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सरकारी दखल पर कई बवाल

चारधाम समेत 51 मंदिरों पर नियंत्रण के लिए बोर्ड बनाने का विरोध, इसे धामों की गुल्लक पर कब्जे का प्रयास बताया, भाजपा में ही असंतोष
उत्तराखंड चारधाम में से एक बदरीधाम मंदिर

उत्तराखंड सरकार ने राज्य के चारधाम समेत अन्य देवस्थलों पर सरकारी नियंत्रण के लिए एक्ट बनाकर चारधाम देवस्थानम बोर्ड का गठन किया है। इस बोर्ड का पुजारी और तीर्थ पुरोहित विरोध कर रहे हैं। सरकार इसे चारधाम विकास के लिए ऐतिहासिक कदम बता रही है तो विरोध करने वाले इसे धामों की गुल्लक पर कब्जे का प्रयास मान रहे हैं। एक भाजपा सांसद इसके खिलाफ हाइकोर्ट भी गए, लेकिन कोर्ट ने एक्ट को सही करार दिया। इसके बाद भी विरोध जारी है। गंगोत्री धाम मंदिर समिति ने तो बोर्ड की सहमति लिए बिना ही सैनिटाइजेशन के नाम पर धाम को 15 अगस्त तक के लिए बंद कर दिया है।

उत्तराखंड स्थित केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम विश्व प्रसिद्ध हैं। इन धामों में हो रहे विकास कार्यों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद भी कई बार मॉनिटरिंग कर चुके हैं। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए उत्तराखंड सरकार ने एक एक्ट के तहत उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम् बोर्ड का गठन किया है। इसमें उक्त चार धामों के साथ आसपास के ही छोटे-बड़े 47 अन्य मंदिरों और देवस्थलों को भी शामिल किया है।

अभी तक बदरीधाम और केदारधाम की व्यवस्था के लिए एक मंदिर समिति थी। यह भी एक तरह से सरकारी ही थी, लेकिन यह व्यवस्था दशकों पुरानी थी। अन्य दो धामों और मंदिरों में व्यवस्था सदियों से अलग-अलग समुदाय के पुजारियों और पुरोहितों के हाथ में थी। दान और चढ़ावा भी इन्हीं के हाथों में आता था और व्यवस्थाएं भी इनकी समितियां बनाती खिलाफ हाइकोर्ट भी गए, लेकिन कोर्ट ने एक्ट को सही करार दिया। इसके बाद भी थीं। अब सब कुछ सरकारी नियंत्रण वाले बोर्ड के अधीन आ गया है।

श्रीबदरीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के अध्यक्ष आशुतोष डिमरी कहते हैं, “हम विकास का विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन सदियों से चली आ रही व्यवस्था पर हमला सहन नहीं किया जाएगा।” डिमरी बताते हैं कि अंग्रेजों के समय 1939 में बदरी-केदार मंदिर समिति का गठन किया गया था और 1964 में इसमें कुछ संशोधन हुए। यही समिति दोनों धामों का सारा काम देखती है। यहां का मुख्य पुजारी रावल केरल के नंबूदरीपाद संप्रदाय से होता है। उनका वेतन नियत है। विशेष पूजा से आने वाली राशि का साढ़े सात फीसदी रावल को दिया जाता है और साढ़े तीन फीसदी स्थानीय पुजारियों को मिलता है। धाम परिसर में ही बने लक्ष्मी मंदिर और कामधेनु मंदिर के साथ ही हवन-पूजन, चरणामृत, भोग पर भी डिमरी समुदाय के पुजारियों का हक है। आरती के थाल पर भंडारी, मेहता, कामदी और श्योकार समाज का हक है। घंटाकर्ण पर भंडारी समुदाय का हक है। इसी तरह, गंगोत्री धाम पर पूरी तरह से सेमवाल समुदाय के पुजारियों और पंडों का हक है। गंगोत्री मंदिर समिति के सचिव सुरेश सेमवाल कहते हैं कि सरकार इस धाम के विकास के नाम पर पुजारियों के पुश्तैनी हक को खत्म करना चाहती है। यमुनोत्री धाम के लिए भी एक मंदिर समिति है। इस धाम पर उनियाल समुदाय का हक है। समिति के सचिव कीर्तेश्वर उनियाल कहते हैं कि सरकार की निगाहें धाम के गुल्लक पर लगी हैं। सरकार अगर इस धाम का विकास करना चाहती है तो समिति हर तरह का सहयोग करने को तैयार है, लेकिन सरकार की मंशा ठीक नहीं। इसी के खिलाफ नैनीताल हाइकोर्ट की शरण ली गई थी।

बोर्ड गठन से पहले केवल केदारनाथ धाम को एक तरह से सरकारी नियंत्रण में कहा जा सकता था। यहां के मुख्य पुजारी रावल और नायब रावल को मंदिर समिति की ओर से मासिक वेतन दिया जाता है। अन्य कर्मचारी भी वेतनभोगी हैं। यहां के रावल कर्नाटक के लिंगायत समुदाय से आते हैं। इस धाम के अधीन आने वाले अन्य देवस्थलों पर परंपरागत रूप से स्थानीय पुजारियों और तीर्थ पुरोहितों का नियंत्रण है।

