बंटाढार न करने के लिए पुरस्कार

राजेंद्र धोड़पकर
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इलस्ट्रेशनः राजेंद्र धोड़पकर

राजेंद्र धोड़पकर
पुरस्कार दो तरह के लोगों को मिलते हैं, योग्य और अयोग्य

मुझे आम तौर पर पुरस्कार नहीं मिलते। कारण मैं भी खोज रहा हूं।  किसी को पता चले तो मुझे भी बताए। कृपया यह न कहें कि चूंकि मैं प्रचार और प्रसिद्धि से दूर रहा इसलिए मुझे पुरस्कार नहीं मिलते। यह सरासर गलत है। प्रसिद्ध होना किसे बुरा लगता है और कौन नहीं चाहता कि वह मंच पर मुस्कराता हुआ कंधे पर शॉल, हाथ में मान चिह्न और चेक का लिफाफा लिए फोटो खिंचाए? लेकिन मेरे साथ यह क्यों नहीं होता, यह मैं समझ नहीं पाता। इसलिए जब किसी को भी पुरस्कार मिलने की खबर आती है तो मुझे कुढ़न होती है।

पुरस्कार दो तरह के लोगों को मिलते हैं, योग्य और अयोग्य। जब किसी योग्य व्यक्ति को पुरस्कार मिलता है तो मुझे इसलिए कुढ़न होती है कि मैं यह नहीं कह सकता कि वह तो अयोग्य है, उसने जुगाड़ करके या सिफारिश से पुरस्कार हासिल किया है। जब किसी अयोग्य व्यक्ति को पुरस्कार मिलता है तो मुझे इसलिए गुस्सा आता है कि जब किसी अयोग्य व्यक्ति को ही पुरस्कार देना था तो मैं ही क्या बुरा था।

अब मेरी उम्र और अनुभव काफी हो गया है इसलिए मैंने सोचा कि नुकसान की भरपाई के लिए, “सौ सुनार की, एक लुहार की” के अंदाज में किसी भारी भरकम पुरस्कार के लिए जुगाड़ किया जाए। सबसे बड़ा पुरस्कार तो नोबेल पुरस्कार है सो क्यों न मैं उसी के लिए कोशिश करूं? नोबेल कई क्षेत्रों में मिलता है। साहित्य का इन दिनों बंद है और साहित्य में मैंने कुछ किया भी नहीं है, बशर्ते कि इस किस्म के व्यंग्य लेखों को साहित्य न मान लिया जाए। विज्ञान में मेरा योगदान अधिकांश विज्ञान में डिग्री प्राप्त भारतीयों की तरह सिर्फ डिग्री पाने तक ही है। अर्थ और अर्थशास्‍त्र भी मेरे लिए अजनबी ही रहे हैं। ले दे कर बचता है, नोबेल शांति पुरस्कार जो किसी नत्थूखैरे को भी मिल सकता है और कभी-कभी मिला भी है।

नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लिए मेरी योग्यता यह है कि मैंने कभी अशांति नहीं फैलाई। मैं मूलत: आलसी और शांतिप्रिय आदमी हूं और लड़ाई-झगड़ों से दूर रहता हूं। यहां तक कि मैं कुछ भी करने से दूर रहता हूं। मेरा बस चले तो मैं सारे दिन और सारी रात बिस्तर में ही पड़ा रहूं। मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि मेरा यह योगदान बहुत बड़ा है।

बल्कि मैं यह निवेदन करूंगा कि सबसे बड़ी गड़बड़ ही यह है कि पुरस्कार कुछ करने के लिए दिए जाते हैं, बल्कि जरूरत इस बात की है कि कुछ पुरस्कार कुछ न करने के लिए दिए जाएं। मसलन, अगर मोदी जी नोटबंदी न करते या निर्मला सीतारमण वित्तमंत्री न बनतीं तो उनका देश की अर्थव्यवस्था पर भारी उपकार होता। अगर ये लोग ऐसा न करते तो उन्हें अर्थशास्‍त्र का नोबेल पुरस्कार दिया जा सकता था। मसलन पीयूष गोयल विज्ञान पर कुछ न बोलते तो उन्हें विज्ञान का कोई छोटा- मोटा पुरस्कार तो दिया ही जा सकता था। मेरा मानना तो यह है कि राजनेता जब कुछ नहीं करते तो बहुत बड़ा काम करते हैं। बहरहाल, जो भी हो मुझे तो पुरस्कार मिलना ही चाहिए।

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