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रूस-यूक्रेन युद्ध: दादागीरी की जंग विभीषिका

युद्ध से रूस और यूक्रेन तो कई दशक पीछे चले ही जाएंगे, भारत समेत शेष विश्व के लिए भी समस्याएं बढ़ेंगी
युद्ध में जान गंवाने वाले एक सैनिक का शव

रविवार, 27 फरवरी। यूक्रेन के मारिउपोल के रिहायशी इलाके में रूस की गोलाबारी में छह साल की एक बच्ची गंभीर रूप से घायल हो जाती है। उसे लेकर माता-पिता अस्पताल दौड़ते हैं। डॉक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद बच्ची दम तोड़ देती है। उसे ऑक्सीजन देने की कोशिश कर रहे एक डॉक्टर रोते हुए कहते हैं, “पुतिन को यह दिखाओ, उसे बच्ची की आंखें दिखाओ।” यही है युद्ध की विभीषिका जो यूक्रेन पर थोपी गई है। राजधानी कीव से लेकर रूस की सीमा के पास खारकीव तक तबाही का भयानक मंजर है। रूस ने भले ही कहा कि वह आम नागरिकों पर हमला नहीं करेगा, लेकिन यू्क्रेन में मिल रहे जबरदस्त प्रतिरोध के बाद उसने रिहायशी इलाकों पर हमले शुरू कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सोमवार तक रूसी हमले में सौ से ज्यादा नागरिक मारे जा चुके थे। सोमवार को बेलारूस सीमा पर रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध विराम पर बातचीत हुई, लेकिन सहमति सिर्फ आगे बातचीत जारी रखने पर हुई। किसी को उम्मीद भी नहीं है। वार्ता के साथ रूस ने हमला भी तेज कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र रिफ्यूजी एजेंसी के मुताबिक पांच लाख से अधिक शरणार्थी यूक्रेन से पड़ोसी देशों में जा चुके हैं।

रूस ने यूक्रेन के रिहायशी इलाकों पर भी बम और रॉकेट बरसाए हैं

रूस ने यूक्रेन के रिहायशी इलाकों पर भी बम और रॉकेट बरसाए हैं

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेन्स्की रूसी सैनिकों को तत्काल हटाने की मांग कर रहे हैं। संकट की इस घड़ी में वे एक हीरो बनकर उभरे हैं। अमेरिका ने उन्हें सुरक्षित निकालने की पेशकश की तो जवाब में जेलेन्स्की ने कहा, “हमें भागने के लिए वाहन नहीं, लड़ने के लिए हथियार चाहिए।” हीरो यूक्रेन का वह सैनिक भी हो गया जिसने रूसी सैनिकों को रोकने के लिए पुल के साथ खुद को बम से उड़ा दिया।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 24 फरवरी 2022 को चार करोड़ की आबादी वाले यूक्रेन के दो इलाकों लुहान्स्क और दोनेत्स्क को स्वतंत्र देश की मान्यता देने के साथ वहां सैन्य अभियान का ऐलान कर दिया। देश के पूर्वी हिस्से में करीब आठ साल तक रूस समर्थित अलगाववादियों से लड़ने के बाद अब यूक्रेन परमाणु संपन्न पड़ोसी देश का हमला झेल रहा है। रूस ने उत्तर, दक्षिण और पूरब तीन दिशाओं से हमला किया है। पुतिन का कहना है कि लुहान्स्क और दोनेत्स्क में यूक्रेन ने रूसी भाषी लोगों का नरसंहार किया है। खुद को ताउम्र राष्ट्रपति बनाने के बाद शायद पुतिन यूरोप के इतिहास को भी नया बनाना चाहते हैं।

