छात्रवृत्ति की लूट लीपापोती की कोशिश

देहरादून से अजीत सिंह
संगठित लूटः छात्रवृत्ति घोटाला उत्तराखंड के समाज कल्याण विभाग से जुड़ा है (फाइल फोटो)
संगठित लूटः छात्रवृत्ति घोटाला उत्तराखंड के समाज कल्याण विभाग से जुड़ा है (फाइल फोटो)

देहरादून से अजीत सिंह
घोटाले में नेताओं और अफसरों के शामिल होने के आरोप, हाइकोर्ट ने 30 सितंबर तक रिपोर्ट देने को कहा

देश के कई राज्यों में आजकल छात्रवृत्ति घोटाले सुर्खियों में हैं। हिमाचल प्रदेश में इन गड़बड़ियों की सीबीआइ जांच चल रही है, तो हरियाणा में कई आला अफसर गिरफ्तार हो चुके हैं। लेकिन उत्तराखंड का मामला जांच में ही उलझा हुआ है। यहां के प्राइवेट कॉलेजों में फर्जी दाखिले के जरिए मैट्रिक के बाद की छात्रवृत्ति हड़पने के कई मामले और कई जांच रिपोर्ट सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद दोषियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया न केवल धीमी है, बल्कि जांच अटकाने की कोशिशें भी की जा रही हैं। भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करने के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के दावे के बावजूद छात्रवृत्ति घोटाले की सीबीआइ जांच के लिए भाजपा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष रवींद्र जुगरान को उत्तराखंड हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। फिलहाल उनकी जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है। छात्रवृत्ति में गड़बड़ियों की जांच के लिए उत्तराखंड सरकार ने 2018 में विशेष जांच दल (एसआइटी) गठित किया था, लेकिन जांच की प्रगति इतनी धीमी है कि हाइकोर्ट भी कई बार नाराजगी जाहिर कर चुका है। हाइकोर्ट से फटकार के बाद एसआइटी ने हरिद्वार के कई कॉलेज संचालकों और पूर्व जिला समाज कल्याण अधिकारी अनुराग शंखधर पर शिकंजा कसा, मगर करीब 500 करोड़ रुपये के इस घोटाले को अंजाम देने वाले आला अफसरों, बड़े नेताओं और कॉलेज संचालकों के गठजोड़ पर आंच नहीं आई। सभी दलों के नेताओं के हित जुड़े होने के कारण ज्यादा राजनीतिक दबाव भी नहीं बना। पिछले महीने हाइकोर्ट के निर्देंश पर एसआइटी का दायरा हरिद्वार और देहरादून के अलावा राज्य के बाकी 11 जिलों तक बढ़ाया गया है।

2014-15 में एक निजी यूनिवर्सिटी से जुड़े मामले से छात्रवृत्ति की संगठित लूट उजागर हुई थी। विजिलेंस जांच में पता चला कि छात्रवृत्ति हड़पने के लिए उत्तराखंड के विभिन्न जिलों से एक एनजीओ के जरिए 433 छात्रों के दाखिले राजस्थान की एक निजी यूनिवर्सिटी में कराए गए। बिचौलियों ने छात्रों को लालच देकर दाखिले के लिए दस्तावेज जुटाए। जिन छात्रों को यूनिवर्सिटी में पढ़ता दिखाया गया, उनमें से कई खेतों में काम करने वाले मजदूर निकले। इस मामले में यूनिवर्सिटी के चेयरमैन समेत कई लोगों की गिरफ्तारी के बाद छात्रवृत्ति हड़पने के और कई मामले उजागर हुए, मगर इसके लिए दोषी आला अधिकारियों पर कोई गाज नहीं गिरी।

उत्तराखंड में छात्रवृत्ति घोटाले की परतें खोलने में जुटे आरटीआइ कार्यकर्ता और वकील चंद्रशेखर करगेती कहते हैं कि इस गोरखधंधे में बड़े अधिकारियों, मंत्रियों और नेताओं की भूमिका की जांच होनी चाहिए थी, लेकिन एसआइटी अभी तक सिर्फ जिला स्तर के छोटे अधिकारियों और कॉलेज संचालकों तक पहुंची है। आरटीआइ से प्राप्त सचिवालय की फाइल नोटिंग से पता चलता है कि कैसे मंत्री स्तर से ही जांच कमजोर करने के प्रयास किए गए। समाज कल्याण विभाग के जिन अधिकारियों पर सवाल उठ रहे हैं, वे ही जांच में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

छात्रवृत्ति देने में गड़बड़ियों का सिलसिला साल 2012 के बाद तेज हुआ था। उस साल राज्य सरकार ने नई व्यवस्था लागू की। इसके तहत आरक्षित श्रेणी के छात्र बिना फीस जमा किए प्राइवेट कॉलेजों में दाखिला ले सकते थे। इसके एवज में छात्रवृत्ति का पैसा सीधे कॉलेजों को दिया जाएगा। इस व्यवस्था को कई कॉलेजों ने फर्जी दाखिले कर छात्रवृत्ति हड़पने का जरिया बना लिया। यहां तक कि कई कॉलेज छात्रवृत्ति के लिए दाखिले कराने वाले बिचौलियों को 40 फीसदी तक कमीशन देने लगे।

