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8 अगस्त 2022 · AUG 08 , 2022

आवरण कथा/नजरिया: नए आदर्श अल्पसंख्यक

ऋषि सुनक, कमला हैरिस और बॉबी जिंदल जैसे राजनैतिक शख्सियतों का उभार अल्पसंख्यक सशक्तीकरण और तुष्टीकरण के खिलाफ उग्र आवाजों की निकालती है हवा
अधिकारों के खातिरः अमेरिका में ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन की एक झलक

भारतीयों की विदेश में कामयाब कहानियों के ताजा पोस्टर बॉय ऋषि सुनक हैं। हाल तक वे ब्रिटेन के वित्त मंत्री (चांसलर ऑफ एक्सचेकर) थे और अब अगले प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में हैं। वे और उनके माता-पिता 2001 में बीबीसी की मिडिल क्लासेज डॉक्यूमेंटरी में दिखे थे। प्रतिष्ठित विंचेस्टर कॉलेज में पढ़े सुनक कैमरे पर बोले कि ब्रितानी अभिजनों और उच्च वर्ग में तो उनके दोस्त हैं, मगर, उन्होंने जोर देकर कहा, “कामगार वर्ग में नहीं।”

उस इंटरव्यू के दो दशक बीत गए और इन दिनों उसके क्लिप ट्विटर और टिकटॉक पर वायरल हैं, तबसे सुनक ने अपने चुनींदा संगी-साथियों से बड़े शौक से रिश्ते प्रगाढ़ किए। ऑक्सफोर्ड और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने के बाद वे निवेश बैंकों और बड़े फंडों को सलाह देने लगे। फिर, वे उत्तरी यार्कशायर में कंजरवेटिव पार्टी की “सुरक्षित” सीट रिचमंड से सांसद बने। इसी बीच, उनकी शादी इंफोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायणमूर्ति की बेटी से हो गई। अब इस दंपती की गिनती ब्रिटेन के सबसे अमीरों में होती है।

सुनक भारतीय मूल के कुछ उन सियासी शख्सियतों में हैं, जो हाल में पश्चिम में महत्वपूर्ण होकर उभरे हैं। इनमें ब्रितानी होम सेक्रेटरी प्रीटी पटेल, अमेरिका में पूर्व गवर्नर तथा राष्ट्रपति पद के दावेदार निक्की हेली तथा बॉबी जिंदल और सबसे गौरतलब अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस हैं। इस मुकाम पर उनकी मौजूदगी को भारतीयों की प्रतिभा और लगन की देन की तरह देखा जा रहा है, जो उन्हें हर जगह खड़े होने की ताकत दे देती है या फिर उसे “समावेशी” पश्चिमी समाज में अंतरनिहित संभावनाओं का सबूत माना जा रहा है, जिससे आप्रवासियों और दूसरे नस्ल-रंग के लोगों की संभावनाएं खिल उठती हैं।

तनावः अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

तनावः अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

लेकिन सुनक की कहानी जो कह रही है, उससे तो सच्चाई बिल्कुल उलटी लगती है। भारतीयों को मिली नई कामयाबियां बता रही है कि कैसे पश्चिमी उदार लोकतंत्रों का ढांचा सुविधासंपन्न और ताकतवरों को पुरस्कृत करता है या उन लोगों को, जो उनके हित साधते हैं। साथ ही साथ, इससे यह भी पता चलता है कि बदलाव की किसी संभावना को कमतर बताने के लिए कैसे पहचान की राजनीति का दुरुपयोग किया जाता है।

इन राजनैतिक शख्सियतों में कइयों के परिवार अमेरिका या ब्रिटेन में 1950 और 1960 के दशक में पहुंचे। वह दौर दोनों देशों में उथल-पुथल भरा था, जिससे वे अपने आप्रवासन नीति को नरम बनाने को मजबूर हुए, अलबत्ता अलग-अलग वजहों से। ब्रिटेन औपनिवेशिक ताकत नहीं बचा था, उसे द्वितीय युद्घ के बाद खुद के पुनर्निर्माण के लिए पहले के उपनिवेशों से ज्यादा लोगों की दरकार थी। अमेरिका का साबका सिर्फ शीतयुद्घ की चुनौती से ही नहीं था, बल्कि घर में भी विद्रोह जैसे हालात का सामना कर रहा था, क्योंकि अश्वेत अमेरिकी समान अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आए थे। 1965 के एक कानून से ऐसे कई प्रावधानों को बदल दिया गया, जो गैर-यूरोपीय देशों से आप्रवास पर पाबंदी जड़ते थे। प्रत्यक्ष तौर पर तो इसके जरिए यह दिखाने की कोशिश थी कि अमेरिका आजादी की भूमि है, लेकिन नई नीति को नागरिक अधिकार आंदोलन पर काबू पाने के मकसद से गैर-अश्वेत अल्पसंख्यकों की आबादी को बढ़ाने के लिए प्रश्रय दिया गया।

