शाहीनबाग: सबसे अनूठा विरोध

अक्षय दुबे 'साथी'
जज्बा: कड़ाके की सर्दी में भी बच्चों के साथ प्रदर्शन
जज्बा: कड़ाके की सर्दी में भी बच्चों के साथ प्रदर्शन

अक्षय दुबे 'साथी'
90 साल की असमा खातून, 82 साल की बिलकीस, 75 साल की सरवरी और 70 साल की नोन निसा समेत सैकड़ों औरतें छोटे-छोटे बच्चों के साथ दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में बीच सड़क पर अस्थायी तंबू के नीचे डटी हैं।

“हमारे बाप-दादा समेत हमारी कई पुश्तें यहां दफन हो गईं। जब भारत का बंटवारा हुआ तब जिनको जहां जाना था, वे चले गए। हम यहां रह गए। लेकिन आज हमारी नागरिकता पर सवाल उठा रहे हैं। हम कहां जाएंगे?” एक सांस में इतना बोलने के बाद 90 साल की असमा खातून कहती हैं, “हम कहीं नहीं जाएंगे और ना ही हम कागजात दिखाएंगे। हिंदुस्तान हमारा है।” 90 साल की असमा खातून, 82 साल की बिलकीस, 75 साल की सरवरी और 70 साल की नोन निसा समेत सैकड़ों औरतें छोटे-छोटे बच्चों के साथ दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में बीच सड़क पर अस्थायी तंबू के नीचे डटी हैं। उनकी मांग है कि नागरिकता संशोधन कानून और एनपीआर को मोदी सरकार वापस ले।

असमा खातून का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। उन्हें तो अपनी मां की उम्र की महिलाओं की सेवा करनी चाहिए। नोन निसा कहती हैं, “हमें ठंड से नहीं, एनआरसी और सीएए से डर लग रहा है। इस उम्र में हम कहां जाएंगे? जब तक यह वापस नहीं होगा, हम उठने वाले नहीं हैं।” सरवरी कहती हैं, “हमें नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज दिखाने को कह रहे हैं। इस देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास कोई कागज नहीं हैं। कई लोगों के दस्तावेज बाढ़-बारिश में बह गए। वे कहां से लाएंगे कागज?” नोन निसा और बिलकिस कहती हैं, “हम कागज नहीं दिखाएंगे। असम में तो लोगों ने कागज दिखाए थे, उनका क्या हुआ?” 31 दिसंबर से अनशन पर बैठी 50 साल की मेहरुन्निसा कहती हैं, “सरकार का कोई नुमाइंदा अब तक यहां नहीं आया। जब तक यह कानून वापस नहीं होगा, अनशन जारी रहेगा।” शाहीनबाग में रहने वाली सायमा के बच्चे बीमार हैं, बावजूद इसके वे ज्यादातर समय प्रदर्शन स्थल पर ही बिताती हैं। वह कहती हैं, “यह हक की लड़ाई है। जो सर्दी हमें घर में रहने नहीं दे रही है, वैसे में हम खुले आसमान के नीचे बैठे हैं। कोई तो वजह होगी? प्रधानमंत्री से अपील है कि वे इतने बेरहम न बनें।”

समाजसेवी मोहम्मद अयूम भी इस प्रदर्शन में शामिल हैं, लेकिन एनआरसी पर उनके विचार अलग हैं। वे कहते हैं, “मैं एनआरसी का समर्थन करता हूं, लेकिन अभी हम इससे सौ साल दूर हैं। सरकार को पहले लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करनी होंगी। फिर लोग खुद इसकी मांग करेंगे।” मंच से कुछ दूर खड़े कल्बे आलम कहते हैं, "पुलिस ने दिल्ली से लेकर यूपी तक, हर जगह प्रदर्शन कर रहे लोगों पर ज्यादती की है। सरकार का मकसद किसी को देश में बसाना नहीं, बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ाना है।”

क्यों खास है शाहीनबाग का प्रदर्शन

शाहीन बाग में विरोध-प्रदर्शन की अगुआई महिलाएं कर रही हैं। 15 दिसंबर से कड़ाके की ठंड के बावजूद उनका प्रदर्शन जारी है। आइआइटी दिल्ली से पीएचडी कर रहे आसिफ मुस्तफा बताते हैं कि यहां का प्रदर्शन कई मायनों में अलग है। यह बेहद शांतिपूर्ण है। यहां पुरुष और महिलाएं दोनों साथ-साथ प्रदर्शन कर रही हैं। जो महिलाएं कभी घर से बाहर नहीं निकलीं वे भी आज यहां खुले आसमान के नीचे बैठी हैं। यहां के प्रदर्शन से दूसरे लोग सीख ले रहे हैं।

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से