फर्जी दाखिलों का खेल

2017 में उत्तराखंड के समाज कल्याण विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त सचिव वी. षणमुगम की अध्यक्षता में समिति गठित कर जांच कराई गई थी। इसमें छात्रवृत्ति वितरण में अनेक गड़बड़ियां उजागर हुईं। समिति ने नमूने के तौर पर देहरादून और हरिद्वार जिलों में छात्रवृत्ति पाने वाले कई छात्रों की पड़ताल की, तो पता चला कि अधिकतर छात्रों को एजेंटों के जरिए केवल छात्रवृत्ति पाने के लिए दाखिला दिलाया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए समिति ने उच्चस्तरीय जांच की सिफारिश की, लेकिन साल भर तक यह सिफारिश ठंडे बस्ते में पड़ी रही।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद मई 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जांच के लिए एआईटी बनाने का फैसला किया, क्योंकि मामले की शिकायत प्रधानमंत्री तक पहुंच चुकी थीं। लेकिन जिस एसआइटी का गठन तीन माह में होना था, उसमें एक साल लग गया। इस दौरान समाज कल्याण विभाग, कॉलेजों और दलालों को खामियां दुरुस्त करने का पूरा मौका मिल गया। जून 2018 में एसआइटी बनी और पहला केस दिसंबर 2018 में दर्ज किया गया। एसआइटी गठन में देरी को असामान्य मानते हुए हाइकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब-तलब किया और पूछा कि क्यों न जांच सीबीआइ को सौंप दी जाए।

रवींद्र जुगरान ने आउटलुक से कहा कि अगर त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार दोषियों को सजा दिलाने की मंशा रखती, तो उन्हें हाइकोर्ट में जनहित याचिका नहीं लगानी पड़ती। जुगरान इस मामले में प्रदेश सरकार के साथ-साथ विपक्ष के नेताओं, आला अफसरों और कॉलेज संचालकों की मिलीभगत को जांच में ढिलाई की वजह बताते हैं। उनका कहना है, “पूरा सिस्टम छात्रवृत्ति घोटाले के दोषियों को बचाने में लगा हुआ है। जिन अधिकारियों ने इस घपले को उजागर करना चाहा, उन्हें दरकिनार कर प्रताड़ित किया जा रहा है जबकि दोषी अफसरों पर सरकार मेहरबान है।”

जांच में अड़चनें

खुद एसआइटी को कम बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ रहा है। समाज कल्याण विभाग से छात्रवृत्ति के दस्तावेज जुटाने में ही एसआइटी के पसीने छूट गए। जनवरी 2019 में हाइकोर्ट ने जांच में देरी पर सवाल उठाए तो एसआइटी इंचार्ज डॉ. टी.सी. मंजूनाथ ने समाज कल्याण विभाग से जांच में सहयोग और दस्तावेज न मिलने की बात कही थी। इससे राज्य सरकार की काफी किरकिरी हुई और डॉ. मंजूनाथ का तबादला कर पूरी एसआइटी को बदलने का फैसला किया गया। अदालत को सूचित किए बगैर एसआइटी इंचार्ज को हटाने और पूरी टीम बदलने पर नाराजगी जाहिर करते हुए उत्तराखंड हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश रंगनाथन और जस्टिस आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। कोर्ट ने डॉ. मंजूनाथ के तबादले पर भी रोक लगा दी। हैरानी की बात है कि हाइकोर्ट की लगातार निगरानी और कई बार फटकार के बावजूद एसआइटी की जांच में तेजी नहीं दिख रही है। गत 12 सितंबर को हाइकोर्ट ने जांच में प्रगति पर असंतोष जाहिर करते हुए एसआइटी को 30 सितंबर तक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।

देहरादून अभी दूर

उधर, छात्रवृत्ति में गड़बड़ियों की जांच में तेजी लाने का दावा करते हुए एसआइटी इंचार्ज (हरिद्वार व देहरादून) डॉ. टी.सी. मंजूनाथ ने आउटलुक को बताया कि उन्हें संबंधित विभागों से दस्तावेज मिल चुके हैं। इनकी जांच-पड़ताल के बाद हरिद्वार के 13 कॉलेजों से जुड़े 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। देहरादून के कॉलेजों की जांच भी तेजी से चल रही है। जांच में धीमी प्रगति के सवाल पर मंजूनाथ का कहना है कि हजारों दस्तावेज हैं, इन्हें खंगालने में समय लगता है और पुख्ता सबूतों के बगैर कोई कार्रवाई करना उचित नहीं होगा। मिली जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड के तीन जिलों देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर में साल 2014-15 और 2015-16 के दौरान 380 कॉलेजों को करीब 106 करोड़ रुपये छात्रवृत्ति के तौर पर बांटे गए थे। अभी तक इनमें से बमुश्किल 20-25 कॉलेजों की जांच हुई है।

एसआइटी जांच में गति हाइकोर्ट की फटकार के बाद ही आई है। फिर भी अभी तक एसआइटी ने सिर्फ हरिद्वार जिले के कॉलेजों पर शिकंजा कसा है। देहरादून में जहां भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं के कॉलेज हैं, वहां जांच सुस्त है। हालांकि, उत्तराखंड के समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य कहते हैं कि उन्होंने पहले दिन से ही जांच को लेकर सख्ती दिखाई है। एसआइटी पर किसी तरह का दबाव होने से भी उन्होंने इनकार किया। उत्तराखंड कांग्रेस के उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना का कहना है कि राज्य में बहुत से कॉलेज सिर्फ छात्रवृत्ति का पैसा हजम करने के लिए चल रहे हैं। जगजाहिर होने के बावजूद सरकार दोषियों को बचाने में जुटी है। धस्माना के मुताबिक, ईमानदारी का दावा करने वाली सरकार भाजपा नेताओं के कॉलेजों की जांच करके दिखाए।

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