कांग्रेस में कलह

भोपाल से रवि भोई
दावेदारीः कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया का आ रहा नाम
दावेदारीः कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया का आ रहा नाम
गैटी इमेजेज

भोपाल से रवि भोई
प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में सिंधिया, अजय सिंह समेत कई नेता, आदिवासी अध्यक्ष बनाए जाने के संकेत

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के भीतर खींचतान का नया खेल चल रहा है। संकेत हैं कि इस खेल के जरिए भाजपा भी अपनी गोटियां फिट कर रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद अजय सिंह (राहुल भैया) का  नाम सामने आ रहा है। दोनों के समर्थक खुलेआम बयान दे रहे हैं या फिर बैठक कर रहे हैं, उससे साफ है कि कांग्रेस के अंदर बड़ा खेल चल रहा है। हालांकि कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह नेता प्रतिपक्ष रहते 2018 का विधानसभा चुनाव हार गए और 2019 का लोकसभा चुनाव भी जीत नहीं सके। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अजय सिंह को विधानसभा हारने के बाद भले लोकसभा का टिकट दे दिया, लेकिन उनके विरोध के बाद भी भाजपा के विधायक नारायण त्रिपाठी और शरद कौल को अपने से जोड़ लिया। इससे साफ है कि अजय सिंह को कमलनाथ पसंद नहीं करते। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पार्टी लोकसभा चुनाव में हार के बाद आदिवासी मतदाताओं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए किसी सर्वमान्य आदिवासी नेता की तलाश कर रही है। इस कड़ी में मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के लिए कमलनाथ के करीबी और राज्य के गृह मंत्री बाला बच्चन का नाम सबसे ऊपर चल रहा है। आदिवासी नेता और राज्य के वन मंत्री उमंग सिंघार भी अध्यक्ष पद की दौड़ में हैं। लेकिन उमंग सिंघार को दिग्विजय सिंह पसंद नहीं करते और यह भी बड़ा सवाल है कि राहुल गांधी की टीम का होने के नाते सोनिया गांधी उन पर कितना भरोसा करेंगी?

राज्य के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने तो गृह मंत्री बाला बच्चन को प्रदेशाध्यक्ष बनाने की परोक्ष रूप से मांग कर डाली है। वह बच्चन को एक अनुभवी नेता बताते हैं। दरअसल, राज्य में आदिवासी वर्ग की लगभग 22 प्रतिशत आबादी है। विधानसभा के 47 क्षेत्र इस वर्ग के लिए आरक्षित हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन 47 में से 30 स्थानों पर जीत दर्ज की थी। आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित क्षेत्रों में 60 प्रतिशत से ज्यादा स्थानों पर कांग्रेस को सफलता मिली थी। कांग्रेस के 114 विधायकों में 25 प्रतिशत से ज्यादा इस वर्ग के हैं। वहीं, लोकसभा चुनाव में उसे इस वर्ग की एक भी सीट हासिल नहीं हो पाई। कांग्रेस को 29 सीटों में से सिर्फ एक सीट ही मिली है, वह भी छिंदवाड़ा की है, जहां से कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ चुनाव जीते हैं। इस कारण से कांग्रेस आदिवासियों को अपने पाले में बनाए रखने की जुगत में है।

राज्य में कांग्रेस के पास किसी दौर में दलवीर सिंह, भंवर सिंह पोर्ते, जमुना देवी जैसे आदिवासी नेता रहे हैं, जो सत्ता में रहे तो उनकी हनक रही और विपक्ष में रहने के दौरान उन्होंने सत्ता पक्ष को हमेशा मुश्किल में डाले रखा, मगर जमुना देवी के निधन के बाद कांग्रेस में इस वर्ग का एक भी नेता उभरकर सामने नहीं आ पाया है। जो बड़े नाम वाले नेता हैं, उनकी खुद राजनैतिक जमीन कमजोर हो चली है। कांतिलाल भूरिया एक बार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, लेकिन उनकी कोई खास उपलब्धि नहीं रही है। आने वाले दिनों में झाबुआ में विधानसभा उपचुनाव होने हैं। यह सीट भाजपा के पास थी, लेकिन कांग्रेस उसे जीतना चाहेगी।  कांग्रेस आलाकमान ने सिंधिया को महाराष्ट्र चुनाव के लिए कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बना दिया है, लेकिन सिंधिया के कोटे की मंत्री इमरती देवी का मानना है कि सिंधिया को महाराष्ट्र में कोई नहीं जानता, उन्हें तो मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाना था। गौरतलब है कि सिंधिया विधानसभा चुनाव में अभियान समिति के प्रमुख थे। कहा जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया इससे अच्छी तरह वाकिफ हैं, फिर भी माहौल पैदा कर अपना हित साधना चाहते हैं। सिंधिया को लोकसभा में गुना से हार काफी परेशान कर रही है। ज्योतिरादित्य अपने परिवार से पहले व्यक्ति हैं, जो गुना से चुनाव हारे हैं। ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया गुना से 1977 में निर्दलीय चुनाव जीते थे। ज्योतिरादित्य की दादी विजयाराजे सिंधिया जनसंघ और भाजपा की वरिष्ठ नेता रहीं। सिंधिया परिवार में ज्योतिरादित्य को छोड़कर सभी भाजपा में हैं। इस कारण ज्योतिरादित्य के भाजपा में जाने के भी चर्चे हैं।

दांवपेचः पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी सक्रिय

कहा जा रहा है कि ज्योतिरादित्य को भाजपा में लाने की जिम्मेदारी राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को सौंपी गई है। चर्चा है कि ज्योतिरादित्य के भाजपा में आ जाने से चंबल और मालवा में कांग्रेस कमजोर हो जाएगी। उधर, भाजपा अजय सिंह को कांग्रेस से तोड़कर विंध्य क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। उनके बंगले में प्रदेश अध्यक्ष के मुद्दे पर चर्चा के लिए 25 विधायकों के जुटने को दबाव   की राजनीति कहा जा रहा है।

वैसे कुछ लोग प्रदेश अध्यक्ष के लिए दिग्विजय सिंह का नाम चला रहे हैं। लेकिन दिग्विजय सिंह की  उम्मीद कम है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव भी दौड़ में हैं। सोनिया गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही दिल्ली दरबार में कमलनाथ मजबूत हो गए हैं। एक बात साफ है कि प्रदेश अध्यक्ष तो कमलनाथ की पसंद का नेता ही बनेगा। उम्मीद की जा रही है कि नगरीय निकाय चुनाव से पहले मध्य प्रदेश कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिल जाएगा। 

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