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सुनील मेनन और सिद्धार्थ मिश्रा
तुर्कमेनिस्तान के गोनुर का प्राचीन स्थपल जो बीएमएसी सभ्यता की राजधानी था, जिसके हड़प्पा से गहरे रिश्ते थे
तुर्कमेनिस्तान के गोनुर का प्राचीन स्थपल जो बीएमएसी सभ्यता की राजधानी था, जिसके हड़प्पा से गहरे रिश्ते थे

सुनील मेनन और सिद्धार्थ मिश्रा
वहां से यहां या यहां से वहाः राखीगढ़ी के नए डीएनए अध्ययन से गहरे और अटूट देसीपन, खेती के आविर्भाव...और निवासियों के बारे में कई तथ्य उजागर

अच्छी जासूसी कहानियों में ही अपराध की गुत्थी सुलझने के बाद भी कई तरह के सुराग और संकेत संदेह की गुंजाइश बनाए रखते हैं। तो, असल जिंदगी के ऐतिहासिक थ्रिलर तो अपने गर्भ में कहीं ज्यादा रहस्य समेटे हो सकते हैं, वह भी जब वे गूढ़ प्रतीकों, टूटी मोहरों, टूटे-फूटे दांत और अज्ञात भाषा में लिपटे हों। हड़प्पा सभ्यता अपने खास अंदाज में उजाले और अंधेरे की लुकाछिपी जैसी है। ईसा पूर्व चौथी और तीसरी सहस्राब्दी में इस आश्चर्यजनक व्यवस्‍था और संगति की सभ्यता पर सूरज खुलकर चमका था। उसके बाद एक प्रदीर्घ अंधेरा छा गया। इस अंधियारे से हल्का-सा पर्दा सिर्फ एक सदी पहले उठा। शुरू में घने धुंध का साया था, फिर धीरे-धीरे थोड़ा कोहरा छंटा तो बारीक ब्यौरे चौंकाने लगे। इसके प्रति कौतूहल बढ़ा, क्योंकि यह ऐसी दुनिया है जहां “तथ्यों” के मुकाबले “व्याख्या” ज्यादा अहम हो सकती है। लिहाजा, द्वंद्व शुरू हो गया। लंबे समय के बाद धुंधलके में से कठोर सच्चाई की तस्वीर दिखाई देने लगी। इनमें कई सच पुरातत्व और भाषाविज्ञान के जरिए झिलमिलाने लगे लेकिन जेनेटिक्स हमारे दिमाग की तसवीरों पर तेज छुरियां चला रही हैं।

राखीगढ़ी सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे पुराने केंद्रों में है। शायद यह सबसे बड़ा भी है। भारत के लिए यह इस वजह से महत्वपूर्ण है कि इस सभ्यता के दो सबसे प्रसिद्ध केंद्र मोएन-जोदाड़ो और हड़प्पा पाकिस्तान में हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से इसकी भरपाई के लिए किसी बड़े केंद्र की तलाश थी। हरियाणा में घग्घर नदी, जिसे प्रायः लुप्त सरस्वती नदी भी कहा जाता है, के प्राचीन प्रवाह क्षेत्र के किनारों ने जवाबी कथा बुनने का उपयुक्त अवसर दे दिया। करीब 4,500 साल पहले राखीगढ़ी में रहने वाली एक महिला हड़प्पा सभ्यता की शायद पहली इंसान है, जिसके डीएनए का विश्लेषण किया गया है। लेकिन इस रहस्यमयी टीलों के शहर पर हम गौर करें, इससे पहले हम इन टीलों को ही खोलते हैं। उन्हें बारीकी से देखते हैं जहां इसका उद्भव हुआ। हड़प्पा की संस्कृति गुजरात से अफगानिस्तान तक फैली थी। यह संस्कृति नदियों के बेसिन क्षेत्र में दिल्ली से लेकर जलयानों के ‍आवाजाही वाले सिंध के तटों तक फैली थी। लेकिन हड़प्पा की पहेली को सुलझाने के लिए आवश्यक यह नेटवर्क गुत्थी को और उलझाता है।

