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शहरनामा: बलिया

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और क्रांतिकारी मंगल पांडे का बलिया
यादों में शहर

मंगल पांडे से चंद्रशेखर तक

देश का सुदूर दक्षिणी सिरा हो या उत्तरी छोर, पूर्वी इलाका हो या पश्चिमी, अपने मूल निवास का परिचय दिया नहीं कि सबसे पहला नाम सामने आता है, चंद्रशेखर। अक्खड़ समाजवादी, दबंग प्रधानमंत्री चंद्रशेखर। अल्पमत की सरकार बनाने की हिम्मत दिखाने वाले नेता। “तो आप चंद्रशेखर के बलिया के हैं।” 2001 की अकाल रिपोर्टिंग के दौरान कच्छ में इन शब्दों से चिढ़ होती रही। प्रवासी कच्छ वासियों को अपनी माटी के लिए संघर्ष करते देख, भविष्य में पानी की कमी न हो इसकी तैयारियों में जुटे अप्रवासी कच्छियों को अपनी तुलना करने के बाद क्षोभ स्वाभाविक था। सुदूर इलाकों में बलियावासी अक्सर अपना परिचय देते वक्त प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के शहीद मंगल पांडे का नाम धीरे से सरका देते हैं, “मंगल पांडे के बलिया से।”

सुराजी सरकार वाला बलिया

सदानीरा गंगा और घाघरा के बीच बसे बलिया की पहचान है उसकी माटी की अक्खड़ता। मिट्टी की तासीर ही कुछ ऐसी है कि वह झुकना नहीं जानती, चाहे टूट जाए। जिसे पहले स्वाधीनता संग्राम में मंगल पांडे ने दिखाया और भारत छोड़ो के दौरान अंग्रेजों ने महसूस किया। 19 अगस्त 1942 की तारीख हिंदुस्तान के इतिहास में सदा के लिए ताबीर हो गई। शेर-ए-बलिया चित्तू पांडे की अगुआई में सुराजी सरकार बनी। हफ्ते भर तक चलती रही। बलिया का महत्व क्या था, इसे बीबीसी की 26 अगस्त 1942 को प्रसारित रिपोर्ट से समझा जा सकता है। बीबीसी ने कहा था, “बलिया पर फिर से कब्जा कर लिया गया।” इस अक्खड़पन की कीमत भी बलिया को चुकानी पड़ी। अब भी चुका रहा है। राजनीति से उम्मीद थी कि वह इसकी भरपाई करेगी लेकिन उसने लगातार निराश ही किया है।

उपजाऊ माटी, पौराणिक महत्व

आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मान्यता है कि संसद में नुमाइंदगी करने वाला जितना ताकतवर होगा, उसका इलाका उतना ही विकसित होगा। राष्ट्रीय राजनीति में छाप छोड़ने वाले चंद्रशेखर हों या बाद के दिनों के राजनेता, उनकी कहानियां न ही कही जाएं तो अच्छा। घाघरा को यहां सरयू भी कहा जाता है। सरयू और गंगा की मिट्टी से सजी बलिया की माटी बेहद उपजाऊ है। इतनी कि गर्मियों में भी यहां फसल लहलहाती नजर आती है, बशर्ते सिंचाई का इंतजाम हो।

बलिया सांस्कृतिक रूप से भी बहुत समृद्ध है। दुष्ट दलन की राम यात्रा इसी इलाके से गुजरी थी। सीता ने वन में जिस आश्रम में वक्त गुजारा था, वह वाल्मीकि आश्रम भी यहीं था। लव-कुश के प्रशिक्षण की भूमि भी बलिया रहा है। पौराणिक राजा बलि की धरती, पुष्यमित्र की धरती, मगध साम्राज्य की धरती, उसकी संस्कृति के तमाम आयाम हैं यहां। गंगा और सरयू का किनारा तपस्वियों की पसंदीदा जगह रहा है। यहां तमसा नदी भी बहती है। स्थानीय लोग इसे टोंस कहते हैं। तमसा का तट भी ऋषि-मुनियों से आबाद रहा है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा से महीने भर तक चलने वाला ददरी मेला तो विख्यात है ही, महर्षि भृगु के शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर लगने वाले इस मेले की ख्याति नेपाल, बिहार, पंजाब तक थी। लेकिन समय के साथ इसे जो प्रशासनिक सहयोग मिलना चाहिए था, नहीं मिला। मेला चमक खोने लगा। कहा जाता है, विष्णु की छाती में लात मारने के कारण भृगु जी को ब्रह्महत्या का पाप लगा था। तब ऋषियों ने उन्हें सूखा बांस देकर गंगा के किनारे-किनारे पूरब की ओर चलने का सुझाव दिया। उनके अनुसार, जहां ये बांस हरा हो जाए, समझिए वह भूमि पवित्र है। वहीं तपस्या करने से उन्हें ब्रह्महत्या से मुक्ति मिलेगी। भृगु को यहां की माटी ने ब्रह्महत्या से मुक्ति दी। बलिया को भृगुक्षेत्र भी कहा जाता है।

भदेस शहर

यहां सबसे बड़ा सांस्कृतिक केंद्र है, तो अखबारों के जिला दफ्तर और रेलवे स्टेशन के दक्षिण तरफ खरौनी कोठी का प्रतिभा प्रकाशन। इसे बलियाभर के छात्र और पढ़ाकू लोग पीयूष शिक्षा केंद्र के नाम से जानते हैं। पीयूष शिक्षा केंद्र को मिनी कॉफी हाउस भी कहा जा सकता है। यहां रोजाना शाम गंभीर किस्म के लेखक, पत्रकार, राजनेता और संस्कृतिकर्मी विजय की चाय की चुस्कियों के बीच सांस्कृतिक-राजनीतिक चर्चा में जुटते हैं। यहां देशभर की तमाम लघु, सीमांत हर तरह की हिंदी पत्रिकाएं मिल जाती हैं। इसी ठीये से स्थानीय टाउन इंटर कालेज में अध्यापक और अद्भुत कहानीकार नरेंद्र शास्त्री जुड़े थे। बलिया शहर कई बार उजड़ा और बसा। बांध बनने से पहले गंगा की बाढ़ ने इसे कई बार उजाड़ा। आज का मूल शहर अंग्रेजों का बसाया है। तमाम दुश्वारियों के बावजूद शहर अपने ढंग से लुभाता है। यहां के भारत भंडार, कृष्णा भंडार और क्षीर सागर के रसगुल्ले, चौक की मिठाई की दुकान के गुलाब जामुन और लवंग लता, सतीशचंद्र कालेज के पास की बिना दूध वाली नमक-चीनी मिश्रित चाय बिना बलिया की यात्रा पूरी नहीं होती। यहां के लिट्टी-चोखे ने ऐसी ख्याति बटोरी है कि दूसरे शहरों तक में यह बलिया के नाम से ही बिकती है। बलिया की यह पहचान उसके भदेसपन के साथ चिपक गई है। भदेसपन और अक्खड़ता का मिश्रण कभी-कभी सभ्यताहीनता का भी आभास देता है। इसके बावजूद बलिया की हवाओं में कुछ खास है, जो यहां आते ही अजीब सी स्फूर्ति से भर देता है। चिंता पीछे छूट जाती है और गंगा के अविरल नीर की तरह ही दिल बन जाता है पानीदार।

उमेश चतुर्वेदी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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