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मध्य प्रदेश: जामनगर भेजने की जल्दबाजी

मुकेश अंबानी के जामनगर जू में बाघ और तेंदुए भेजने के फटाफट फैसले पर उठे सवाल
भोपाल के वन बिहार में बाघ

मध्य प्रदेश सरकार के कई प्रयास और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भले ही गिर के शेर को मध्य प्रदेश नहीं लाया जा सका हो, लेकिन यहां से बाघ और तेंदुए को गुजरात भेजने के लिए राज्य सरकार तुरंत तैयार हो गई है। राज्य के वन विभाग ने गुजरात के जामनगर में मुकेश अंबानी द्वारा तैयार किए गए जुओलॉजिकल पॉर्क में इन जानवरों को भेजने पर सहमति दे दी है। देश के बड़े रईस मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड, जामनगर में रिफाइनरी की करीब 425 एकड़ जमीन पर जुओलॉजिकल पार्क और रेस्क्यू सेंटर बना रही है। यहां देश भर से कई जानवरों को लाया जा रहा है। कंपनी ने कई राज्य सरकारों से वहां ऐसे जानवारों को भेजने का आग्रह किया है, जिन्हें जंगल में नहीं छोड़ा जा सकता है। ऐसी ही मांग मध्य प्रदेश सरकार के वन विभाग से भी की गई थी। इसके जवाब में वन विभाग ने दो बाघ और चार तेंदुए भेजने पर अपनी दे दी है। गौरतलब है कि कंपनी के पत्र पर वन विभाग ने दो सप्ताह के अंदर ही अपनी सहमति प्रदान कर दी।

वन विभाग का तर्क है कि राज्य में ऐसे जानवरों की बड़ी संख्या हो गई है, जिनको अब जंगल में नहीं छोड़ा जा सकता है। इसके मद्देनजर भोपाल के वन विहार से बाघ और तेंदुओं को जामनगर भेजा जा सकता है। मध्य प्रदेश में जंगल से बचाए गए जानवरों को भोपाल के वन विहार और सतना जिले की ह्वाइट टाइगर सफारी में रखा जाता है। वन विभाग ने तर्क दिया है कि इतनी संख्या में जानवरों को रखने के लिए पर्याप्त जगह की कमी हो सकती है।

लेकिन वन विभाग का यह तर्क जानकारों को पसंद नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि यह फैसला दबाव में लिया गया है। प्रदेश में ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं है कि जानवरों को रखने की जगह की कमी हो। सतना के ह्वाइट टाइगर सफारी को बनाने वाले और भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी पी.के.सिंह का कहना है कि भोपाल के वन विहार और सतना ह्वाइट टाइगर सफारी दोनों में अभी काफी जगह है। अभी वहां बड़ी संख्या में जानवरों को रखा जा सकता है। इसके अलावा ह्वाइट टाइगर सफारी के विस्तार के लिए जगह आरक्षित है और वहां बड़ा विस्तार किया जाना बाकी है। यह कहना पूरी तरह से गलत तथ्य है कि जानवरों को रखने की जगह नहीं है।

इस बारे में वन विभाग के अधिकारियों ने कुछ भी कहने से मना कर दिया, लेकिन सूत्रों का कहना है कि दबाव में यह फैसला लिया गया है और फैसले को सही बताने के लिए गलत तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे है। कंपनी का पत्र वन विभाग को 31 दिसंबर 2021 को प्राप्त हुआ और दो हफ्ते के अंदर वन विभाग ने सहमति भी प्रदान कर दी। यह दिखाता है कि सरकार पर किस तरह का दबाव है।

सरकार के इस फैसले को कानूनी तौर पर भी गलत माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जानवरों के स्थानांतरण के लिए तय कानूनी प्रक्रिया है। इसका अध्ययन किया जाना चाहिए कि किसी जानवर को जहां भेजा जा रहा है, वह उसके लिए उपयुक्त है या नहीं। इसके अलावा, वन विभाग को यह सहमति देने से पहले राज्य वाइल्ड लाइफ बोर्ड से अनुमति लेनी चाहिए थी, जो नहीं ली गई है।

वन्य प्राणी कार्यकर्ता अजय दुबे कहते हैं कि एक निजी कंपनी मध्य प्रदेश की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है और वन विभाग उसे आंख बंद करके स्वीकार कर रहा है, इससे ज्यादा शर्मसार करने वाली बात किसी राज्य के लिए और क्या हो सकती है। यह कैसे तय हो गया कि राज्य में जानवरों को रखने की क्षमता नहीं है तो कंपनी कैसे इसके काबिल है।

दुबे कहते है कि रिलायंस वन्य प्राणियों के लिए इतनी ही संवेदनशील है तो उसे गुजरात सरकार से बात करके गीर के शेरों को मध्य प्रदेश भेजना चाहिए। पिछले 25 साल से यह मामला जारी है लेकिन गुजरात ने एक शेर भी नहीं भेजा। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि गीर शेरों की प्रजाति की सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि उन्हें दूसरे स्थान पर भी रखा जाए। मध्य प्रदेश के कून्होंपाल पुर अभयारण्य में उनके लिए तैयारी की गई। राज्य सरकार ने वहां के 30 गांवों से सहरिया आदिवासियों को हटाया और अभयारण्य को जगह दी। लेकिन गुजरात सरकार शेर भेजने को तैयार नहीं। अजय दुबे ने एक पत्र भी रिलायंस को लिखा है कि मध्य प्रदेश से जानवर चाहते हैं तो उन्हें  गीर के शेर को मध्य प्रदेश लाने में मदद करनी चाहिए। कई कोशिशों के बावजूद रिलायंस का जवाब नहीं हासिल किया जा सका।

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