मेहरगढ़ (ईसा पूर्व 7000-2600)

घग्घवर नदी के किनारे ‌स्थित पुरा स्थकल राखीगढ़ी हड़प्पा सभ्यता के बारे में विरोधाभासी दावे का प्रतीक बना

पाकिस्तान में बोलन दर्रे के निकट बलूचिस्तान के पर्वतीय मैदान हड़प्पा का उद्भव स्थल थे। यहां बकरियों और अन्य पशुओं को चराने वाले गांवों के छोटे केंद्र हैं। नव पाषाण युग के बाद पहली बार खेती की ओर मुड़ने के संकेत देने वाली जौ जैसी फसलों के पहली बार बोए जाने के भी चिह्न यहीं मिलते हैं। अगली कुछ सहस्‍त्राब्दियों तक सिंधु घाटी सभ्यता के विकास की अबाध यात्रा भी यहीं दिखाई दी। यह सभ्यता परिपक्व हुई और इसका शहरीकरण हुआ। मेहरगढ़ और शुरुआती खेती के दूसरे केंद्रों खासकर राखीगढ़ी के निकट भिड़ाना में खेती का स्वतंत्र और क्रमिक विकास सवाल पैदा करता है।

शहर-ए-सोख्ता, पूर्वी ईरान (ईसा पूर्व 3200-2100)

दिल्ली-मुंबई के मुकाबले मोएन-जोदाड़ो से यह स्थान ज्यादा नजदीक है। इस शहर का मोएन-जोदाड़ो से 700 साल पहले विकास हुआ। वह दुनिया के सबसे बड़े शहरों में हुआ करता था। क्या आप सोचते हैं कि हड़प्पा की संस्कृति शून्य में पैदा हो गई होगी। पर्वतीय दर्रे के बाहर एक ऐसे नियोजित शहर की कल्पना कैसे संभव है, जहां आवासीय और औद्योगिक क्षेत्र अलग हों, महत्वपूर्ण इमारतें (ऐसी ही एक इमारत में 93 कमरे), सेरेमिक सीवेज पाइपलाइन, सुनहरे धागे से सिली हुई नकली आंख की पुतली जैसी आधुनिक वस्तुए, ब्रेन सर्जरी और बैकगैमन और डाइस जैसे खेल हों। यह भी कि हेलमंड नदी, जिसके किनारे यह शहर विकसित हुआ, भी सरस्वती नदी हो सकती है।

गोनुर, तुर्कमेनिस्तान (ईसा पूर्व 2500-1700)

भव्य मौरू क्षेत्र में, जिसका जिक्र जोरोस्ट्रियन ग्रंथों में थर्ड नेशन के तौर पर मिलता है, यह बीएमएसी (बैक्ट्रिया-मार्गियाना आर्कोलॉजिकल कांप्लेक्स) की राजधानी है। यहां सातवीं सहस्त्राब्दी से अफगानिस्तान के पहाड़ों से होकर उत्तर-पश्चिम में बहने वाली मुरग्राब नदी के डेल्टा में खेती होती थी। हड़प्पा और कोंटेम-पोरेनियस (जिनके बीच स्वाभाविक व्यापार था) के साथ यह पूरी तरह समानांतर सभ्यता थी। यहां कंगूरेदार किला-शहरों का एक पूरा नेटवर्क, असाधारण प्राचीन कृतियां वह और हर चीज है, जिसे आप किसी डिस्कवरी प्रोग्राम में देखना चाहेंगे।

सिंतश्ता (2100-1800 ईसा पूर्व)

