पैकेज बिना सब सूना

एस.के. सिंह
जुलाई के पहले पखवाड़े फैशन रिटेल कंपनियों की बिक्री एक चौथाई रह गई
जुलाई के पहले पखवाड़े फैशन रिटेल कंपनियों की बिक्री एक चौथाई रह गई

एस.के. सिंह
मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार दूसरा राहत पैकेज कोरोना का वैक्सीन आने के बाद, लेकिन पैकेज को अनिश्चितता से जोड़ना कितना उचित

विक्रम देकाते की औरंगाबाद में डेक्सन कास्टिंग नाम की कंपनी है, जो दोपहिया वाहनों के लिए एल्युमिनियम कास्टिंग करती है। उन्होंने प्रॉपर्टी के एवज में एक एनबीएफसी से कर्ज ले रखा था। लॉकडाउन के दौरान कैशफ्लो घट गया तो इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम के तहत वर्किंग कैपिटल लोन लेने की सोची। एनबीएफसी के अलावा कई सरकारी और निजी बैंक गए, पर सरकार की शर्तों के विपरीत सब कोलैटरल मांग रहे हैं। पुराने कर्ज की ईएमआइ पर तीन महीने का मोरेटोरियम लिया है, लेकिन उससे ईएमआइ की अवधि 10-11 महीने बढ़ गई। चिंता है कि अगर फिर मोरेटोरियम लेना पड़ा तो ईएमआइ कई साल के लिए बढ़ जाएगी। स्थिति खराब हुई तो कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ेगी, हो सकता है कंपनी भी बंद करनी पड़े। इसलिए विक्रम चाहते हैं कि सरकार ऐसे कदम उठाए जिनसे मांग बढ़े और कैशफ्लो सुधरे।

आंकड़े

लेकिन सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के.वी. सुब्रमण्यम के बयान के बाद विक्रम को भरोसा नहीं कि स्थिति जल्दी सुधरेगी। सुब्रमण्यम के अनुसार कोविड-19 महामारी का वैक्सीन तैयार होने के बाद सरकार दूसरा राहत पैकेज लेकर आएगी। उद्योग जगत तो तत्काल राहत की उम्मीद लगाए बैठा ही है, ज्यादातर अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि सरकार जितनी देर करेगी, हालात उतने खराब होंगे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इनफॉर्मल सेक्टर एेंड लेबर स्टडीज से हाल ही रिटायर हुए और इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लाइड मैनपावर रिसर्च के पूर्व महानिदेशक प्रो. संतोष मेहरोत्रा ने आउटलुक से कहा कि राहत पैकेज को वैक्सीन से जोड़ना सर्वथा अनुचित है। सरकार को कर्ज लेकर खर्च करने की जरूरत है। आइएचएस मार्किट के एपीएसी (एशिया-प्रशांत) चीफ इकोनॉमिस्ट राजीव विश्वास कहते हैं, कई वैक्सीन क्लिनिकल ट्रायल के चरण में हैं, सबसे एडवांस ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप का है और उसके भी दिसंबर से पहले पूरा होने की उम्मीद नहीं है। वैक्सीन के बाजार में आने की कोई तय समय सीमा नहीं है। इसलिए राहत पैकेज को अनिश्चित टाइमलाइन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, खासकर तब जब अर्थव्यवस्था घोर मंदी की ओर बढ़ रही हो और करोड़ों लोग इसकी मार झेल रहे हों। हालांकि कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि इंतजार करने में बुराई नहीं। उद्योग चैंबर सीआइआइ की चीफ इकोनॉमिस्ट विदिशा गांगुली कहती हैं कि वैक्सीन का उपभोक्ता सेंटिमेंट पर सकारात्मक असर होगा, इसलिए उस समय सरकार जो भी खर्च करेगी उसका अर्थव्यवस्था पर असर भी अधिक होगा। सरकार के पास फंड की समस्या है और अतिरिक्त खर्च से रेटिंग घटने और वित्तीय अस्थिरता का खतरा रहेगा।

भारत में जुलाई में कोरोना संक्रमण 200% बढ़ा और मरने वालों की संख्या 116% बढ़ी। इसे रोकने के लिए राज्य सरकारें जब-तब लॉकडाउन कर रही हैं, जो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में बड़ी बाधा बन रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग लगातार चौथे महीने गिरी, जुलाई की स्थिति जून से भी खराब है। इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में मैलकम आदिशेषैया चेयर प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि शुरू में लॉकडाउन ठीक से लागू नहीं किया गया, इसलिए बार-बार ऐसा करना पड़ रहा है। डिमांड बढ़ाने के लिए मदद जरूरी है, खासकर उनकी जिनकी नौकरियां चली गई हैं। असंगठित क्षेत्र में 20 करोड़ नौकरियां गई हैं और ये गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं। इस तरह कुल 80 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, इनके लिए सर्वाइवल पैकेज चाहिए। प्रो. अरुण कुमार के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र की तरह शहरों के लिए भी रोजगार गारंटी स्कीम की जरूरत है, क्योंकि अनेक ऐसे लोग हैं जिनकी नौकरी तो चली गई पर वे अपने गांव वापस नहीं गए या गांव से लौटकर तो आए, लेकिन शहरों में काम नहीं मिला है। सीएमआइई के अनुसार संगठित क्षेत्र में 1.4 करोड़ नौकरियां गई हैं, अनेक लोगों के वेतन में भी कटौती हुई है।

