नए अफसाने की तलाश में दोनों

रांची से महेंद्र कुमार
अफसाने की तलाशः 12 सितंबर को रांची की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और (उनके बाएं) मुख्यमंत्री रघुवर दास
अफसाने की तलाशः 12 सितंबर को रांची की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और (उनके बाएं) मुख्यमंत्री रघुवर दास
राजेश कुमार

रांची से महेंद्र कुमार
आर्थिक खस्ताहाली, मॉब लिंचिंग से लोग त्रस्त, चुनावी तैयारी जोरों पर

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्यमंत्री रघुवर दास पूरी तरह चुनाव के मोड में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 12 सितंबर 2019 को रांची यात्रा के साथ तो जैसे झारखंड में चुनावी बिगुल बज चुका है। विपक्ष भी अपनी रणनीति को धार देने लगा है। यह जरूर है कि अभी वह शुरुआती दौर में है। दूसरी ओर राज्य में लोगों की सरकार से नाराजगी बढ़ रही है। मॉब लिंचिंग और बच्चा चोरी की अफवाहें भी राज्य में माहौल अशांत कर रही हैं। लोग खासकर औद्योगिक क्षेत्रों में बंद होती कंपनियों और रोजगार खत्म होने से परेशान हैं। किसान तो पूरे देश की ही तरह घटती आमदनी से हलकान हैं। लेकिन ऐसे दौर में भी भाजपा को अपने कथित राष्ट्रवादी एजेंडे और विपक्ष की कमजोरियों से उम्मीदें हैं।

भाजपा को 2014 के विधानसभा चुनाव में 31.26 फीसदी वोट मिले थे और उसके हिस्से 35 सीटें आई थीं। उसकी सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) ने 3.68 फीसदी वोट लेकर पांच सीटें जीती थीं। विपक्षी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) को 20.43 फीसदी वोट के साथ 17 सीटों पर और झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) को 9.99 फीसदी वोट के साथ आठ सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस के हिस्से 10.46 फीसदी वोट आए थे और वह आठ सीटों पर कामयाब रही थी। सरकार बनाने के लिए भाजपा ने जोड़-तोड़ का सहारा लिया और झाविमो के छह विधायक उसके साथ आ गए। इस तरह बहुमत का जुगाड़ कर रघुवर दास सीएम बने और झारखंड में पहली बार बिना नेतृत्व परिवर्तन के पांच साल तक किसी पार्टी की सरकार चली।

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 81 में से 63 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी और उसे 14 में से 11 सीटों पर जीत मिली थी। उसकी सहयोगी आजसू को पहली बार संसदीय चुनाव में सफलता मिली और वह एक सीट जीतने में कामयाब रही। इसके बाद भाजपा ने 65 से ज्यादा सीट का लक्ष्य तय किया। हालांकि पार्टी के प्रदेश चुनाव प्रभारी ओम प्रकाश माथुर कहते हैं कि 70 सीटों पर कामयाबी मिलेगी। दरअसल, भाजपा लोकसभा चुनाव के बाद लगातार सक्रिय है। मोदी के अलावा कार्यकारी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा दो बार प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। मुख्यमंत्री रोजाना तीन-तीन मंडलों की बैठकें कर रहे हैं। पार्टी संथाल परगना पर खास फोकस कर रही है। 18 विधानसभा सीटों वाला यह क्षेत्र पारंपरिक रूप से झामुमो का गढ़ रहा है।

दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन में अभी यह तय नहीं हो सका है कि चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाए। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, झामुमो, राजद और झाविमो ने तालमेल किया था। तब विपक्षी गठबंधन की कमान कांग्रेस के हाथ में थी। लेकिन कांग्रेस और झामुमो एक-एक सीट ही जीत सकी। झामुमो के सबसे बड़े नेता शिबू सोरेन चुनाव हार गए। विधानसभा चुनाव में विपक्ष की कमान झामुमो के हाथ में है। झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन खुद को विपक्षी खेमे के नेता के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं। वे “बदलाव यात्रा” पर हैं। लेकिन कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव कहते हैं कि अभी नेता के नाम पर मुहर नहीं लगी है। पहले सीट शेयरिंग होगी, उसके बाद ही नेता के नाम पर विचार होगा। कांग्रेस ने यहां नया प्रयोग भी किया है। पार्टी के अलग-अलग खेमे को संतुष्ट करने के लिए पांच कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए हैं। राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी अपनी पार्टी झाविमो का अस्तित्व बचाने में लगे हैं।

झारखंड में पहली बार कोई सरकार पूरे पांच साल चली है, इसलिए भाजपा ने विकास के साथ राजनीतिक स्थिरता को भी मुद्दा बनाया है। उसने “घर-घर रघुवर” का नारा दिया है। भाजपा के प्रदेश महासचिव दीपक प्रकाश कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में विपक्ष का सफाया हो जाएगा, प्रदेश की जनता पार्टी से बेहद खुश है। दूसरी तरफ हेमंत सोरेन का दावा है कि भाजपा की नीतियों ने झारखंड का बहुत नुकसान किया है, और जनता सत्ता परिवर्तन के लिए तैयार है। बाबूलाल मरांडी भी यही दावा करते हैं। विपक्ष अभी तक कोई बड़ा मुद्दा सामने नहीं ला सका है। यह मॉब लिंचिंग को भी मुद्दा बनाने में नाकाम रहा है। पिछले एक पखवाड़े के दौरान भीड़ हिंसा में राज्य के विभिन्न हिस्सों में कम से कम आठ लोगों की मौत हो चुकी है। करीब आधा दर्जन लोग भीड़ की पिटाई से घायल होकर अस्पतालों में पड़े हैं। ऐसा नहीं कि ये घटनाएं केवल ग्रामीण इलाकों में हुई हैं। झरिया, गिरिडीह, लोहरदगा, गुमला, रामगढ़ और जामताड़ा जैसे शहरों में भी लोग हिंसा के शिकार हुए हैं।