कजाकिस्तान और रूस के तेज हवाओं वाले विशाल मैदान में एक ग्रामीण संसार, खुद की शांत गतिविधियों में रमने वाला एक संसार रहा है। इसके किनारे पर अर्द्ध-घुमंतू चरवाहे, कुलीन पुरोहित और केंद्र में योद्धा रहा करते थे। उन्होंने पहिएदार रथ और गदा का आविष्कार किया था। वह ताम्र युग था। यहां घोड़ों और पशुओं की बलि दी जाती थी। ये लोग ‘एंड्रोनोवो हॉराइजन’ कहे जाने वाले एक इलाके प्राचीन यम्न के विशाल घास के मैदानों से आए थे। ये लोग हमेशा नए-नए इलाकों की तलाश में रहते थे।

ओंग (60,000 वर्ष पूर्व)

भारतीय रहस्य का सबसे गहरा हिस्सा- इस बात का भी एक रहस्यमय हिस्सा है कि हम कौन हैं। ‘ओन्ग’ या ‘अंडमानी’ दक्षिण पूर्व एशियाई हंटर-गैदरर्स के लिए प्रस्तावित संक्षिप्त रूप हो सकते हैं। दूसरा, प्राचीन दक्षिण भारतीय (एएएसआइ) है। दोनों गलत नाम हो सकते हैं। अंडमानी मूल रूप से पूर्व से लौटे हो सकते हैं और एक अखिल-उपमहाद्वीपीय लोगों को ‘दक्षिण भारतीय’ कहना अजीब है। अधिक सटीक रूप से उनके बारे में भारत के सबसे पुराने प्राचीन निवासियों के रूप में सोचें (लेखक टोनी जोसेफ उन्हें ‘पहले भारतीय’ कहते हैं), जो आधुनिक मानवों की अफ्रीकी प्रजाति थी और पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया गए लोगों से कटकर यहां बस गए। वे सभी लगभग भारतीय ही हैं। उनके आनुवंशिक छाप पठान, ‘शुद्ध आर्यन’ कलश, प्राचीन ‘वैदिक’ स्वात घाटी और यूरोप में घुमक्कड़ी करने वाले जिप्सी रोमा में भी पाए जाते हैं। हालांकि, भारत के सबसे अलग सांस्कृतिक जीन के बारे में शायद सबसे कम जाना जाता है... जिनमें संगीत, पौराणिक कथाएं, चिकित्सा, योग,  सपने, देवता शामिल हैं। (आनुवंशिक वर्णमाला के सूत्र के लिए इच्छुक लोगों के लिए, वाई-हैप्लोसमूह एच1ओ1 और एमटीडीएनए हैप्लो समूह एम 1 बहुचर्चित आर्यन आर1ए1 की तुलना में अधिक आकर्षक हैं।)

इन सबका हड़प्पा से क्या संबंध है? सामान्य तौर पर जब राखीगढ़ी की बुजुर्ग महिला के डीएनए का अध्ययन किया गया, तो आश्चर्यजनक प्रोफाइल सामने आएः मोटे तौर पर दो-तिहाई ‘ईरानी-टाइप’ (उस पर बाद में) और ‘अंडमानियों’ का एक छोटा अनुपात। इसका मिलान शहर-ए-सोख्ता और गोनुर के 11 व्यक्तियों से भी हो पाया, जो स्थानीय आबादी से 'बाहरी' थे और जिन्हें सिंधु घाटी से आया बताया जाता है। लगभग करीबी मिलानः 58-85 प्रतिशत ईरानी-प्रकार, 14-42 प्रतिशत अंडमानी। सिंतश्ता के स्टेपी डीएनए का कोई पता नहीं लगा। (कुछ लोगों ने गलती से ट्वीट किया: आर1ए1! लेकिन वह एक वाई-हैप्लो समूह है और एक महिला का वाई गुणसूत्र नहीं है।) पहचान और जातीयता की राजनीति के लिए इसका क्या मतलब है, जो आज हमें परेशान करता है?