कुछ वस्तुओं की मांग बढ़ी पर यह कुछ इलाकों तक सीमित है। ग्रामीण इलाकों में शहरों की तुलना में पाबंदी कम है, इसलिए वहां मांग में वृद्धि है। वहां बेरोजगारी दर भी शहरों से कम है, लेकिन आगे मुश्किलें बढ़ सकती हैं। प्रो. मेहरोत्रा के अनुसार गांवों में लोगों को इसलिए काम मिला क्योंकि मार्च-अप्रैल में जब वे गांव लौटे तो उस समय फसल कटाई का मौसम था, उसके बाद खरीफ की बुवाई-रोपाई होने लगी। अब वहां कोई काम न होने के कारण मजदूर वापस शहर आना चाहते हैं, लेकिन शहरों में भी उनके लिए काम की कमी है। कंस्ट्रक्शन का काम पूरी तरह शुरू नहीं हुआ, इसलिए इस सेक्टर में पहले जितने मजदूर थे उतने नहीं खप सकते। सर्विस सेक्टर में एयरलाइंस, पर्यटन, होटल एवं रेस्तरां, ट्रांसपोर्ट ज्यादातर में बिजनेस ठप पड़े हैं। सीआइआइ की विदिशा भी मानती हैं कि मिनी लॉकडाउन से काफी अनिश्चितता पैदा हो रही है और बिजनेस करना मुश्किल हो रहा है। सरकार के अधिकारी भले ‘हरी कोंपलें’ दिखने की बात कह रहे हों, आइएचएस मार्किट के राजीव के अनुसार महामारी पर नियंत्रण पाने तक स्थायी रिकवरी मुश्किल है।

गैर-जरूरी खर्चे घटे

असंगठित क्षेत्र में तो बेहिसाब नौकरियां गई हैं, संगठित क्षेत्र में भी कम ही हैं जिनकी नौकरी और सैलरी दोनों बची है, इसलिए लोग गैर-जरूरी खर्चे नहीं कर रहे हैं। केपीएमजी के एक सर्वे में 78% उपभोक्ताओं ने कहा कि वे जरूरी वस्तुओं को छोड़ बाकी खर्चों में कटौती करेंगे। भारी-भरकम डिस्काउंट के बावजूद फैशन रिटेल कंपनियों का ‘एंड ऑफ सीजन सेल’ फ्लॉप साबित हुआ है। पहले सेल के दौरान सामान्य दिनों की तुलना में दो से ढाई गुना ज्यादा बिक्री होती थी। इस बार बिक्री 10% से 20% ही बढ़ी। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार जुलाई के पहले पखवाड़े में फैशन रिटेल कंपनियों की बिक्री एक चौथाई रह गई। डाटा एनालिटिक्स फर्म नीलसन के अनुसार एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में एफएमसीजी की बिक्री में अभी तक गिरावट का ही ट्रेंड है। हालांकि एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर ड्यूरेबल समेत कुछ सेक्टर ने जून की तुलना में जुलाई में बेहतर प्रदर्शन किया है।

रियल एस्टेट ब्रोकरेज फर्म प्रॉप टाइगर के अनुसार अप्रैल-जून के दौरान आठ बड़े शहरों में घरों की बिक्री 79 फीसदी घटकर 19,038 यूनिट रह गई। बैंकिंग और फाइनेंस, एफएमसीजी, आईटी और फार्मा को छोड़ दें तो बाकी कंपनियों की बिक्री जून तिमाही में औसतन 35% और मुनाफा 60% घटा है। प्रो. अरुण कुमार के अनुसार मांग कम होने के चलते निवेश भी नहीं हो रहा है, क्योंकि जब पुरानी क्षमता का ही पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा तो नए निवेश से नुकसान और बढ़ जाएगा।

