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जनादेश 2022/आवरण कथा: नारों का चुनाव

नारे अपनी संक्षिप्तता, चुटीलेपन, और द्रुत मंतव्य स्थापना के लिए जाने जाते हैं
प्रचार में खास भूमिका निभाते हैं नारे

नारे किसी भी चुनाव की पूरी दाल भले न हों पर उसका तड़का अवश्य होते हैं। नारे कब, कहां, कैसे पनपते हैं या नारा लेखक किस रचनाशीलता से प्रेरित होते हैं, यह एक रोचक राजनैतिक विमर्श बन सकता है। नारे, मतदाताओं को कैसे लुभाते हैं या मतदान को कैसे प्रभावित करते हैं, यह बहस भी दिलचस्प है। इसकी ढेरों मिसालें हम सबको याद होंगी। चुनाव हमेशा ही अपने आकार, तामझाम और रोचक गूढ़ता के लिए मशहूर रहे हैं। संसदीय चुनाव हों या प्रादेशिक, नारे हमेशा ही नैरेटिव बनाने में कारगर रहे। आइए देखें हाल के और मौजूदा पांच राज्यों के चुनाव में अब तक के नारे क्या रंग भर रहे हैं।

इस दौरान सबसे खास उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव है, जो अपनी संख्या और विस्तार के कारण राष्ट्रीय चरित्र बना लेता है। 2022 में होने वाले चुनाव में ‘बाइस में बाइसिकल’ या ‘उप्र+योगी= उपयोगी’ जनमानस को प्रभावित कर पाएंगे, देखना रोचक होगा। समाजवादी पार्टी, ‘विकास की चाभी-डिंपल भाभी’, ‘विकास का पहिया-अखिलेश भैया’, ‘बाइस का जनादेश-आ रहे हैं अखिलेश’ और ‘यूपी बोले आजका-नहीं चाहिए भाजपा’ जैसे नारों को चलन में लाने के प्रयास में है। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी ‘जो राम को लाए हैं-हम उनको लाएंगे-फिर से भगवा लहराएंगे’ ‘गरीब का बेटा (मतलबः मोदी!) दिला रहा गरीब को सम्मान-बीमा, बिजली, नल, मकान’, ‘शिव के साथ श्रम की पूजा-कर रहा गरीब का बेटा’ के सहारे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को अखिलेश बनाम मोदी का चुनाव बनाने की फिराक में है। इस बीच, कांग्रेस और बसपा महिला वोटरों को लुभाने के लिए ‘लड़की हूं-लड़ सकती हूं’ या ‘बेटियों को जीने दो-बहनजी को आने दो’ के सहारे उत्तर प्रदेश की चुनावी वैतरणी पार करना चाहती हैं।

नारे आंदोलनों से पनपते हैं या आंदोलन को जन्म देते हैं, समझने के लिए ‘साइमन गो बैक’, ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’, ‘जय हिंद’ अथवा ‘वंदे मातरम’ के ऐतिहासिक अध्ययन की मांग करते हैं। आजादी के बाद हुए चुनावों में, ‘जय जवान-जय किसान’, ‘इंडिया इज इंदिरा-इंदिरा इज इंडिया’, ‘गरीबी हटाओ’ ‘इंदिरा हटाओ- देश बचाओ’ सरीखे नारों ने आपातकाल तक जनमानस को उद्वेलित किया। इसके बाद के नारों में एक भिन्न स्तर का व्यंग्य या चुटीलापन आया जिनमे ‘एक शेरनी सौ लंगूर-चिकमगलूर चिकमगलूर’, ‘एक चवन्नी चांदी की-जय बोलो इंदिरा गांधी की’, तत्कालीन चुनावों में कांग्रेसी वरदहस्त को दर्शाते हैं। आपातकाल के ठीक बाद हुए चुनावों में ‘जनसंघ को वोट दो-बीड़ी पीना छोड़ दो’, ‘बीड़ी में तमाकू है-कांग्रेस वाला डाकू है’ जैसे नारों ने एक नया नैरेटिव गढ़ा। 1984 के बाद रामजन्म भूमि आंदोलन की पृष्ठभूमि और मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने पर, ‘जात पर न पात पर-मोहर लगेगी हाथ पर’ और ‘जो गालों (राजीव के) की लाली है-तोपों की दलाली है’ ने 1989-91 के बीच हुए चुनावों पर अपना रंग छोड़ा। इस बीच तेजी से उभरती दलित राजनीति ने भी कई नए नारे दिए, ‘कसम राम की खाएंगे-मंदिर वहीं बनाएंगे’ के बरक्स ‘मिले मुलायम कांशीराम-हवा में उड़ गए जयश्री राम’ प्रभावी रहा। ‘तिलक, तराजू, और तलवार-इनको मारो जूते चार’, से शुरू होकर दलित राजनीति के नारों का पटाक्षेप ‘हाथी नहीं गणेश है-ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’ में हुआ।