शिंदे-राय अध्ययन पत्र के मुताबिक ईरान और यमुना के मैदान के बीच आकर फैले लोगों की पूर्वी शाखा में साइबेरियाई और अंडमानी जीन का मिश्रण है। इससे करीब ईसा पूर्व 5400 के आसपास अनोखी सभ्यता की नींव रखी गई

भारतीय-आर्य प्रश्न (या उत्तर)

वर्षों से राखीगढ़ी के प्रमुख संचालक डेक्कन कॉलेज के पुरातत्वविद् प्रोफेसर वसंत शिंदे और आनुवंशिकीविद नीरज राय 5 सितंबर को प्रेस कान्‍फ्रेंस कर कुछ घंटे पहले सेल जरनल में प्रकाशित डीएनए के निष्कर्षों का खुलासा करने वाले थे। उससे पहले सोशल मीडिया पर काफी उत्सुकता देखी गई। नरम हिंदुत्व के चेहरे तरुण विजय ने ट्वीट किया, “5 सितंबर का इंतजार करें। आर्यों के हमले के षड्यंत्रकारी सिद्धांत में आखिरी कील ठोकने की घोषणा की जा रही है...” और बाद में, जीत की भावना से लैस ट्वीट की बरसात होने लगी और सुर्खियां बनने लगींः आर्यों के आगमन संबंधी सिद्धांत खारिज!’ और भी इस तरह की सुर्खियां बनने लगीं।

भोलेपन वाले इस उत्साह की आखिर क्या वजह रही होगी? प्रोफेसर शिंदे और राय ने सार्वजनिक बयान में कहा कि वैज्ञानिक सच्चाई और लोकप्रिय दंतकथाओं के बीच एक नाजुक रेखा होती है। उन्होंने कहा: 1) गहरी मौलिकता- राखीगढ़ी डीएनए मिलान आधुनिक भारतीयों के लिए “वंश का सबसे बड़ा स्रोत” (सही)  2.) “आधुनिक समय तक कोई हल नहीं निकला “ (केवल आंशिक रूप से सही), राखीगढ़ी में “स्टेपी पशुपालकों से पता लगाने योग्य कोई वंश नहीं (सही), खेती स्थानीय स्तर पर विकसित (संभव है) और अंत में, हिंदुत्व का उद्‍घोष ‘भारतीय सिद्धांत’ की पुष्टि (अच्छा...)। इन दावों को लेकर जो भोले बनते हैं, वे  वैदिक हिंदू धर्म और सांस्कृतिक संस्कृति को मूल मानते हैं। हड़प्पा को ‘सिंधु-सरस्वती संस्कृति’ के हिस्से के रूप में फिर से स्थापित करते हैं। और, आइसलैंड तक फैले विशाल इंडो-यूरोपीय भाषाई मानचित्र के लिए भारत को एक विश्व-विजेता भाषाई जीन के स्रोत के रूप में बताते हैं।

पेपर से यह जाहिर था कि इसके निष्कर्ष दावों के मूल बिंदुओं को लेकर नाटकीय रूप से भिन्न थे। वैज्ञानिकों ने मीडिया के लिए स्वतंत्र रूप से मान्य तथ्यों, अनुमानित सुझावों और ‘भावना’ का कुछ स्वीकृत इंद्रजाल का सुरक्षित मिश्रित रूप पेश किया। (तरुण विजय सामने की बेंच पर बैठे थे) हां, राखीगढ़ी में कोई स्टेपी जीन नहीं था। तो क्या इस तरह के आनुवंशिक प्रवाह को आधी सदी बाद खारिज कर दिया जाएगा? किसी ने पिछले निष्कर्षों से इतर इस स्वाभाविक तथ्य की ओर इशारा करते हुए ट्विटर पर लिखा, जैसे “हम 13वीं सदी में दिल्ली में घूम रहे हों और यह कहें कि भारत में कभी कोई ब्रिटिश शासन नहीं था।”