कॉमर्शियल वाहनों की बिक्री आर्थिक गतिविधियों का संकेत देती हैं। केयर रेटिंग्स का अनुमान है कि मौजूदा वित्त वर्ष में इनकी बिक्री 30% से 35% फीसदी घट सकती है। मझोले और बड़े आकार के वाहनों में ज्यादा गिरावट का अंदेशा है। इन वाहनों के पार्ट्स बनाने वाली कंपनी आरएसबी ट्रांसमिशन के एमडी और वाइस चेयरमैन एस.के. बेहरा ने बताया कि पिछले साल इस सेगमेंट की कंपनियों की बिक्री 35% गिर गई, इस साल पहली तिमाही में गिरावट 80% है। उनकी कंपनी में अभी सिर्फ 15% उत्पादन हो रहा है। बेहरा के अनुसार सरकार ने अब भी कुछ नहीं किया तो हालात काफी बिगड़ जाएंगे।

मांग कम होने के चलते कोर इंडस्ट्री का उत्पादन चार महीने से लगातार गिर रहा है। अप्रैल-जून तिमाही में गिरावट 24.6% है। ऐसे में जीएसटी संग्रह का घटना भी लाजिमी है। जुलाई में हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों के जीएसटी संग्रह में 12% से लेकर 25% तक की गिरावट आई है। इसलिए विभिन्न संस्थाओं ने मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर -3.2% से -9.5% तक रहने का अंदेशा जताया है। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का आकलन है कि प्रमुख एशियाई देशों में रिकवरी के मामले में भारत की स्थिति सबसे खराब है। यानी कोरोना से पहले के स्तर पर पहुंचने में भारत को सबसे अधिक समय लगेगा। प्रो. मेहरोत्रा मानते हैं कि 2019-20 में अर्थव्यवस्था का जो आकार था, उस स्तर पर 2023-24 में ही पहुंच सकेंगे।

आने वाले दिन फाइनेंशियल सिस्टम के लिए भी संकट भरे हो सकते हैं। रिजर्व बैंक ने फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में कहा है कि बैंकों का ग्रॉस एनपीए मार्च 2021 में 12.5% तक पहुंच सकता है, जो मार्च 2020 में 8.5% था। स्थिति और खराब हुई तो यह 14.7% तक भी जा सकता है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के मुताबिक सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बैंकों के पास पर्याप्त पूंजी रहे ताकि फाइनेंशियल सिस्टम संकट में न आए। मौद्रिक नीति की समीक्षा में केंद्रीय बैंक ने कर्ज की एक बार रिस्ट्रक्चरिंग की अनुमति दी है, उम्मीद है कि इससे बैंकों को कुछ राहत मिलेगी।

पहले पैकेज का असर

सरकार ने मई में जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर, 21 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी लेकिन इसका खास असर नहीं दिखा। प्रो. अरुण कुमार इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि सरकार सिर्फ दो लाख करोड़ रुपये खर्च कर रही थी, बाकी तो लिक्विडिटी और कर्ज बढ़ाने के उपाय थे। उनका आकलन है कि इस साल जीडीपी 35 फीसदी गिर जाएगी, इसलिए कम से कम पांच-छह फीसदी के बराबर पैकेज चाहिए। प्रो. मेहरोत्रा बताते हैं, 2008 का आर्थिक संकट अभी की तुलना में आधा भी नहीं था लेकिन उस समय जीडीपी के तीन से चार फीसदी के बराबर पैकेज दिया गया था, जबकि इस बार अभी तक सरकार ने सिर्फ एक फीसदी का पैकेज दिया है।

प्रो. मेहरोत्रा सरकार के खर्च बढ़ाने के कई दावों को भी सही नहीं मानते। वे कहते हैं, एक तो पूरे साल के दौरान खर्च के बजटीय प्रावधानों को शुरू में ही खर्च करने की बात कही गई। आयकर रिफंड लोगों को वैसे ही मिलना चाहिए, उसे भी पैकेज में जोड़ दिया गया। सरकार ने एमएसएमई के बकाए का जल्दी भुगतान करने की बात कही। प्रो. मेहरोत्रा पूछते हैं, बकाए का भुगतान पैकेज का हिस्सा कैसे हो सकता है? राजीव विश्वास तत्काल दूसरे पैकेज की वकालत करते हुए कहते हैं कि मई के बाद महामारी काफी बढ़ी और मंदी ज्यादा गहरी हो गई है, इसलिए अतिरिक्त उपायों की जरूरत है। यूरोपियन यूनियन, इंग्लैंड और अमेरिका भी नए पैकेज ला रहे हैं।

पहले पैकेज के सकारात्मक पक्ष बताती हुई सीआइआइ की विदिशा कहती हैं, गरीबों को नकद और अनाज उपलब्ध कराया गया जिसने रिकवरी शुरू करने में बड़ी भूमिका निभाई है। सीएमआइई के अनुसार जून में बेरोजगारी दर घटकर 11% पर आ गई जो अप्रैल-मई में 23% से अधिक थी। जीएसटी संग्रह, रेलवे से माल ढुलाई, पेट्रोल की खपत, बिजली की मांग और टोल कलेक्शन के आंकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में रिकवरी हो रही है।