नारे अपनी संक्षिप्तता, चुटीलेपन, और द्रुत मंतव्य स्थापना के लिए जाने जाते हैं। इसलिए यह किसी भी आंदोलन, विज्ञापन, यहां तक कि नीति प्रचार-प्रसार के लिए अपरिहार्य हैं। ये नारे किसी भी चयन और कर्मवत निर्णय के लिए अनुप्रेरित करते हैं। इसलिए सरकारी उद्घोषणाओं में भी ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, ‘हम दो-हमारे दो’, ‘दो बच्चे हैं मीठी खीर-उससे ज्यादा बवासीर’, जैसे नारे प्रचलित भी हुए और विवादित भी।

विज्ञापन के नारे एक भिन्न तरह के भावनात्मक राग अथवा उत्प्रेरणा का प्रयास करते हैं जिसके लिए ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ से लेकर ‘क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है?’ जैसे नारे बाजार में मुनाफे का विमर्श बुनते हैं। चुनावी नारे इनसे विलग नहीं हैं और अपने दल व नेता के गुण से इतर उनको विकल्पहीन बताकर उनके लिए मतदान करने को प्रेरित करते हैं। इसके लिए फिर ‘विकास की आंधी-राजीव गांधी’, ‘बारी बारी सबकी बारी-अबकी बारी अटल बिहारी’ या फिर ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू-तब तक रहेगा बिहार में लालू’, ‘बिहार में बहार हो-फिर से नीतीशे कुमार हो’ जैसे नारे अपने समय के चुनावों की बयार को बताते हैं। स्वच्छ छवि, भ्रष्टाचार मुक्त, सुशासन, समाजवाद, गरीबी, बेरोजगारी इत्यादि जुमले विचारधारा निष्पक्ष होने के नाते धुर दक्षिणपंथी से भीषण वामपंथी नारों में सहज ही जगह बना लेते हैं। हिंदी पट्टी के नारे अनायास ही राष्ट्रीय स्तर पर पकड़ बना लेते हैं। ‘मां, माटी, मानुष’ जैसे प्रचलित नारे भी अपनी प्रादेशिकता से मुक्त नहीं हो पाते हैं और राष्ट्रव्यापी नैरेटिव बुनने में चूक जाते हैं। ‘अबकी बार-मोदी सरकार’ जैसे नारे तो महाद्वीपों की सीमा लांघ अपनी अनुगूंज ‘अबकी बार-ट्रंप सरकार’ तक में प्रतिध्वनित होते हैं।

बहरहाल, चुनाव के दौरान बतकही और नुक्कड़ दोनों महत्वपूर्ण हो जाते हैं, ऐसे में नुक्कड़ पर चस्पा पोस्टर और बतकही का व्यंग्य, नारे वगैरह उस मतदाता को जरूर प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं जो 'अनिश्चित' है और विचारधारा विशेष से प्रभावित नहीं है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला में प्राध्यापक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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