“विपक्ष इक्का-दुक्का सीट ही जीत पाएगा”

मनोहरलाल खट्टर
मनोहरलाल खट्टर
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हरियाणा में सत्तारूढ़ भाजपा आश्वस्त है कि कश्मीर और एनआरसी के मुद्दे राज्य में किसानों की नाराजगी, बेरोजगारी, आर्थिक मंदी जैसे वास्तविक मुद्दों पर भारी पड़ेंगे और विपक्ष के पास भी उसका कोई तोड़ नहीं है। इसलिए उसे 75 से ज्यादा सीटें जीतने के लक्ष्य की राह में कोई बाधा नहीं दिखती है। इन तमाम मसलों और विपक्ष की चुनौती पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से संपादक हरवीर सिंह और वरिष्ठ सहायक संपादक हरीश मानव ने बातचीत की। प्रमुख अंश :

 

सभी पार्टियों के घोषणा-पत्र आ चुके हैं। आपने भी उन्हें देख लिया है। अब विधानसभा के नतीजे क्या दिखते हैं?

मुझे लगता है कि मतदाता सभी राजनीतिक पार्टियों की तुलना करता है तो वह घोषणा-पत्र पर ज्‍यादा ध्यान नहीं देता। वह समझ रहा है कि किसकी नीयत ठीक है, किस पर विश्वास किया जाए? नेताओं की छवि काफी धूमिल हो चुकी थी। इसे कैसे ठीक किया जाए इस पर मोदी जी ने काम किया। इसकी शुरुआत उन्होंने खुद से की, फिर टीम से कहा कि जो बोलो ठीक बोलो, गलत मत बोलो।

‘म्हारे सपनों का हरियाणा’ (संकल्प-पत्र) में जो सपने आपने दिखाए हैं, उन्हें अगले पांच साल में पूरा करने में कैसे कामयाब होंगे?

बहुत अच्छे से। मैं लोगों को समझाता हूं कि मोदी जी जो कहते हैं, उसे पूरा करते हैं। उन्हीं का अनुसरण मैं भी करता हूं।

दावा किया जा रहा है कि जैसे राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी ने छवि बनाई, उसी तरह हरियाणा में खट्टर ने अपनी छवि बनाई। चुनाव में इसका क्या योगदान रहेगा?

मोदी जी के नेतृत्व और पार्टी की नीतियों का बड़ा योगदान है। हम राष्ट्रवाद की बात करते हैं, इसका भी बड़ा योगदान है। लोगों के जीवन को सरल-सुगम बनाना बड़ा योगदान है। राजीव गांधी ने एक बार कहा था कि विकास के लिए दिए गए बजट का 15 फीसदी ही लक्षित व्यक्ति तक पहुंचता है, हमारी कोशिश है कि विकास आखिरी छोर तक पहुंचे।

2014 के विधानसभा चुनाव में आपका सियासी कद इतना बड़ा नहीं था। लेकिन आज आपकी छवि अलग है। आज पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान आपके कंधों पर है। टिकट वितरण में भी आपकी भूमिका अहम रही है।

यह कहना ठीक नहीं कि टिकट वितरण में मेरी भूमिका रही। उम्मीदवारों का फैसला आखिरकार संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष करते हैं। हमारी पार्टी में कोई एक आदमी उम्मीदवार तय नहीं करता। पूरी प्रक्रिया के बाद ही उम्मीदवार तय किए जाते हैं।

पार्टी के कई वरिष्ठ नेता परिजनों के लिए टिकट चाहते थे। उनकी नाराजगी भी सामने आई पर, पार्टी अपनी नीति पर अड़ी रही!

भाजपा परिवारवाद के खिलाफ अपनी नीति पर कायम है। इसका बड़ा असर लोकसभा चुनाव में भी दिखा। लोकसभा चुनाव के बाद धवस्त हुई कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी को इस्तीफा देना पड़ा। राहुल ने कहा था, वे चाहते हैं कि गांधी परिवार से बाहर कोई व्यक्ति कांग्रेस अध्यक्ष बने। यह हमारी नीति का ही परिणाम है कि अन्य पार्टियां भी परिवारवाद के खिलाफ विचार करने लगी हैं।

विधानसभा की 90 में से आधी सीटों पर नए चेहरे उतारे गए हैं। इसमें किन समीकरणों को साधने की कोशिश की गई है? उम्मीदवारों के चयन में क्या प्राथमिकताएं रहीं?

भाजपा विचारधारा के साथ काम करने वाली पार्टी है। हमने साफ, ईमानदार छवि और जनसेवा के कार्यों को पैमाना बनाकर नए चेहरों को मौका दिया है। पुराने विधायकों के कार्यों के मूल्यांकन के आधार पर भी टिकट दिए गए हैं। हमारा एकमात्र समीकरण हरियाणा की 2.54 करोड़ जनता की सेवा करना है।

लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 10 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। विधानसभा में ‘75 पार’ का लक्ष्य कैसे हासिल करेंगे?