सरकार ने जो देवस्थानम् बोर्ड बनाया है, उसका सीईओ अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के सुपर टाइम स्केल पाने वाले अफसर को बनाया गया है। मुख्यमंत्री इस बोर्ड के अध्यक्ष और संस्कृति मंत्री उपाध्यक्ष हैं। सदस्यों में से तीन पद इन हक-हकूकधारी पुरोहितों और पुजारियों के लिए हैं, लेकिन इन्हें नामित सरकार ही करेगी। एक्ट के अनुसार पुजारियों, न्यासियों, तीर्थ पुरोहितों और पंडों के हक-हकूक और प्रचलित देय या दस्तूरात यथावत रहेंगे। हर देवस्थल पर चढ़ावे के लिए हुंडी (दानपात्र) लगाई जाएगी, इन पर केवल बोर्ड का अधिकार होगा। बोर्ड ही धामों के विकास के लिए पैसा खर्च करेगा, लेकिन एक धाम का पैसा किसी दूसरे धाम में नहीं लगाया जाएगा।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कहना है कि सरकार ने चारधाम और अन्य देवस्थलों के विकास और श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं देने के लिए देवस्थानम् बोर्ड का गठन किया है। एक्ट बनाते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि सभी तीर्थ पुरोहितों के हक-हकूकों पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े। नैनीताल हाइकोर्ट ने भी सरकार के फैसले पर मुहर लगा दी है।

बोर्ड का विरोध करने वालों के अपने तर्क हैं। इनका कहना है कि बोर्ड में सभी धामों और अन्य देवस्थलों को शामिल करके सरकार स्थानीय पुजारियों और पुरोहितों का हक मारने की कोशिश कर रही है। सरकार ने साफ कर दिया है कि इस एक्ट का वक्फ बोर्ड और सिख गुरुद्वारा अधिनियम पर कोई असर नहीं होगा। साथ ही, कभी भी नए मंदिरों को इस बोर्ड में शामिल किया जा सकेगा। बोर्ड विरोधी कहते हैं, आखिर क्या कारण है कि सरकार केवल हिंदू समाज के मंदिरों का ही सरकारीकरण करने पर आमादा है। तमाम विरोधों के बीच नवगठित बोर्ड ने कार्यभार संभाल लिया है और पहली बार चारधाम यात्रा का संचालन कर रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी भी बोर्ड के विरोधी हैं। उन्होंने इसके गठन को एक जनहित याचिका के जरिए नैनीताल हाइकोर्ट में चुनौती दी। रूरल लिटिगेशन एंड एनटाइटलमेंट केंद्र (रूलक) ने खुद को इस याचिका में पक्षकार बनवाया और बोर्ड के गठन को जायज करार दिया। हाइकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद फैसला दिया कि एक्ट में किसी तरह के संशोधन की जरूरत नहीं है।

स्वामी ने एक ट्वीट के जरिए उत्तराखंड भाजपा पर भी सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने लिखा कि उत्तराखंड भाजपा के नैतिक पतन से दुखी हूं। भाजपा के लोग ईसाई संस्थाओं से पैसा लेकर मेरी याचिका का विरोध कर रहे हैं। नैनीताल से लोकसभा सदस्य अजय भट्ट भी कह चुके हैं कि इस बोर्ड को खत्म करना चाहिए। यह एक्ट भलाई के लिए लाया गया था, लेकिन अब अगर यह बुराई बन रहा है तो सरकार इसे खामियां दूर करने तक के लिए स्थगित कर दे या इसे खत्म कर दे। कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडेय ने भी पुरोहितों के पत्रों का हवाला देते हुए सरकार से इस पर पुनर्विचार करने की अपील की है।

पार्टी नेताओं के रवैये से उत्तराखंड भाजपा की स्थिति असहज हो गई है। प्रदेश पार्टी अध्यक्ष बंशीधर भगत कहते हैं, “मेरी जानकारी में ऐसा कोई मामला नहीं कि किसी नेता ने ईसाई संस्था से पैसे लिए हों। स्वामी वरिष्ठ नेता हैं, हो सकता है उनके संज्ञान में कुछ आया हो।” प्रदेश उपाध्यक्ष के साथ ही मीडिया प्रभारी का दायित्व संभाल रहे डॉ. देवेंद्र भसीन कहते हैं कि ऐसे लोगों के नाम सार्वजनिक करने चाहिए थे। गंगोत्री धाम मंदिर समिति ने नए अंदाज में बोर्ड का विरोध शुरू किया है। समिति ने पहले तो चारधाम यात्रा शुरू करने के बोर्ड के निर्णय का विरोध किया। बाद में धाम के कपाट 15 अगस्त तक के लिए बंद कर दिए। तर्क दिया कि कोरोना संकट के चलते वहां सफाई और सैनिटाइजेशन का काम किया जाना है।

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