कहां जाएं

कई लोग देश छोड़ कर जाने को मजबूर

पुतिन के आदेश के बाद रूस में नाभिकीय हथियार हाई अलर्ट पर रखे गए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह संकट तीसरे विश्व युद्ध की ओर नहीं बढ़ेगा। शायद इसी आशंका को टालने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देश युद्ध के मैदान में यूक्रेन के साथ खड़े नहीं हुए और अभी तक रूस पर सिर्फ आर्थिक पाबंदियां लगाई हैं। इन पाबंदियों का असर अंततः रूस के नागरिकों को भुगतना पड़ेगा। इसलिए रूस के भीतर भी पुतिन का काफी विरोध हो रहा है। संभवतः प्रतिबंधों का ही असर है कि पुतिन यूक्रेन से बातचीत पर राजी हुए हैं।

रूस ने यूक्रेन के उत्तर में बेलारूस से भी हमला किया है। यूक्रेन के खुफिया सूत्रों का कहना है कि बेलारूस भी रूसी सैनिकों के साथ आ सकता है। अमेरिका ने बेलारूस में दूतावास बंद कर दिया है और मॉस्को स्थित दूतावास में भी सिर्फ जरूरी अधिकारियों को रुकने के लिए कहा है। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। यूरोपीय संघ ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए यूक्रेन के लिए हथियार खरीद की फंडिंग करने का फैसला किया है। दरअसल, उसे डर है कि पुतिन यूक्रेन में ही नहीं थमेंगे, आगे भी जा सकते हैं।

पुतिन पर अंकुश लगाने के लिए अमेरिका और यूरोप के साथ अनेक देशों ने रूस पर पाबंदी लगाने का ऐलान किया है। अब तक का सबसे बड़ा ‘प्रहार’ रूस के बैंकों पर हुआ है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, इंग्लैंड, जापान और कनाडा जैसे प्रमुख देशों ने रूस के बैंकों को ‘स्विफ्ट’ से बाहर कर दिया है। स्विफ्ट एक वैश्विक फाइनेंशियल मैसेजिंग सर्विस है जिसका इस्तेमाल बैंकों के बीच लेनदेन में होता है। दुनिया के 11 हजार से अधिक बैंक इसका इस्तेमाल करते हैं। किसी बैंक को इससे बाहर करने का मतलब है उसके लिए किसी दूसरे बैंक में पैसे भेजना या लेना मुश्किल हो जाएगा।

फंसे हुए भारतीय छात्र

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रूस के बड़े बैंकों के सामने संकट खड़ा हो गया है। कुछ बैंकों के तो बंद होने की नौबत आ गई है क्योंकि उनके ग्राहकों में पैसे निकालने के लिए आपाधापी मची है। पुतिन ने आठ वर्षों के दौरान 630 अरब डॉलर का युद्ध फंड तैयार किया था, जो अंतरराष्ट्रीय रिजर्व के रूप में है। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस के सेंट्रल बैंक के लेनदेन पर ही रोक लगा दी है। अमेरिका ने डॉलर ट्रांजैक्शन पर भी पाबंदी लगाई है। इससे उसके सभी विदेशी ऐसेट फ्रीज हो गए हैं। अमेरिका की रणनीति है कि पुतिन यूक्रेन में जितना आगे बढ़ेंगे, रूस की अर्थव्यवस्था उतनी ही पीछे जाएगी।

पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बाद रूस की मुद्रा रूबल 30 फीसदी से अधिक गिर गई है। उसे बचाने के लिए रूस के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दर 9.5 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दी। सोचिए आम लोगों के लिए कर्ज लेना कितना महंगा होगा। रूसी शेयर बाजार 50 फीसदी से ज्यादा गिर चुके हैं। आलम यह है कि सोमवार को मॉस्को स्टॉक एक्सचेंज को खोला ही नहीं गया। अर्थशास्त्रियों ने रूस की अर्थव्यवस्था पांच फीसदी घट जाने की आशंका जताई है।