उपाय: वैज्ञानिकों ने जो कहा उसे ध्यान में रखते हुए, उन्होंने कहा (असहज स्थितियों में), लेकिन उन्होंने जो कहा उसे समझने के लिए हमें पढ़ना होगा कि उन्होंने वास्तव में क्या लिखा है। आर्यों के आगमन का पर्दाफाश करने के बजाय यह पुरानी सर्वसम्मति वाले दावों से इसे निपटाने की कोशिश करता है। वास्तव में, यह एक महत्वपूर्ण कार्य है,  जिस पर काफी मेहनत से शोध किया गया है। जो वक्त के साथ विद्वतापूर्ण जिज्ञासा के बिंदु को गहराई से आगे बढ़ाता है और एक और दूसरे पक्ष की आम सहमति पर सवाल खड़ा करता है। असली सवाल ‘आर्य’ नहीं हैं। ये ’द्रविड़’- या  ‘ईरानी’ को फिर से अलग करना है।

एक और आनुवंशिक अध्ययन है, जिसका बहुत ही प्रामाणिक ढंग से अध्ययन किया गया है। इसके तहत 8,000 वर्षों से अधिक समय पहले रहने वाले 523 व्यक्तियों के डीएनए का अध्ययन किया गया। इन्हें मध्य और दक्षिण एशिया के प्रमुख स्थलों से लिया गया था। संयोग से यह अध्ययन उसी रात विज्ञान जर्नल में अपडेट और प्रकाशित हुआ था। दोनों पेपर एक-दूसरे के निष्कर्षों को काटने की जगह इतने पूरक और परस्पर आश्रित हैं कि सहयोग का सुझाव देते हैंः पहला निष्कर्ष दूसरे की कमी को बड़े करीने से भरता है। वे कौन-सा मूल विचार बनाने के लिए कहते हैं?

एक संक्षिप्त सारांश:

 

घास के मैदानों का सफर

पुराने यम्‍न के लोगों ने 5,000 साल पहले यूरेशियाई घास के मैदानों के बाहर बसना शुरू किया था। (जिस तरह से अरब 700 ईस्वी के आसपास रेगिस्तान से निकलकर स्पेन और सिंध की ओर बढ़े थे)। पहले भोजन की तलाश में ये घुमंतू जातियां पशुपालक और चरवाहे बने। वे पहले पश्चिम, फिर पूर्वी यूरोप गए। इसके कुछ शताब्दियों बाद मध्य एशियाई मैदानों की ओर आए, जिनमें अब पूर्वी यूरोपीय शिकारी जीन का एक मिश्रण मिलता है। वे आगे बढ़े तो उनमें पश्चिमी साइबेरिया के स्थानीय शिकारी जीन का मिश्रण भी हुआ, ये लोग सिंतश्ताई कहलाए और  अधिक संभावना है कि वे संस्कृत के प्रारंभिक स्वरूप जैसी कोई भाषा बोलते थे।

फिर, अंततः वे दक्षिण की ओर बढ़े। लेकिन कब? ईसा पूर्व 2300 के बीएमएसी स्‍थलों में उनका कोई आनुवंशिक निशान नहीं मिला है: वे यहां 2100 ईसा पूर्व में दिखाई देते हैं। 1800 ईसा पूर्व तक, वे स्वात की गंधार संस्कृति का हिस्सा बनते हैं। उनके निकट-प्रतिष्ठित आर1ए1 हैप्लोटाइप के निशान मिलते हैं: ज्यादातर पुरुष ही इस ओर आए थे, जबकि महिलाएं स्थानीय ही रहीं। आधुनिक समय तक, उनकी छाप पूरे मुख्य भूमि भारत में है, जिनमें चेंचू और पल्‍लार जैसे दक्षिणी आदिवासी समूह भी शामिल हैं। आर1ए1 जीन की मात्रा ब्राह्मणों में सर्वाधिक पाई जाती है, लेकिन बाकी भारतीयों में भी उसके छाप हैं। (यही कारण है कि कोई भी बंगाली अभिनेता बसंत चौधरी की तरह दिख सकता है, और अगले गेरोनिमो, या एक थेवर की तरह दिख सकता है।) मूल भारत का मूल जनक आर1ए जीन है, जिसमें स्टेपी जीन शायद बाद में जुड़ा और अब भी अस्पष्ट दिखता है।

 

ईरानी राखी?

