एक यूट्यूबर का कहना है, कि व्यक्तिगत समस्या पेशे में आड़े आ रही है। ऐसा नहीं है कि मास्टर साहब से केवल ऐसे ही लोग नाराज हैं, पार्टी के एक वरिष्ठ नेता तो खुलेआम उनके खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो पा रही है।

भटकते नेता

झारखंड की राजनीति में दो भटकती आत्‍माएं (पार्टी से छोड़कर जाने वाले नेता) चर्चा में हैं। मोक्ष के लिए घर वापसी चाहते हैं। बड़े तेवर में ऐन मौके पर दगा देकर निकल गए थे। लेकिन अब वापसी का रास्ता तलाश रहे हैं। एक नेताजी तो वापसी के लिए इतने बेचैन हैं कि बिना बुलाए पार्टी मुख्‍यालय ही पहुंच गए। और वहां इस कोशिश में थे कि फिर गुडबुक में आ जाएं। वहीं दूसरे तो उससे भी आगे निकल गए। बिना पार्टी में शामिल हुए ही उम्‍मीदवार के समर्थन में चुनावी सभाओं में शामिल होने लगे। मंच पर विराजने लगे। बिना पार्टी में आए मंच पर विराजना पार्टी अध्यक्ष को पसंद नहीं आया और वे भड़क गए। कह रहे हैं कि जो लात मारकर गए थे, वे किस मुंह से लौट रहे हैं। वैसे भी पार्टी अध्यक्ष से उनकी नाराजगी जगजाहिर है। खैर, नाराज क्यों न हो, उन्हीं के खिलाफ चुनाव जो लड़ा था।

गुडबुक में वापसी

राजस्थान में कभी अपनी ही सरकार को हिला देने वाले युवा कांग्रेसी नेता फिर से गुडबुक में आ गए हैं। पार्टी में चर्चा जोरों पर है कि जिस तरह उपचुनावों में युवा नेता को तरजीह मिली है, उससे साफ है कि पुराने गिले-शिकवे मिट गए हैं। इस युवा नेता ने पार्टी के लिए मध्य प्रदेश और बिहार में चुनाव प्रचार किया। मध्य प्रदेश में तो अपने खास दोस्त के खिलाफ भी पुरजोर से प्रचार किया। साफ है कि आलाकमान ने उन्हें फिर से अपना चहेता बना लिया है। असल में उप-मुख्यमंत्री पद गंवाने के बाद ऐसा लग रहा था कि अब युवा नेता का पहले जैसा असर आलाकमान के बीच नहीं रहेगा। लेकिन जिस तरह, दोबारा उन्होंने गुडबुक में वापसी की है, उससे कइयों की जबान पर ताले गए हैं।

कमलनाथ की जगह कौन

मध्य प्रदेश उपचुनाव में कांग्रेस को मिली शिकस्त के बाद, पार्टी ने नए अध्यक्ष की तलाश शुरू कर दी है। खास बात यह है कि इस बात की हरी झंडी भी आलाकमान से मिल गई है। असल में चुनावों के पहले ही आलाकमान ने तय कर दिया था कि अगर उपचुनावों में पार्टी हारती है तो राज्य में नए अध्यक्ष को कमान सौंपी जाएगी। प्रदेश अध्यक्ष की कमान एक समय ज्योतिरादित्य सिंधिया भी चाहते थे, लेकिन मुराद पूरी नहीं हो पाई। बाद में भाजपा का दामन थाम, उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से बाहर करा दिया।

मातम का जश्‍न

झारखंड में पार्टी के लिए यह शोक का समय था। एक मंत्री दिवंगत हो गये तो दूसरे गंभीर रूप से बीमार हैं। लेकिन इस मौके पर लालबत्ती की चाहत रखने वाले नेताओं की कमी नहीं है, चाहे पार्टी में हों या सहयोगी पार्टी में। निधन से एक और सीट खाली हुई तो उम्‍मीद लगाए बैठे लोगों के मन में उत्‍साह जग गया। इस बीच एक दूसरे मंत्री गंभीर रूप से बीमार हैं तो वहां भी उम्मीद लगा बैठे। मगर मुराद पूरी नहीं हुई। अब चर्चा है कि कुंवर साहब ने खेल बिगाड़ दिया।

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ

फूल वाली पार्टी में बड़े सम्‍मान के साथ वापस लौटे नेताजी बड़ी दुविधा के दौर से गुजर रहे हैं। वापस तो लौट आये, पार्टी को जो सम्‍मान देना था, पार्टी ने दे दिया। लेकिन उनका हक उन्‍हें नहीं मिल रहा हैं। मामला तकनीकी पेच में फंस गया है और नेताजी को अब उबरने का रास्‍ता नहीं दिख रहा हैं। पत्र लिख-लिख कर सरकार पर आक्रमण भी करते रहे। लेकिन बात नहीं बनी। पुराना किस्‍सा अगर दोहराया गया तो, कहीं उम्‍मीद में ही उनका कार्यकाल न कट जाए।

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