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16 फरवरी 2026 · FEB 16 , 2026

शहरनामाः नाशिक

सतयुग में पद्मनगर और प्राचीन काल में जनस्थान नाम से विख्यात इस नगरी को राम के वनवास काल में त्रिकंटक कहा गया था
यादों में शहर

परंपरा और अध्यात्म

महाराष्ट्र के उत्तर-पश्चिम में गोदावरी तट पर बसा नासिक, देश के उन गिने-चुने शहरों में है, जहां प्राचीन इतिहास और भविष्य की उड़ान साथ दिखाई देती है। उसे ‘दक्षिण गंगा’ के तट पर बसी नगरी, ‘भारत की अंगूर राजधानी’ और ‘भारतीय सिनेमा की जन्मस्थली’ जैसे नामों से जाना जाता है।

मंदिर प्रवेश सत्याग्रह

नासिक का इतिहास रामायण काल से गहरा जुड़ा है। सतयुग में पद्मनगर और प्राचीन काल में जनस्थान नाम से विख्यात इस नगरी को राम के वनवास काल में त्रिकंटक कहा गया था। मान्यता है कि यहीं लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। इस कारण इस क्षेत्र का नाम नासिक पड़ा। मुगल काल में इसकी प्राकृतिक सुंदरता के कारण इसे गुलशनाबाद यानी फूलों का शहर कहा जाता था। इस शहर की एक और खासियत है। यह नगरी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के सत्याग्रह की गवाह है। 2 मार्च 1930 को उन्होंने यहां मंदिर प्रवेश सत्याग्रह शुरू किया था, क्योंकि उस समय दलितों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।

आस्था का महाकुंभ

कहा जाता है कि भारत के जिन चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी, उनमें एक जगह नासिक है। यहां हर 12 साल में गोदावरी तट पर सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है, जहां करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। यहीं पास में 12 ज्योतिर्लिंगों में एक त्र्यंबकेश्वर का मंदिर है। यह जगह नारायण नागबली विधि के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यह पूजन सिर्फ त्र्यंबकेश्वर में गौतमी नदी के तट पर ही संपन्न की जा सकती है। यहीं पंचवटी और रामकुंड हैं। गोदावरी के किनारे स्थित रामकुंड के बारे में मान्यता है कि राम ने यहां स्नान किया था। कुंभ मेले के मुख्य स्नान में भी इस कुंड में स्नान का बहुत महत्व है। यहां की शाम की आरती मंत्रमुग्ध कर देने वाली होती है। नासिक आएं और कालाराम मंदिर न जाएं, तो कुछ अधूरा-सा लगता है। इस भव्य मंदिर का निर्माण पेशवा काल में 1782 में करवाया गया था, जिसे पूर्ण होने में लगभग 12 साल लगे। यह मंदिर वास्तुकला का अप्रतिम नमूना है। यह पूरी तरह काले पत्थरों से बना है और पत्थरों को जोड़ने के लिए पिघले हुए लोहे का प्रयोग किया गया है। मंदिर का शिखर लगभग 70 फुट ऊंचा है और उस पर शुद्ध सोने का कलश स्थापित है। सरकार वाड़ा भी पेशवा काल की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। फिलहाल उसे संग्रहालय का रूप दे दिया गया है।

एक अजूबा भी

गोदावरी नदी के तट पर यहां एक मिट्टी का बांध है, जो लोगों के लिए आज भी अजूबा है। गंगापुर बांध से ही शहर की मुख्य जल आपूर्ति होती है। गंगापुर बांध के बैकवाटर में पर्यटकों के लिए वॉटर स्पोर्ट और बोटिंग की सुविधा है। यहीं सप्तशृंगी देवी हैं। 51 शक्तिपीठों में एक सप्तशृंगी देवी मंदिर सात पहाड़ियों के बीच बना है। यहां मौजूद कपलेश्वर महादेव संभवतः दुनिया का इकलौता ऐसा शिव मंदिर है जहां नंदी की मूर्ति नहीं है। मान्यता है कि इस मंदिर में नंदी, शिव के सेवक नहीं, बल्कि गुरु की भूमिका में हैं। पास ही जैन सिद्ध क्षेत्र गजपंथ और चमार लेणी है। दोनों ही दिगंबर जैन समाज के पावन तीर्थ हैं, जहां पहाड़ियों पर तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हैं।

और भी बहुत कुछ

भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फालके की कर्मभूमि के साथ यह सावरकर की जन्मभूमि रही है। यहां का सार्वजनिक वाचनालय 180 साल पुराना है, जो आज भी लाखों पुस्तकों को संजोए हुए है। नाशिक में तांबे और पीतल के बर्तन बनाने की पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। यहां इंडिया सिक्योरिटी प्रेस की महत्वपूर्ण इकाई है, जहां 10 से लेकर 500 रुपये तक के नोट छापे जाते हैं। साथ ही, यहां डाक टिकट, पासपोर्ट, वीजा, चेक बुक, सरकारी बॉन्ड और अदालती स्टाम्प पेपर भी छापे जाते हैं। यह दक्षिण एशिया के सबसे बड़े मुद्रण केंद्रों में एक है। इसी तरह देवलाली तोपखाना की स्थापना 1861 में हुई थी। यह एशिया के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण सैन्य केंद्रों में एक है। यहां भारतीय सेना के अधिकारियों और जवानों को तोप चलाने, मिसाइल दागने और आधुनिक युद्ध प्रणालियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। नासिक सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ओझर स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में सुखोई-30 एमकेआइ जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों का निर्माण और रखरखाव होता है।

वाइन कैपिटल और कृषि गौरव

नासिक को भारत की अंगूर राजधानी कहा जाता है। देश के कुल अंगूर निर्यात में इस जिले की हिस्सेदारी लगभग 70 से 80 प्रतिशत है। यहां के अंगूरों को उनकी विशिष्ट गुणवत्ता के कारण ‘जीआइ टैग’ भी मिला है। यहां प्याज की बड़ी मंडी है। नासिक एजुकेशन हब के रूप में उभर चुका है, जहां इंजीनियरिंग के 40, मेडिकल के 12 और मैनेजमेंट के 35 संस्थानों सहित सैकड़ों शिक्षण संस्थान हैं। पर्यटन के लिए 2000 साल पुरानी पांडव लेणी (बौद्ध गुफाएं) और हनुमान का जन्मस्थान माना जाने वाला अंजनेरी पर्वत ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए मुख्य आकर्षण हैं।

खान-पान

अगर आपकी योजना नासिक आने की होती है, तो यहां की मिसल का स्वाद लेना न भूलें। अंकुरित मटकी और नासिक के मशहूर काले मसाले से तैयार तीखी ‘तर्री’ उसकी असली पहचान है। तकरीबन 80 वर्षों के इतिहास वाली यह मिसल आज इतनी लोकप्रिय है कि छुट्टियों के दिनों में प्रसिद्ध मिसल ठिकानों पर मेले जैसा माहौल होता है और लोगों का तांता लगा रहता है। सायंतारा का साबूदाना वडा पूरे महाराष्ट्र में प्रसिद्ध है, जिसे मूंगफली की चटनी और मिर्च के ठेचे के साथ परोसा जाता है। नासिक का चिवड़ा अद्भुत नमकीन पदार्थ है। सफर के लिए बहुत ही जायकेदार लज्जतदार, जो पूरे भारतवर्ष में मशहूर है।

अनिरुद्ध जोशी

(रंगकर्मी)

 

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