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जनादेश'21/पश्चिम बंगाल: खेल में नए रंग और मोड़

पहले चरण के मतदान के दिन नजदीक पहुंचे तो बंगाल में चुनौती हर दावेदार के लिए विकट हुई, मुद्दे भी जुड़ने लगे
नए तेवरः अस्पताल से निकलने के बाद कोलकाता में ममता का रोड शो

भयंकर खेला होबे, एई माटी ते खेला होबे (भयंकर खेल होगा, इसी मिट्टी में खेल होगा)। हाल की एक रैली में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता के इस बयान के बाद भाजपा के प्रवक्ता शमिक भट्टाचार्य का जवाब था, “जो भयंकर खेला की चेतावनी दे रहे हैं, उन्हें चुनाव के बाद अपने ड्राइंग रूम में बैठकर लुडो खेलने का ढेर सारा समय मिलेगा।” ये आरोप-प्रत्यारोप साफ संकेत हैं कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में जो गरमी ऊपर यानी बड़े नेताओं से नीचे कार्यकर्ताओं तक उतर रही है, उसमें कितनी आंच है। यह आंच कई रूपों में प्रकट हो रही है, जिसके अक्स नारों, तुकबंदियों, गीतों के जरिए हर जुबान पर खिलने लगे हैं।

यूं तो हर कहीं, हर बार चुनाव नए रंग और लय के दर्शन कराते हैं, लेकिन बंगाल में नारों, तुकबंदियों, दीवाल लेखन के रंग तो लाजवाब हैं। इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की युवा शाखा के महासचिव देबांग्शु भट्टाचार्य ने कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर के गीत ‘मोदेर जेमोन खेला, तेमनी जे काज’ (हमारा जैसा खेल, वैसा ही काम) की तर्ज पर ‘खेला होबे’ गीत बनाया, जो अब इन चुनावों का सबसे चमकदार नारा बन गया है। जवाब में भाजपा ने ‘खेलार माठे लड़ाई होबे’ (खेल के मैदान में लड़ाई होगी) और ‘पीशी जाओ’ (बुआ जाओ) की तुकबंदी आगे बढ़ाई। उधर, वाम मोर्चे तथा माकपा ने ‘टुम्पा, तोके निये ब्रिगेड जाबो’ (टुम्पा, तुझे लेकर ब्रिगेड जाऊंगा) और ‘लाल फेराओ, हाल फेराओ’ (लाला लौटाओ, स्थिरता लाओ)। जाहिर है, इन नारों या तुकबंदियों में कौन सबसे अधिक जुबान पर चढ़ता है, शायद उससे भी संकेत मिलता है कि हवा का रुख क्या है।

हवा का यह रुख किधर जोरदार है या आगे होता जाएगा, यह तो 2 मई को नतीजे के दिन पता चलेगा लेकिन 27 मार्च को पहले चरण के मतदान के लिए लहर तेज बहने लगी है। संयोग से शुरुआत उसी दक्षिण-पश्चिम इलाके से हो रही है, जो बंगाल की गद्दी की लड़ाई का मुख्य केंद्र बन गया है। पुरुलिया, बांकुड़ा, जंगल महल, झाड़ग्राम, पश्चिमी और पूर्वी मिदनापुर जिलों के इसी इलाके में नंदीग्राम है, जो आज से दस साल पहले बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के ‘परिवर्तोन’ के नारे के साथ वाम मोर्चे की विदाई का गवाह बना था और आज फिर भाजपा की ‘आसोल परिवर्तोन’ के जरिए ममता को चुनौती देने का मैदान बना हुआ है। चुनौती की बेला जितनी नजदीक आती जा रही है, उतनी ही इसी मैदान से ऐसे नए मोड़ उभर रहे हैं, जो चुनौती को विकट बनाते लग रहे हैं।

नंदीग्राम से अपने एक वक्त के सिपहसालार, अब भाजपा में गए शुभेंदु अधिकारी की चुनौती से दो-चार होने शिवरात्रि के दिन मुख्यमंत्री अपना पर्चा भरने के बाद रोड शो पर निकलीं तो कथित तौर पर उनकी कार के दरवाजे में धक्का लगने से उनके पैर में चोट आ गई। इसे भाजपा नेताओं ने ही नहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीररंजन चौधरी ने भी नौटंकी बताया, लेकिन अस्पताल में पहुंचीं ममता के प्रति देश भर से संवेदनाएं आने लगीं। अब एक पैर में प्लास्टर के साथ ह्वीलचेयर पर ममता फिर मैदान में निकल पड़ी हैं और पहले चरण के मतदान वाले इलाके में यह कहती घूम रही हैं कि “मेरा पैर चोटिल किया जा सकता है लेकिन गला बंद नहीं किया जा सकता।”