इसके साथ-साथ पूर्वी एशिया के आप्रवासियों को “मॉडल माइनारिटी” (आदर्श अल्पसंख्यक) की तरह पेश करने का सुविचारित अभियान भी जारी था। आप्रवासन कानून पास होने के फौरन बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने लेख छापा, जिसमें जापानी अमेरिकियों की अच्छी कामयाबी, उच्च शिक्षा और कम अपराध दर के लिए सराहना की गई थी और इसकी तुलना “प्राब्लम माइनारिटी” यानी अश्वेतों से की गई थी। ऐसा ही प्यार चीनी अमेरिकियों के लिए भी बरसाया गया था।

उसके बाद रातोरात, एक सदी से ज्यादा से “येलो पेरिल” (पीली आपदा) माने जाने वाले पूर्वी एशियाइयों को समाज का सहनशील, कानून का पालन करने वाले, उपयोगी सदस्यों के रूप में पेश किया जाने लगा, जो दूसरे अल्पसंख्यकों के लिए मिसाल बन सकते हैं। मॉडल माइनारिटी की छवि गढ़ने के पीछे मकसद अश्वेत अमेरिकियों को उनके तमाम दुखों के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराकर नागरिक अधिकार आंदोलन की मांगों को बेमानी बनाना था। और इस तरह गुलामी और अलगाव के इतिहास पर परदा डालना था। यह छवि अल्पसंख्यक समूहों को बांटने और बहु-सामुदायिक गोलबंदी को पटरी से उतारने के भी काम आई।

साठ साल बाद, जब अमेरिका में ब्लैक लाइव्स मैटर (अश्वेत जिंदगी की अहमियत) की आवाजें मुखर हो रही हैं और चीन विश्व ताकत के रूप में उभर रहा है तो हड़कंप मचा हुआ है। ऐसे में एक बार फिर पूर्वी एशियाई पीली आपदा में बदल गए हैं, तो भारतीय नए आदर्श अल्पसंख्यक के रूप में उभर आए हैं।

वे जरूरी शर्तें भी पूरी करते हैं। 2019 की जनगणना के मुताबिक, 25 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के करीब 79 फीसदी भारतीय मूल के अमेरिकी लोगों के पास ग्रेजुएट डिग्री है और दूसरे समुदायों के मुकाबले महज 33 फीसदी हैं। भारतीयों को दूसरों के मुकाबले नौकरी मिलने की संभावना ज्यादा होती है और खास यह कि वे उच्च वेतन वाले क्षेत्र में ज्यादा काम करते हैं। लिहाजा, भारतीय परिवारों की औसत आय 132,000 डॉलर थी, जो दूसरे आप्रवासी समूहों के संयुक्त औसत से तकरीबन दोगुनी थी।

इन आंकड़ों काे अक्सर सबूत की तरह पेश किया जाता है कि अमेरिका में कोई भी कड़ी मेहनत करने वाला कामयाब हो सकता है, जो खांटी तथाकथित अमेरिकी सपना है। जैसा कि हेली ने एक बार कहा, “हम अमेरिकी होकर अच्छे हैं।”

निक्की हेली

निक्की हेली

लेकिन ये आंकड़े जो बताते हैं, उससे ज्यादा छुपा लेते हैं। भारतीयों और दूसरे समूदायों की तुलना आम और बेर की तुलना जैसी है। अमेरिका में ज्यादातर भारतीय सुविधासंपन्न भारतीय परिवारों से आए हैं या भारतीय आप्रवासियों के वंशज हैं। बड़ी आबादी हाल के वर्षों में आई है। ये सभी अपनी पसंद से मैनेजमेंट, बिजनेस, साइंस और टेक्नोलॉजी और उस जैसे कारोबार में ऊंची नौकरियां करने आए हैं, या फिर पढ़ाई करने और उसके बाद इन्हीं क्षेत्रों में मालदार नौकरियां पाने के लिए आए हैं।

लेकिन इतिहास एकदम अलग है। याद करें, शुरू में अफ्रीका से गुलाम बनाकर लाए गए अश्वेत अमेरिकियों को सदियों तक व्यवस्थागत प्रताड़ना झेलनी पड़ी है या स्थानीय अमेरिकियों (रेड इंडियन) को कत्लेआम झेलना पड़ा है। जिंदल या हेली या हैरिस की कामयाबियों को खास भारतीय बताना भी दूसरे अल्पसंख्यकों के राजनैतिक संघर्षों से हासिल नागरिक अधिकारों की प्रगति को ठेंगा दिखाना है। इन संघर्षों में भारतीयों ने हिस्सा नहीं लिया, लेकिन आज मलाई चख रहे हैं।

