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सुशासन बाबू से ही आस

नीतीश ने हर वर्ग का भरोसा जीता, उनके 15 साल के कार्यकाल में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं
वर्चुअल रैली में नीतीश को सुनते उनके समर्थक

किसी भी चुनाव में नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी-इन्कम्बेंसी न होने का एक कारण जो मैं समझ पाया हूं, वह है वादे करना और उन्हें पूरा करना। उन्होंने बिहारी गौरव और विकास कार्यों का ऐसा नैरेटिव बनाया कि उस फलक पर सभी दलों को ले आए। 2005 से पहले राज्य में आम तौर पर सिर्फ जाति आधारित राजनीति होती थी। उन्होंने सबके विकास का नैरेटिव बनाया, जिसमें विपरीत छोर के लोग- ऊंची जातियां, अति पिछड़ा और महादलित सब शामिल थे। उन्होंने जो भी वादे किए, उसे पूरा किया। उदाहरण के तौर पर इसी कार्यकाल में उन्होंने हर घर तक बिजली पहुंचाने का वादा किया और इसे समय से पहले पूरा किया। उन्होंने वादा किया था कि हर घर में पाइप के जरिए पानी पहुंचेगा, इसे भी उन्होंने पूरा कर दिखाया। उनके ऐसा करने के दो साल बाद केंद्र सरकार यह योजना लेकर आई, जो 2023-24 में पूरी होगी। बिहार में 83 फीसदी लोगों के घर यह योजना अंजाम तक पहुंच गई है। अगर लॉकडाउन न हुआ होता, तो यह अब तक 100 फीसदी हो गया होता।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 2005 से पहले बिहार में महिलाओं को कोई अलग वोटर वर्ग मानने को तैयार न था। आम तौर पर यह समझा जाता था कि घर के पुरुष जिसे वोट देंगे, उसे ही घर की महिलाएं भी वोट देंगी। इसकी चर्चा कम ही होती है, लेकिन 2005 के बाद एक महिला वोटर वर्ग बगैर किसी शोर-शराबे के सामने आया। 2006 के बाद तीन त्रि-स्तरीय पंचायती चुनावों में 50 फीसदी आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं जीत कर आईं और बड़ी शक्ति के रूप में उभरीं। उन्हें नौकरियों में 35 फीसदी आरक्षण भी मिला। आज, राज्य पुलिस में जितनी महिलाएं बिहार में हैं, देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हैं। इस महिला सशक्तीकरण का कहीं न कहीं नीतीश कुमार से संबंध है। सभी लोग मुस्लिम और महादलित वोट बैंक के बारे में बात करते हैं, लेकिन जेंडर लाइन पर भी वोटिंग होती है, यह पहले कभी नहीं देखा गया था। ऐसे अनेक मामले देखने को मिले, जहां महिलाओं ने अपने घर के पुरुषों से अलग वोट दिया। जिस राज्य में निराशा का अंधकार था, वहां उन्होंने उम्मीद का वातावरण बनाया।

इसके अलावा, बिहार की राजनीति में वे अकेले नेता हैं जिनका परिवारवाद का कोई चक्कर नहीं है। कोई नहीं कह सकता कि पिछले पंद्रह वर्षों में उन्होंने अपने परिवार के किसी आदमी को बढ़ाने की कोशिश की। ऐसा नहीं कि उनका परिवार नहीं है, लेकिन क्या किसी ने उनके आसपास किसी पारिवारिक सदस्य को देखा है? इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद भी इस संबंध में उनकी राजनीति बेदाग रही है। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। इसीलिए चुनाव में लोगों का नीतीश पर विश्वास है। बिहार जैसे राज्य में ये बातें उनकी ईमानदारी और कर्मठता के साथ चुनावों में महती भूमिका निभाएंगी।

बिहार में 2005 से पहले अखबारों की सुर्खियां होती थीं, उसका एक सैंपल सर्वे करना चाहिए। तब अखबार नरसंहार, अपहरण, हत्या जैसी खबरों से भरे रहते थे। लेकिन पिछले पंद्रह वर्षों में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ और सिर्फ एक दिन के लिए एक शहर में कर्फ्यू लगा। धर्म और जाति के नाम पर जो तनाव होते थे, वे नहीं हुए। इससे लोगों का उनमें विश्वास बढ़ा। जिस राज्य को कभी डॉक्टर और इंजीनियर फिरौती के डर से छोड़ कर चले जाते थे, वहां के लिए यह असाधारण बात थी। एकाध ऐसी घटना हुई भी तो लोग पकड़े गए, क्योंकि उन्हें राजनैतिक संरक्षण नहीं मिला। जनता यह सब समझती है।    

पंद्रह साल बाद भी लोगों का उनमें यह विश्वास कायम है। कुछ लोग कहते हैं कि उनके पहले पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान जो विकास के काम हुए, वह बाद में नहीं हुए। ऐसा नहीं हैं। दरअसल, पहले पांच वर्षों में उन्हें जिस हालत में बिहार मिला था, उसके कारण उन्हें बहुत सारे गड्ढे भरने थे। इसीलिए उस समय के कार्य की ज्यादा चर्चा होती है। अब उम्मीदें और अपेक्षाएं बढ़ गई हैं, क्योंकि उन्होंने जो कहा, वह कर के दिया है। आज 15 साल के शासन के बाद अगर जातिगत भावनाओं से उठकर लोगों को कुछ शिकायतें भी हैं तो यह उम्मीद भी उन्हीं से है कि वे ही उनकी आकांक्षाओं को पूरा करेंगे। बिहार में अभी तक दूसरा कोई नेता ऐसा नैरेटिव नहीं बना पाया।

(लेखक बिहार सरकार में जल संसाधन मंत्री और जदयू के राष्ट्रीय महासचिव है।)

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