प्रतिबंधों की घोषणा के बाद पश्चिमी देशों की कई कंपनियों और बैंकों ने रूस से बाहर निकलने का फैसला किया है। रूस कच्चे तेल और गैस का बड़ा निर्यातक है, लेकिन वह आम जरूरत की बहुत सी चीजों के लिए आयात पर निर्भर करता है। रूबल महंगा होने से वस्तुओं के दाम अचानक बेतहाशा बढ़ गए हैं। बैंकों के स्विफ्ट से बाहर होने के बाद रूसी कंपनियों के लिए तेल और गैस का निर्यात करना भी मुश्किल हो जाएगा। अमेरिका और यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने हवाई क्षेत्र रूसी विमानों के लिए बंद कर दिया है। जवाब में रूस ने भी 36 देशों की एयरलाइंस को प्रतिबंधित कर दिया।

इस युद्ध से रूस और यूक्रेन तो दशकों पीछे चले ही जाएंगे, बाकी दुनिया के लिए भी मुश्किलें बढ़ेंगी। तात्कालिक असर तो कच्चे तेल की कीमतों पर हुआ है जो 2014 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। युद्ध जल्दी खत्म हो जाता है तो शायद रूस पर लगा प्रतिबंध भी ज्यादा दिन न रहे, लेकिन हालात पहले जैसे नहीं रह जाएंगे। देश रूस के साथ संबंधों का नए सिरे से आकलन करेंगे। जर्मनी जैसे यूरोपीय देश रूस से सबसे अधिक कच्चा तेल और गैस खरीदते हैं, वे उस पर निर्भरता कम करना चाहेंगे। दुनिया के एक बार फिर शीत युद्ध के दौर में लौटने की आशंका रहेगी।

युद्ध की नौबत क्यों

तनाव बढ़ने के पीछे कई ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण गिनाए जा सकते हैं, मगर इस समय ‘नाटो’ इसके केंद्र में है। यूक्रेन को लगता है कि वह यूरोपीय संघ और नाटो का हिस्सा बनकर खुद को मजबूत बना सकता है। सोमवार को जेलेन्स्की ने एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि वे यूरोपीय संघ का तत्काल हिस्सा बनने के लिए आवेदन कर रहे हैं। रूस को डर है कि यदि यूक्रेन नाटो का सदस्य बन गया तो ‘दुश्मन’ देशों की पहुंच उसकी सरहद तक हो जाएगी। इसलिए पुतिन यूक्रेन में अपनी पसंद की सरकार चाहते हैं। दूसरी दलील है कि पूर्वी यूक्रेन कोयले और लोहे से समृद्ध है। वहां जमीन भी काफी उपजाऊ है। पुतिन की निगाह उन खदानों पर है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि पुतिन ने यूक्रेन संकट के बहाने अमेरिका के नेतृत्व वाले एकध्रुवीय विश्व को चुनौती दी है। पुतिन ने अपने संबोधन में साफ कहा कि रूसी कार्रवाई में दखल देने के नतीजे अभूतपूर्व होंगे।

मारिउपोल में छह साल की घायल बच्ची, जिसे डॉक्टर बचा न सके

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पुतिन पहले तो यूक्रेन पर हमले की किसी योजना से महीनों इनकार करते रहे। 24 फरवरी को भी जब यूक्रेन में सैनिक भेजे तो उसका उद्देश्य शांति कायम करना बताया। अब पुतिन का कहना है कि यूक्रेन की तरफ से पेश किए जा रहे खतरों के जवाब में यह कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि रूस का लक्ष्य यूक्रेन पर कब्जा करना नहीं है। मौजूदा हालात के लिए उन्होंने यूक्रेन के शासन को जिम्मेदार ठहराया।

दूसरी ओर, कभी कॉमेडियन रहे राष्ट्रपति जेलेंस्की जिस तरह यूक्रेन का नेतृत्व कर रहे हैं, उससे अपने देश में ही नहीं दूसरे देशों में भी उनकी छवि नायक की बन गई है। यूक्रेन में जबरदस्त विरोध झेल रहे रूस के मीडिया ने अफवाह फैला दी कि जेलेंस्की देश छोड़ गए हैं। लेकिन जेलेंस्की ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा, “मैं यहीं हूं। हमने हथियार नहीं डाले हैं...यह हमारी जमीन है, हमारा देश है, हमारे बच्चे हैं और हम इन सबकी रक्षा करेंगे।”