ईसा पूर्व तीसरी सहस्राब्दी की एक भारतीय महिला में मिश्रण दिखता है। यह रहस्य उसके जीन में अंडमानी घटक से संबंधित नहीं है- जो नितांत भारतीय है, लेकिन व्यापक रूप से ईरानी घटक से संबंधित है। तो, वे कौन थे? क्या नितांत भारतीय भी? अध्ययन-पत्र हमारे पुराने सवाल की समझ कुछ स्पष्ट करता है। क्या ईरानी मूल के किसान  प्राचीन भारत में संगठित कृषि और शहरीकरण को फैलाने के लिए पूर्व की ओर बढ़े थे? यह 70 के दशक में हड़प्पा के विद्वानों की व्यापक समझ रही है, जो मेलोरी, हेमफिल वगैरह के अध्‍ययन से निकली थी (जो कपाल अध्ययन पर आधारित नवपाषाण काल के बाद मेहरगढ़ में जनसंख्या के विघटन का जिक्र करते थे)। द्रविड़ भाषाओं (प्राचीन एलामाइट के जरिए) से ईरानी लिंक की बात करना भी आम था। साथ ही, यह निष्कर्ष निकालने के लिए भी कि हड़प्पावासी द्रविड़ बोलते थे।

अब, ऐसा लगता है कि संभवतः ईरानी आबादी बड़े पैमाने पर अलग-अलग समूह में बिखरी थी। ये लोग ईरान के उपजाऊ चंद्राकार इलाके और जग्रोस पहाड़ियों से लेकर यमुना के मैदानों तक फैले हुए थे।

शिंदे-राय का शोध पेपर कहता है कि ये समूह 12,000 साल पहले एक ही माता-पिता की संतति थे: पश्चिम की ओर गए एंतोलियाई और लेवनताई लोगों से मिल गए, जबकि पूरब की ओर बढ़े लोग साइबेरियाई-मूल और अंडमानी लोगों से मिल गए। यह आखिरी मिश्रण दक्षिण एशिया के लिए अद्भुत था, जो सिंधु संस्कृतियों के परिपक्व होने से पहले और संभवतः 5400 ईसा पूर्व में हुआ।

उन्होंने खुद इस आश्चर्यजनक संस्कृति को जन्म दिया, जिसे वे अद्भुत मानते थे। यह मुमकिन है। मिश्रित विकास के तहत दो अलग-अलग संस्कृतियां स्वतंत्र रूप से एक विचार पर पहुंचती हैं, क्योंकि उनके अस्तित्व में आने का वक्त आ चुका होता है। पलायन या आगमन सांस्कृतिक प्रसार के लिए ही नहीं होता है।

और भाषा का क्या?

विज्ञान शोध पत्र कहता है कि आधुनिक द्रविड़ और उत्तर भारतीय दोनों एक ही समय में अस्तित्व में आए थे: एक, सिंधु सभ्यता के बाद लोग दक्षिण की ओर चले गए और आगे संकरित हुए। दूसरे, उनमें स्टेपी जीन का मिश्रण हुआ। इससे यह जिज्ञासा होती है कि शायद हड़प्पावासी प्राचीन द्रविड़ भाषा बोलते थे। ऐसा हो सकता है, लेकिन ठीक-ठीक पता नहीं है। यह अनुमान सिद्धांतों पर निर्भर करता है, जैसे फिनिश विद्वान एसको परपोला का सिद्धांत। इसके अलावा, क्या सिंधु सभ्यता के लोग ईरानी और अंडमानी मिश्रण वाले द्रविड़ थे ?... और इसलिए ‘द्रविड़ लोग’ क्या केवल वे ही नहीं हैं, जो आज दक्षिण में रहते हैं, बल्कि ये भारत की समूची मुख्य भूमि में फैले हुए हैं? और उनमें से किसने सबसे पहले द्रविड़ भाषा बोलनी शुरू की: ईरानी या अंडमानी? इसका भी ठीक-ठीक पता नहीं है।