क्या करना चाहिए

प्रो. अरुण कुमार के अनुसार लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए तत्काल पैकेज जरूरी है। सरकार को मनरेगा के लिए चार लाख करोड़ रुपये देने चाहिए और शहरी इलाकों में सोशल इन्फ्राट्रक्चर जैसे प्रोजेक्ट तेज करने चाहिए। सरकार 5-6 लाख करोड़ रुपये खर्च करे तो जरूरी वस्तुओं की मांग बढ़ेगी, इससे संगठित क्षेत्र में भी रोजगार बढ़ेगा। अप्रैल में कुल उत्पादन 25% से अधिक नहीं हो रहा था, यानी -75% की ग्रोथ थी। मई में यह -65% थी और अब भी -50% है। बजट भी नए सिरे से तैयार किया जाना चाहिए, क्योंकि पहले जो बजट बना था वह 10% नॉमिनल ग्रोथ के आधार पर था। प्रो. मेहरोत्रा की राय है कि सरकार को न्यूनतम आय की गारंटी देनी चाहिए। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को तीन से चार महीने तक दो-ढाई हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाने चाहिए। उनका आकलन है कि इस पर लगभग 70 हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा, लेकिन मांग बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी।

आंकड़े

सीआइआइ की विदिशा गांगुली कहती हैं, संकटग्रस्त सेक्टर को समर्थन की जरूरत है ताकि लोगों को नौकरियां मिल सकें। इससे एनपीए का खतरा भी कम होगा। वाहन स्क्रैप पॉलिसी लागू करने से आठ लाख पुराने वाहन सड़क से हटेंगे और नए वाहनों की मांग बढ़ेगी। पूंजी की कमी के चलते अनेक छोटे नर्सिंग होम बंद हो गए हैं। उनकी मदद करने से लोगों को नौकरियां तो वापस मिलेंगी ही, कोविड-19 महामारी से लड़ने में भी मदद मिलेगी। आइएचएस मार्किट के राजीव के अनुसार सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वैक्सीन के विकास में किसी तरह की रेगुलेटरी बाधा न आए। वैक्सीन डेवलपमेंट के अलावा सरकार उन करोड़ों लोगों की मदद करे जिनकी नौकरी चली गई या जिनकी कमाई के रास्ते बंद हो गए।

जीएसटी दरें बढ़ाने का सुझाव

आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती से एक नई समस्या खड़ी हो गई है। इस वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में कुल जीएसटी संग्रह 4.16 लाख करोड़ की तुलना में 34% गिर कर 2.72 लाख करोड़ रुपये रह गया है। केंद्र सरकार ने एक संसदीय समिति को बताया कि वह फिलहाल राज्यों की टैक्स की कमी की भरपाई (कंपेनसेसन) करने की स्थिति में नहीं है। कोविड-19 से लड़ने में राज्यों की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है, इसलिए उनके पास फंड की कमी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में बाधक बनेगी। कुल सरकारी खर्च में 60% हिस्सा राज्यों का ही होता है। कर संग्रह बढ़ाने के लिए पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने कुछ वस्तुओं को दोबारा 28% जीएसटी स्लैब में लाने, अमीरों के इस्तेमाल वाली सेवाओं पर 18 की जगह 28% टैक्स लगाने और सिगरेट तथा अन्य तंबाकू उत्पादों पर लगने वाले केंद्रीय उत्पाद शुल्क को कंपेनसेशन सेस में शामिल करने के सुझाव दिए हैं। बादल के अनुसार केंद्र को उधार लेकर राज्यों को पैसा देना चाहिए क्योंकि राज्य सरकारें जो कर्ज लेंगी उस पर ब्याज की दर अधिक होगी। बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का कहना है कि कोविड-19 की समस्या लंबे समय तक रहने वाली है, राज्यों के साथ केंद्र के सामने भी राजस्व का संकट है, इसलिए जीएसटी दरें बढ़ाई जानी चाहिए।

 

 

राहत पैकेज को वैक्सीन के अनिश्चित टाइमलाइन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, खासकर तब जब अर्थव्यवस्था घोर मंदी की ओर बढ़ रही हो और करोड़ों लोग इसकी मार झेल रहे हों

राजीव विश्वास, चीफ इकोनॉमिस्ट, आइएचएस मार्किट एपीएसी

वाहन स्क्रैप पॉलिसी लागू करने से नए वाहनों की मांग बढ़ेगी। अनेक छोटे नर्सिंग होम बंद हो गए हैं, उनकी मदद करने से लोगों को नौकरियां तो वापस मिलेंगी ही, महामारी से लड़ने में भी मदद मिलेगी

विदिशा गांगुली, चीफ इकोनॉमिस्ट, सीआइआइ

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