पुतिन के नाभिकीय हथियारों को अलर्ट करने के बाद खतरा बढ़ता लग रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि रूस ने उनके सामने दो ही विकल्प छोड़े हैं। पहला विकल्प तीसरा विश्वयुद्ध है और दूसरा आर्थिक प्रतिबंध। बाइडेन ने अभी तक रूस के खिलाफ सेना भेजने की किसी भी योजना से इनकार किया है। आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए ही रूस पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया, हालांकि रूस के वीटो करने के कारण प्रस्ताव गिर गया।

अमेरिका और यूरोप के 30 देशों के संगठन नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) ने अपने पूर्वी छोर पर लड़ाकू विमानों को अलर्ट पर रखा है। हालांकि इसके सैनिक तभी युद्ध में हिस्सा लेते हैं जब उसके सदस्य देश उसमें शामिल हों। यूक्रेन अभी तक नाटो का सदस्य नहीं बना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि नाटो ने यूक्रेन का साथ दिया, तो तीसरा विश्व युद्ध छिड़ सकता है। पुतिन ने नाटो के विस्तार पर आपत्ति जाहिर करते हुए पिछले वर्ष 23 दिसंबर को कहा था, “नाटो का पूरब में विस्तार हमें मंजूर नहीं है। अमेरिका हमारे दरवाजे पर मिसाइलों के साथ खड़ा है। यदि कनाडा या मेक्सिको की सीमा पर मिसाइलें तैनात कर दी जाएं तो अमेरिका को कैसा लगेगा?”

भारत के लिए परीक्षा की घड़ी

हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस और यूक्रेन के राष्ट्र प्रमुखों से बात कर चुके हैं और शांति तथा बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। भारतीय कूटनीति के लिए चुनौती यह है कि एक ओर पुराना भरोसेमंद साथी रूस है तो दूसरी ओर अमेरिका। यूक्रेन से भी भारत के अच्छे रिश्ते हैं। भारत रूस और अमेरिका दोनों के साथ कूटनीतिक संबंध चाहता है। पुतिन से मोदी की बातचीत को इस सदर्भ में देखा जा रहा है कि प्रधानमंत्री अमेरिका को संदेश देना चाहते थे। यूक्रेन को राहत सामग्री भेजना भी इसी कूटनीति का हिस्सा है। संतुलन बनाते हुए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पर मतदान में हिस्सा नहीं लिया।

इस नीति को सही ठहराते हुए अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर संदीप कुमार कहते हैं, “रूस भारत का अहम सहयोगी रहा है। इसलिए उसके खिलाफ न जाने के बावजूद अपनी कूटनीतिक साख बनाए रखने की चुनौती है।” अमेरिका भी भारत की दुविधा को समझता है। इसलिए व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा, “हम रूस के साथ भारत के संबंधों से वाकिफ हैं और भारत की स्थिति समझते हैं।”

हालांकि अमेरिका ने भारत से यह जरूर कहा है कि वह रूस पर अपने रिश्तों के प्रभाव का इस्तेमाल करे। रूस ने अब तक भारत के रुख की तारीफ की है। विशेषज्ञ इसे ‘एक तरफ कुंआ, दूसरी तरफ खाई’ की स्थिति मानते हैं। जेएनयू के रूसी अध्ययन केंद्र में असिस्टेंट प्रोफेसर योगेश राय कहते हैं, “भारत अमेरिका और यूरोप के साथ खड़ा होता है, तो रूस नाराज होगा। अगर रूस के साथ जाता है, तो अमेरिका नाराज होगा। रूस का साथ देकर चीन खुद को मजबूत और अमेरिकी गठबंधन को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। संतुलन के फेर में भारत को दोनों तरफ से नाराजगी मोल लेने को तैयार रहना चाहिए।”