कहने का मतलब यह नहीं है कि भारतीय अमेरिकियों को पूर्वाग्रह का सामना नहीं करना पड़ा। उन्हें भी करना पड़ा और यह हर मायने में बढ़ ही रहा है। न ही इसका मतलब यह है कि भारतीय कड़ी मेहनत नहीं करते या कामयाबी के काबिल नहीं हैं। लेकिन पहले से ही संपन्न समुदायों की चमकदार उपलब्धियों को इस तरह पेश किया जा रहा है, ताकि दूसरे समुदायों की अन्याय के खिलाफ आवाजों को ढंका जा सके। एक या दूसरी मुख्यधारा राजनैतिक पार्टी से संबंधित एक या दूसरे अमीर भारतीय मूल के नेता को इस रूप में पेश किया जा रहा है, ताकि उसे ब्लैक लाइव्स मैटर के विरोध प्रदर्शनों और जमीनी गोलबंदी की असहज राजनीति के बरक्स स्वीकार्य विकल्प बताया जा सके।

पढ़ाई-लिखाई, आमदनी और नस्लीय हिंसा तक के मामले में भी “परेशानी” पैदा करने को आम तौर पर तैयार न होने की प्रवृत्ति से अमेरिका में भारतवंशियों को नए आदर्श अल्पसंख्यक की खिताब पाने में मदद मिली है, खासकर जब इस दौरान नस्ल-भेद विरोध वैसा ही होता जा रहा है, जैसा नागरिक अधिकार आंदोलन के दौर में था। ऐसा ही बदलाव ब्रिटेन में भी आया है, जहां हिंदुओं और सिखों को “मध्य वर्ग” या दूसरे शब्दों में ब्रिटिश समाज की मुख्यधारा का हिस्सा माना जा रहा है।

इन भारतवंशी नेताओं की नीतियां भी उस दावे को झुठलाती हैं कि इनका उत्थान इनकी खासियत और सामाजिक न्याय की वजह से हुआ है। लुइसियाना के गवर्नर पद पर रहते हुए जिंदल ने कारोबारी निवेश पर टैक्स कटौती की और गरीबों के लिए स्वास्‍थ्य सेवा पाने की राह कठिन कर दी। उनकी रिपब्लिकन साथी हेली ने नस्लवादी झंडों के लहराने का समर्थन किया। इस बीच, डेमोक्रेट हैरिस कैलिफोर्निया की अटार्नी जनरल के नाते ज्यादा से ज्यादा लोगों को निजी मिल्कियत वाली जेलों में पड़े रहने देने की कानूनी लड़ाई लड़ चुकी हैं, जिनमें कई ब्लैक या दूसरे समुदायों के हैं।

बॉबी जिंदल

बॉबी जिंदल

आप्रवासी परिवारों से आने वाले नेताओं के पाखंड सबसे अधिक आप्रवासन नीति के मामले में खुलता है। जिंदल और हेली ने कई ऐसे कानूनों का समर्थन किया, जिससे अमेरिका में आप्रवास मुश्किल हो जाए और आप्रवासियों की जिंदगी कठिन हो जाए। लैटिन अमेरिकी देशों के दौरों के दौरान उप-राष्ट्रपति हैरिस ने संभावित आप्रवासियों से कहा, “न आओ, न आओ।” प्रीटी पटेल ने खासकर कोविड 19 महामारी के दौरान आप्रवासियों और शरणार्थियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया, जिसे एक जज ने “काफी परेशान” करने वाला बताया।

पहचान की राजनीति के पैरोकार सुनक और उनके जैसों के पश्चिमी राजधानियों में सत्ता के गलियारों में पहुंचने का जश्न मना सकते हैं, लेकिन इन कुछ “अलग-से दिखने वाले” व्यक्तियों से शायद ही कोई फर्क पड़े। अगर कुछ फर्क पड़ा तो यही कि इससे इन उदार लोकतंत्रों में सत्ता और विशेषाधिकार का वर्चस्व और बढ़ेगा। यह प्रतिनिधित्व के उदार वादे के खोखलेपन को भी जाहिर करता है, जो कुछ व्यक्तियों की सफलता को सामाजिक बदलाव के संघर्ष के रूप में पेश करते हैं और ये व्यक्ति भी ऐसे हैं जो कामगार वर्ग में कोई दोस्त न होने पर गर्व करते हैं।

(लेखक नीदरलैंड में टिलबर्ग यूनिवर्सिटी में डिजिटल कल्चर के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी पीएचडी ऑस्टीन में टेक्सास यूनिवर्सिटी से है और वे पहले वॉशिंगटन डीसी में अमेरिकन यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके हैं)

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