जन सरोकार ही पीछे

हरवीर सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

हरवीर सिंह
महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावी नतीजे गवाह हैं कि लोग सरकारों को असली मुद्दों से रू-ब-रू करा सकते हैं। अंततः इसके लिए लोगों को आगे आना होगा कि कल्याणकारी व्यवस्था कायम रहे

करीब 20 साल पहले केंद्रीय बजट में बुजुर्गों की छड़ी पर टैक्स लगा दिया गया था। कुछ इसी तरह का एक और मामला मेरे संज्ञान में तब आया, जब परिवार के एक बुजुर्ग के बीमार होने पर अस्पताल में भर्ती करने के बाद नर्सिंग केयर की जरूरत पड़ी और बुजुर्गों की देखभाल करने वाली एक कंपनी से स्टॉफ लिया। उस स्टॉफ के मेहनताने पर सरकार को 18 फीसदी वस्तु माल और सेवाकर (जीएसटी) का भुगतान करना पड़ा। इससे तो यही साबित होता है कि देश में सामाजिक सुरक्षा के मामले में सरकारें न सिर्फ पूरी तरह उदासीन हैं, बल्कि आम नागरिक खुद इस मोर्चे पर कोई कदम उठाता है तो सरकारी तंत्र उसे कर वसूली का मौका मान बैठता है। यानी राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र को लोगों की जरूरतों और सरोकार की कोई परवाह ही नहीं है। बात यहीं नहीं रुकती, जिस देश में वित्तीय और स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर सरकारें उदासीन हैं या फिर दिखावे में व्यस्त हैं, वहां जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा के जरिए सुरक्षा हासिल करने के कदम भी सरकार के खाते में टैक्स दिए बिना पूरे नहीं होते। यही नहीं, शिक्षा के मोर्चे पर लगभग नाकाम सार्वजनिक तंत्र के चलते जब कोई व्यक्ति अपने बच्चों को कोचिंग के जरिए बेहतर शिक्षा दिलाने की कोशिश करता है, तो वहां भी सरकार को टैक्स चाहिए। इनमें ऐसा एक भी मसला नहीं है, जिसे उपभोक्ता उत्पाद की श्रेणी में डाला जाए। ये ऐसे मसले हैं जिनसे सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है और आम आदमी को वित्तीय बोझ उठाने पर मजबूर कर रही है।

लेकिन, गौरतलब यह है कि ऐसे संवेदनशील मसलों पर लोग भी आवाज नहीं उठाते हैं, न इसे सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाते हैं। हमारे समाचार माध्यम भी ऐसे मसलों की अनदेखी करते हैं।

दरअसल, राजनैतिक दलों का मकसद लोक कल्याण कम और सत्ता हासिल करना ज्यादा हो गया है। इसलिए वे भावनात्मक मुद्दों की खोज में लगे रहते हैं और उन मुद्दों को ही चुनाव के समय जनता के बीच लेकर जाते हैं। फिर, जब सरकार चलाने वाले नेताओं को ही इसकी चिंता नहीं, तो नौकरशाही भला इसकी चिंता क्यों करे। उसका ध्यान तो अधिक वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए अधिक कर संग्रह पर, या खर्च बचाने पर रहता है। हाल ही में कई राज्यों में मंत्रियों के आयकर भुगतान राज्य सरकारों द्वारा किए जाने के चौंकाने वाले मामले सामने आए। ऐसी तमाम सुविधाएं हैं जो देश के आम लोगों से जुटाए कर के पैसे से नौकरशाहों और मंत्रियों को दी जाती हैं, लेकिन वहां यह तंत्र चुप्पी साध लेता है।

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि जनता सब कुछ चुपचाप देखती रहती है। वह प्रतिक्रिया भी देती है। यही वजह है कि कई बार वह भावनात्मक मुद्दों को नकारकर अपने जीवन के अच्छे-बुरे से सीधे जुड़े मुद्दों पर अपनी राय देती है। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव नतीजे काफी कुछ इस ओर इशारा करते हैं। मसलन, सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार और देश की सबसे ताकतवर पार्टी भाजपा ने इन राज्यों में राष्ट्रवाद, अनुच्छेद 370 के जरिए कश्मीर को मिले विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने और उसे दो केंद्रशासित क्षेत्रों-जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख में विभाजित करने को चुनाव प्रचार का प्रमुख एजेंडा बनाया। हरियाणा में भी उसने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने की बात कहकर राष्ट्रवाद को चुनाव प्रचार में काफी अहमियत दी। इसके उलट दोनों राज्यों में विपक्षी दलों ने तमाम कमजोरियों के बावजूद स्थानीय मसलों- युवाओं में बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं और सुस्त अर्थव्यवस्था को लेकर सत्ताधारी दल पर हमले किए। नतीजा यह हुआ कि हरियाणा में भाजपा बहुमत से दूर हो गई और उसे सरकार बनाने के लिए एक नया सहयोगी तलाशना पड़ा। महाराष्ट्र में शरद पवार के नेतृत्व में उनकी पार्टी राकांपा और सहयोगी कांग्रेस, दोनों पहले से ज्यादा सीटें जीत गईं और भाजपा की सीटें घट गईं। इससे उसके सहयोगी दल शिवसेना को ज्यादा मोलभाव का मौका मिल गया।

ये नतीजे साफ कर रहे हैं कि लोगों के बीच मुद्दों को लेकर नई समझ विकसित हो रही है, जो भाजपा के जांचे-परखे फॉर्मूले से अलग है। इसमें आर्थिक और स्थानीय मसले हावी हो रहे हैं। यही वजह है कि हरियाणा में अधिकांश मंत्री हार गए और महाराष्ट्र में राज्य के सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार रहे स्व. गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे भी चुनाव हार गईं। वह पिछली सरकार में हाइ प्रोफाइल मंत्री थीं। अब झारखंड, दिल्ली और बिहार के आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा और विपक्ष, दोनों को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी, जो लोगों के आम जीवन से जुड़े मसलों के इर्द-गिर्द होनी चाहिए।

वैसे, देश के आम नागरिक का भी जिम्मा बनता है कि वह नौकरशाही और राजनैतिक तंत्र को अपने जीवन को बेहतर बनाने के मसलों पर काम करने के लिए मजबूर करे। अगर वह भावनात्मक मसलों को ही तरजीह देता रहेगा तो फिर उसके बुजुर्ग के लिए खरीदी जाने वाली छड़ी पर भी टैक्स लगता रहेगा और बुजुर्गों की सेवा पर भी। इसलिए तंत्र की जवाबदेही तय करने के लिए लोगों को ही जिम्मा संभालना होगा। 

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