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा भी इस इलाके में सबसे ज्यादा जोर लगा रही है क्योंकि इसी इलाके और उत्तर बंगाल से उसे लोकसभा में सर्वाधिक सीटें मिली थीं। इन्हीं इलाकों के खासकर आदिवासी, अनुसूचित जाति (तपसीली और मतुआ समुदाय) वगैरह में उसकी पैठ बढ़ी है और वाम तथा कांग्रेस समर्थकों के पाला बदल से उसका वोट प्रतिशत 2016 के विधानसभा चुनावों में करीब 10 फीसदी से बढ़कर 2019 के लोकसभा चुनावों में 40 फीसदी पर पहुंच गया था। हालांकि अमित शाह की झाड़ग्राम और बांकुड़ा की सभाओं में आई कम भीड़ को यह संकेत माना जा रहा है कि संसदीय चुनावों से इस बार रुझान कुछ अलग है।

वैसे वोटर ज्यादातर शांत हैं, इसलिए वाम मोर्चे का दावा है कि उसका काडर वापस लौट रहा है, जो हताशा में भाजपा की ओर चला गया था। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से हवा का रुख बदला हुआ दिख सकता है। लेकिन ममता कोई गुंजाइश छोड़ना नहीं चाहतीं। वे लगातार अपना प्लास्टर किया पैर लिए सभाएं कर रही हैं और हर हाल में भाजपा को हराने की बात कह रही हैं। गौरतलब यह भी है कि ममता या यहां तक कि वाम मोर्चे या उसकी सहयोगी कांग्रेस का हमला भी ज्यादातर भाजपा पर ही हो रहा है। यानी असली निशाने पर भाजपा ही है। संभव है कि इस टक्कर में भाजपा को कुछ सीटें मिल जाएं, बशर्ते वह अपना पिछले लोकसभा का वोट शेयर बरकरार रख पाती है। हालांकि यह भी सही है कि वाम मोर्चा तो मैदान में दिख भी रहा है मगर कांग्रेस की खास मौजूदगी नहीं दिख रही है, न कांग्रेस के बड़े नेता कहीं मैदान में दिख रहे हैं।

उधर, नंदीग्राम ही एक और हलचल का गवाह बना है। दिल्ली में मोर्चा लगाए किसान नेता अपने ‘भाजपा हराओ’ अभियान के तहत कोलकाता के बाद नंदीग्राम और सिंगूर ही पहुंचे। हालांकि नंदीग्राम में परोक्ष तौर ममता को समर्थन करने के कारण वामपंथी पार्टियों के नेता किसान नेताओं के साथ वहां नहीं गए। लेकिन बाकी इलाकों में किसानों की सभा में सबकी शिरकत रही। इन नेताओं ने अपील की कि नए कृषि कानून और सरकारी संपत्तियों को बेचने वाली भाजपा को वोट न दें। किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चढूनी और राकेश टिकैत के प्रति लोगों में दिलचस्पी भी दिखी। किसान संयुक्त मोर्चे के सदस्य योगेंद्र यादव ने कहा, “अगर हमारी कोशिशों से भाजपा का 2 फीसदी भी वोट कम हुआ तो हम अपनी कोशिश सफल मानेंगे।”

किसान नेता राकेश टिकैत और बलबीर सिंह राजेवाल भी अपने 'भाजपा हराओ' अभियान के तहत कोलकाता और नंदीग्राम में पहुंचे

किसान नेता राकेश टिकैत और बलबीर सिंह राजेवाल भी अपने 'भाजपा हराओ' अभियान के तहत कोलकाता और नंदीग्राम में पहुंचे

यह कितना हो पाता है, यह तो बाद में दिखेगा लेकिन भाजपा ने दूसरी सूची में जैसे अपने चार सांसदों को उतारा, उससे भी कुछ संकेत मिलते हैं। राज्यसभा में मनोनीत सदस्य स्वपन दासगुप्ता को तारकेश्वर से पर्चा भरने पर कुछ झेंप भी झेलनी पड़ी। तृणमूल की सांसद महुआ मोइत्रा ने सवाल उठाया तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बहरहाल, लड़ाई जोरदार और दिलचस्प है, इसीलिए पांच राज्यों के चुनाव में सबसे ज्यादा ध्यान पश्चिम बंगाल पर ही लगा हुआ है।

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