लेकिन जैसे-जैसे कोहरा छंटता जा रहा है, हमें कई और चीजें पता चलने लगी हैं। भाषाविदों को हमेशा से संस्कृत के बारे में एक पहलू मालूम था। भाषाविद पैगी मोहन कहते हैं, “यह सिर्फ पुरानी इंडो-यूरोपीय भाषा ही है, जो ‘ट’ और  ‘ड’ ध्वनियों के बीच अंतर करती है। हिंदी के शब्द दांत और डांट पर विचार कीजिए।” “यहां तक कि वैदिक संस्कृत के सबसे करीबी एवेस्तान, में वह अंतर नहीं है। सबसे प्राचीन ऋग्वैदिक संस्कृत में यह नहीं था। यह मूर्धन्यीकरण मूल रूप से द्रविड़ है और बोली जाने वाली संस्कृत से ऋग्वेद में आई है। फिर सदियों बाद औपचारिक रूप से ब्राह्मण परिवारों से स्त्रोत के रूप में एकत्र किए गए थे, जिन्होंने इसे सुविधा के साथ उच्चारण करना शुरू किया था।” डेविड शुलमैन ने संस्कृत के विकास के बारे में लिखा है कि कालक्रम में द्रविड़ विशेषताओं को अपने में समाहित किया। ये बातें एक तथ्य से जुड़ती हैं कि संस्कृत बाहर से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में आई और उससे घुल-मिलकर विकसित हुई।

पैगी मोहन अब एक उत्तेजक बहस छेड़ने वाले थीसिस से संबंधित किताब को अंतिम रूप दे रहे हैं, जिसमें पंजाबी और पश्तो समेत सभी उत्तर-पश्चिमी भारतीय भाषाओं की बुनियाद द्रविड़ भाषा में है। “मूर्धन्यीकरण और क्रिया पदों की विशेषताएं संस्कृत में आई थीं। यह पाकिस्तान की सभी भाषाओं, पंजाबी, हिंदी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी और कोंकणी भाषाओं में भी पाए गए... जो हमें संस्कृत के आने से पहले उत्तर पश्चिम में बोली जाने वाली भाषाओं के बारे में बताता है।”

भारत से बाहर कुछ बिंदुओं पर गौर करें, तो सभी के लिए एक ही स्रोत है, जिसे वे हाइपरडिफ्यूजन मॉडल कहते हैं। अक्सर यह अत्यधिक आत्म-प्रेम का मामला होता है। विभिन्न बिंदुओं पर, इस तरह के दावे लैटिन अमेरिका, मिस्र, ग्रीस, मेसोपोटामिया, अफ्रीका, दक्षिण भारत, ब्राह्मण, चीन, ‘गोरों’... यहां तक कि एलियंस के आधार पर विकसित हुए। वैदिक लोग बाहर से आए इस विचार का  विरोध नया है। एक सदी पहले तिलक विद्वतापूर्वक खुशी-खुशी ‘वेदों के लिए आर्कटिक मातृभूमि’ के बारे में अनुमान लगा रहे थे।

समकालीन राजनीति ने इसे उलट दिया है- ताकि ‘मूल निवासी’ हिंदुओं को ‘आक्रांता’ मुसलमानों से अलग किया जा सके। यह इस तरह की काल्पनिक राजनैतिक सोच है कि राखीगढ़ी तो भारतीय है

और हड़प्पा पाकिस्तानी, शहर-ए-सोख्ता ईरानी और सिंतश्ता कजाख, जबकि ये सभी यूरेशियाई निरंतरता का ही स्वरूप हैं। तो, ‘आर्यों के आगमन’ का सिद्धांत खारिज हो गया? ‘क्योंकि मैं ऐसा कहता हूं।’

यह तो कोई विज्ञान नहीं हुआ, बल्कि यह तो ताकत का प्रदर्शन है। ‘तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे’ यह तो विज्ञान नहीं हुआ। यह तो बॉलीवुड का एक गीत है।

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