मैं पांच-छह बार प्रदेश का दौरा कर चुका हूं। नगर निगम चुनाव, पंचायत चुनाव, जींद उपचुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में सभी 10 सीटों पर जीत का रुझान देखें, तो हमें लगता है विधानसभा में भी 75 पार का लक्ष्य हासिल कर लेंगे। एक के बाद एक जीत का श्रेय केंद्र और प्रदेश की नीतियों को जाता है। हरियाणा में विपक्षी पार्टियां टूट रही हैं, उनके नेताओं में झगड़े हो रहे हैं। विपक्ष में खालीपन से जनता में भाजपा के प्रति विश्वास बढ़ा है।

हरियाणा के बारे में कहा जाता है कि यहां लाल परिवारों की राजनीति होती थी। आपके नाम में भी मनोहर लाल है। आपको लगता है कि राज्य में लालों का वर्चस्व टूट रहा है?

लाल परिवारों की राजनीति परिवारवाद से ग्रस्त थी। हमारी राजनीति सामान्य जनता से जुड़ी है। मेरा परिवार प्रदेश के ढाई करोड़ लोग हैं। स्वाभाविक है कि लोग मनोहर लाल और भाजपा सरकार के कार्यों को प्राथमिकता देंगे।

आपके मुकाबले कौन सी पार्टी है- कांग्रेस, जेजेपी या इनेलो?

पार्टी के नाते कोई नहीं है। जगह-जगह कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर जीत सकते हैं। कई बार इलाका विशेष में कुछ लोगों का प्रभाव जाति और लोगों पर किए एहसान की वजह से होता है। हालांकि नया खून आगे रहा है, तो पुराने लोगों को नकारा जा सकता है।

किसान प्रधान राज्य होने के नाते पांच साल के बाद हरियाणा का किसान खुद को कहां देखता है?

किसान संतुष्ट है। बाकी प्रदेशों की तुलना में हरियाणा के किसानों की स्थिति बेहतर है। अन्य पार्टियों ने कर्जमाफी की घोषणाएं की हैं, पर हम उनकी दुख-तकलीफ में साथ खड़े हैं। फसल बीमा योजना, पेंशन योजना, ब्याज मुक्त कर्ज, एमएसपी पर फसलों की खरीद, भावांतर योजना के तहत उन्हें घाटे से उबारा गया है।

चुनावों में अनुच्छेद 370 का कितना लाभ मिलता दिख रहा है?

बहुत लाभ होगा। यह लोगों की सत्तर साल पुरानी मांग थी। अनुच्छेद 370 की वजह से ही कश्मीर में केंद्र की भूमिका सीमित थी, पर अब बढ़ गई है। कश्मीर में आतंकवाद समाप्त होगा। आतंकवाद की वजह से हरियाणा के जो सैनिक शहीद होते थे, उसमें कमी आएगी। सैनिकों के परिवारों में खुशी है।

आपने हरियाणा में भी एनआरसी लागू करने की बात की है। इसकी क्या जरूरत है?

आज जरूरत महसूस नहीं होती, पर आज दूसरे देश का कोई नागरिक या परिवार यहां आकर बसता है तो कल उसका प्रभाव बढ़ सकता है। इसे रोकने के लिए आज ही कदम उठाने की जरूरत है।

शिक्षा और स्वास्‍थ्य दो बड़े मसले हैं। अगले पांच साल में इन दोनों क्षेत्र में ऐसा क्या करना चाहेंगे, जिससे हरियाणा की ऐसी पहचान बने जो लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव लाए?

शिक्षा, स्वास्थ्य के अलावा सुरक्षा पर हमारा ध्यान है। हमारा फोकस एसएचए (सिक्युरिटी, हेल्थ और एजुकेशन) फैक्टर पर है। ये तीनों फैक्टर मजबूत होने चाहिए। रोजगारपरक शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ हम वेलनेस सेंटर भी खोल रहे हैं।

बेरोजगारी बड़ी चुनौती है। निवेश और रोजगार के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?

कारोबार की प्रक्रिया सरल की गई है। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में हरियाणा 14वें से तीसरे स्थान पर आ गया है। दिल्ली-एनसीआर में होने का लाभ हरियाणा को मिलता है। इसलिए देश में कार्यरत 500 फॉर्चून कंपनियों में से 200 के कार्यालय हरियाणा में हैं। इन्‍वेस्टर्स समिट के बाद राज्य में लगभग 85,000 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।

कहा जाता है कि करीब 70,000 नौकरियां बिना सिफारिश, बिना रिश्वत के दी गईं। लेकिन विपक्ष राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में कई बार पेपर लीक होने की बात उठा रहा है?

हमारी पारदर्शी भर्ती का सबूत आपको हरियाणा के हर गांव में मिल जाएगा। युवा अपनी मेहनत के दम पर भर्ती हुए हैं। पिछली सरकारों ने पर्ची-खर्ची की व्यवस्था बना दी थी, जिससे मेहनती और ईमानदार युवाओं का भरोसा उठ गया था। हमने उस भरोसे को फिर से कायम किया है। इससे युवाओं में उम्मीद जगी है। अब नौकरियों के लिए नेताओं के चक्कर काटने की परंपरा भी खत्म हो गई है।

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