झारखंड में 2014 के बाद से मॉब लिंचिंग की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई। प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ती गईं। वर्ष 2000 में झारखंड बनने के बाद 2014 तक भीड़ हिंसा की महज 13 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जिनमें लांगो की घटना भी शामिल है। जमशेदपुर के लांगो गांव में 7-8 अगस्त, 2003 को ग्रामीणों ने नौ नक्सलियों को पीट-पीट कर मार डाला था। अलग झारखंड बनने के बाद मॉब लिंचिंग की वह पहली बड़ी वारदात थी। वर्ष 2014 के बाद राज्य में मॉब लिंचिंग की 33 घटनाओं में दो दर्जन लोगों की जान जा चुकी है। मानवाधिकारों के लिए काम करनेवाली वकीलों की संस्था ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) के अनुसार, पिछले पांच साल के दौरान मॉब लिंचिंग की कई घटनाओं की रिपोर्ट पुलिस तक नहीं पहुंची। खास कर डायन-बिसाही जैसे अंधविश्वास में हुई घटनाएं पुलिस के पास नहीं पहुंची हैं।

विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता हेमंत सोरेन कहते हैं, झारखंड दरअसल लिंचिंग पैड बन गया है। यहां सत्ताधारी दल के समर्थक जब चाहते हैं, निर्दोषों को मार डालते हैं। उन पर कार्रवाई का साहस प्रशासन में नहीं है। झाविमो के अध्यक्ष और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के लिए राज्य सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है। ऐसी घटनाओं में शामिल लोग उससे संबंधित होते हैं, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती।

प्रशासन का रवैया भी उदासीन दिखता है। राज्य के डीजीपी कमल नयन चौबे कहते हैं कि पुलिस जागरूकता अभियान चला रही है। इसमें स्थानीय प्रतिनिधियों की भी मदद ली जा रही है। राज्य के नगर विकास मंत्री सी.पी. सिंह मॉब लिंचिंग पर सिर्फ चिंता जताते हैं। वे कहते हैं कि इसे रोकने के लिए सबको मिल-जुल कर प्रयास करना चाहिए। वे कहते हैं कि मॉब लिंचिंग की समस्या सामाजिक है इसलिए इसे राजनीतिक रूप से हल नहीं किया जा सकता। वैसे अलीमुद्दीन अंसारी हत्याकांड में जमानत पर बाहर आए 10 आरोपियों का जिस तरह तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद जयंत सिन्हा ने माला पहना कर स्वागत किया था, उससे राजनीतिक समाधान की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है।

बढ़ती मॉब लिंचिंग की घटनाएं

18 जून 2019ः  सरायकेला खरसावां जिले में तबरेज अंसारी को भीड़ ने चोरी के आरोप में पकड़ा और उसे करीब 18 घंटे तक बांध कर पीटा। बाद में उसकी मौत हो गई। 11 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। लेकिन हाल ही सरायकेला पुलिस ने इस मामले में हत्या की धारा को हटा दिया।

10 मई 2019ः गुमला के जुरमू गांव में एक मृत बैल का मांस काट रहे चार लोगों को पड़ोसी गांव की उन्मादी भीड़ ने इतना पीटा कि उनमें से एक, प्रकाश लकड़ा की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई।

6 सितंबर 2018ः पलामू के विश्रामपुर थाना क्षेत्र में तिसिबार गांव के लोगों ने तीन लोगों को चोर बताकर इतना पीटा कि इनमें से बबलू मुसहर नामक एक व्यक्ति की मौत हो गई।

 गोड्डा के डुलु गांव में भीड़ ने पड़ोसी गांव के चिरागुद्दीन अंसारी और मुर्तुजा अंसारी को भैंस चोरी के आरोप में इतना पीटा कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

19 अगस्त 2017ः गढ़वा के बरकोल खुर्द गांव के तेनडांड़ जंगल में भीड़ ने 10 लोगों को मांस के साथ पकड़ा और उनकी पिटाई की। इनमें से रमेश मिंज नाम के व्यक्ति की अस्पताल में मौत हो गई।

29 जून 2017ः रांची से सटे रामगढ़ में भीड़ ने अलीमुद्दीन अंसारी नाम के मांस व्यापारी को पीट-पीट कर मार डाला। उस पर गोमांस का कारोबार करने का आरोप लगाया गया था।

18 मई 2017ः सरायकेला जिले के राजनगर इलाके में शेख हलीम, शेख नईम, सिराज खान और मोहम्मद साजिद को भीड़ ने पीटकर मार डाला। शक था कि इन्होंने एक विवाह समारोह के भोज के लिए गोमांस की आपूर्ति की थी।

18 मई 2017ः जमशेदपुर में भीड़ ने बच्चा चोरी का आरोप लगाकर एक महिला समेत चार लोगों को पीटा। इसमें दो सगे भाइयों, गौरव वर्मा और विकास वर्मा की घटनास्थल पर ही मौत हो गई।

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