दहशत के साए में

घर छोड़ रिफ्यूजी कैंप में रहने को मजबूर

रूस-यूक्रेन युद्ध भारत की अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ सकता है। कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने के बाद पेट्रोल और डीजल महंगा होना तय है। अब लोग सिर्फ यह अनुमान लगा रहे हैं कि 7 मार्च को उत्तर प्रदेश में आखिरी चरण की वोटिंग के बाद कीमत कितनी बढ़ेगी। डीजल महंगा होने पर माल ढुलाई महंगी हो जाएगी। खाद्य तेल भी महंगे होंगे। भारत में पाम, सोयाबीन और सरसों तेल के बाद सूरजमुखी तेल की खपत ही सबसे ज्यादा होती है। भारत जरूरत का 98 फीसदी सूरजमुखी तेल आयात करता है और 93 फीसदी आयात यूक्रेन तथा रूस से होता है। 2020-21 में 22 लाख टन सूरजमुखी तेल का आयात किया गया था। इसमें से यूक्रेन से 17.4 लाख टन और रूस से 2.8 लाख टन का आयात हुआ। सूरजमुखी तेल का यूक्रेन और रूस से निर्यात बंद होने पर दूसरे तेलों की मांग बढ़ेगी तो उनके दाम भी बढ़ेंगे।

अर्थव्यवस्था के दूसरे सेक्टर भी प्रभावित होंगे। उदाहरण के लिए, सीमेंट बनाने का खर्च 10 फीसदी से अधिक बढ़ सकता है क्योंकि सीमेंट की कीमत का करीब 65 फीसदी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कच्चे तेल की कीमत से जुड़ा होता है। सरकारी कंपनी ईसीजीसी ने रूस को होने वाले निर्यात पर क्रेडिट गारंटी खत्म कर दी है। इससे रूस और राष्ट्रकुल देशों को निर्यात संकट में पड़ गया है। भारत हर साल रूस को करीब 2.5 अरब डॉलर और राष्ट्रकुल देशों को 1.5 अरब डॉलर का निर्यात करता है। बड़ा असर सरकार पर भी होगा। 2022-23 के बजट के सभी आंकड़े इस अनुमान पर आधारित हैं कि कच्चे तेल की कीमत 75 डॉलर प्रति बैरल रहेगी। अभी यह 100 डॉलर से ऊपर है। युद्ध थोड़ा लंबा खिंचा तो दाम और बढ़ सकते हैं। यानी हालात जल्दी न सुधरे तो बजट के सभी आकलन ध्वस्त हो जाएंगे, जिसका असर विकास दर पर होगा। विकास दर धीमी होने पर सरकार का राजस्व कम होगा। बजट में निवेश के लिए काफी गुंजाइश बताई गई थी, लेकिन वह गुंजाइश भी अब खत्म होती लग रही है।

 

जो बाइडेन

पुतिन आक्रांता हैं। पुतिन ने यह युद्ध चुना है। अब वे और उनका देश इसका अंजाम भुगतेंगे

जो बाइडेन, राष्ट्रपति, अमेरिका

 

वोलोदिमीर जेलेंस्की

मुझे देश छोड़कर भागने के लिए वाहन नहीं, यहां लड़ने के लिए हथियार चाहिए

वोलोदिमीर जेलेंस्की, राष्ट्रपति, यूक्रेन

 

ब्लादिमिर पुतिन

अगर किसी ने दखल दिया तो अंजाम ऐसा होगा जो पहले किसी ने नहीं देखा होगा

व्लादिमीर पुतिन, राष्ट्रपति, रूस

सर्गेई

संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन के स्थायी प्रतिनिधि सर्गेई किसलित्स्या ने कहा है कि रूस के किसी आश्वासन पर भरोसा नहीं किया जा सकता

 

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