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अयोध्या चुनाव कांड

आम चुनाव के मद्देनजर राम मंदिर को लेकर फिर तेज हुई फिजा
फैसले का इंतजारः 1992 में बाबरी मस्जिद पर चढ़े कारसेवक

राग अयोध्या फिर सप्तम सुर और द्रुत ताल में छिड़ गया है। चुनाव सिर पर हों तो अमूमन यह आलाप छिड़ जाया करता है। लेकिन इस साल 2 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक मीडिया एजेंसी को दिए साक्षात्कार में कहा कि सरकार अयोध्या विवाद में अदालत के फैसले का इंतजार करेगी, तो कई हलकों में यह कयास लगाया जाने लगा कि सरकार इस मुद्दे को तूल नहीं देना चाहती। लेकिन 29 जनवरी को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा दी कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद 1993 में आसपास की अधिग्रहीत की गई 67 एकड़ जमीन को वापस करने की इजाजत दी जाए। इसके साथ अयोध्या राग पूरे शबाब पर आता दिखा। हालांकि इस अर्जी को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे स्वीकार करने योग्य नहीं मानते। वे कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट दो बार इनकार कर चुका है और अधिग्रहीत जमीन पर अयोध्या मामले में अंतिम फैसला आने तक रोक लगी हुई है। इसलिए सरकार ने अर्जी डालकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना की है।”

अयोध्या मामले में मुस्लिम पैरोकार, बाबरी मस्जिद ऐक्‍शन कमेटी के जफरयाब जिलानी भी कहते हैं, “गैर-विवादित भूमि लौटाने के लिए केंद्र ने जो आवेदन दिया है, वह मेंटेनेबल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट 1994 में इस्माइल फारूकी और 31 मार्च 2003 को असलम भूरे वाले, दोनों फैसले में कह चुका है कि अधिग्रहण का उद्देश्य पूरा होने पर ही कुछ किया जा सकता है। इसमें अधिग्रहण के उद्देश्य में छह चीजें (राम मंदिर, मस्जिद, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं, लाइब्रेरी, म्यूजियम और अन्य सुविधाएं) देने के बारे में कहा गया है। जब ये छह चीजें वहां पर हो जाएं, तब जो भूमि बचेगी, उसे वापस किया जा सकता है, लेकिन अभी इसमें कोई भी चीज तैयार नहीं हुई है।”

अब सवाल है कि फिर सरकार ने अदालत में ऐसी अर्जी क्यों लगाई। इसका संकेत दवे कुछ इन शब्दों में देते हैं, “जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई, उसी दिन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कह रहे थे कि अर्जी स्वीकार कर ली जाएगी। कोई मंत्री कब ऐसा कह सकता है। शायद उन्हें पता है कि अर्जी मंजूर कर ली जाएगी। इसे आप प्रधानमंत्री के 2 जनवरी के बयान से जोड़कर देखें तो काफी कुछ संकेत मिल जाता है।” 

जाहिर है, भारतीय जनता पार्टी के नेता और उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उसके तमाम अनुषांगिक संगठन पिछले साल से ही यह राग अलापने लगे थे और सुप्रीम कोर्ट तक पर दबाव बनाने जैसे बयान जारी करने लगे थे। लेकिन दिसंबर में खासकर तीन हिंदी प्रदेशों मध्य प्रदेश, राजस्‍थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा को मिली हार के बाद तो जैसे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण सबसे अहम मुद्दा बन गया। प्रयागराज में कुंभ या अर्द्ध कुंभ से लेकर टीवी चैनलों और अदालत के भीतर-बाहर हर ओर यह मुद्दा छाने लगा। वैसे, अपने पूरे कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार इस हो-हल्ले से कुछ दूरी बनाए लग रही थी, लेकिन चुनाव की घड़ी जैसे नजदीक आई तो अयोध्या फिजा को बुलंदी देने में जुट गई लगती है। यह शायद बेवजह भी नहीं है। हाल में कुंभ में आयोजित धर्म संसद में संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी साधु-संतों की नाराजगी झेलनी पड़ी। जाहिर है, यह नाराजगी आसन्न आम चुनावों की बेला में न भाजपा के लिए शुभ है, न संघ परिवार के लिए।

शायद इसका आभास संघ परिवार को पहले ही होने लगा था कि दूसरी बार संपूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद भी अगर भाजपा मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त नहीं कर पाई तो इसका संदेश सही नहीं जाएगा। तभी पिछले साल अक्टूबर में दशहरा पर आरएसएस कार्यकर्ताओं को दिए अपने वार्षिक संबोधन में मोहन भागवत ने कहा, “सरकार अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए कानून ले आए।” बाद में संघ और भाजपा नेताओं की ओर से अध्यादेश लाने तक की मांग उठने लगी। सरकार अदालत में मामले के लंबित होने के कारण अध्यादेश नहीं ला सकी। मगर, भाजपा के कार्यकर्ता इस उम्मीद में थे कि सुप्रीम कोर्ट नवंबर से रोज-ब-रोज सुनवाई करके चुनाव के पहले फैसला सुना देगी। लेकिन पहले सुनवाई जनवरी में टल गई और सुनवाई की अगली तारीख अभी तय नहीं है।

उधर, संघ परिवार और विहिप ने पहले दिसंबर में दिल्ली में और फिर प्रयाग के कुंभ में धर्म संसद आयोजित की, जिसमें मोहन भागवत समेत रामदेव ने भी शिरकत की। कुंभ की धर्म संसद में भागवत ने कहा, “मंदिर निर्माण के साथ राष्ट्र निर्माण भी करना है। हिंदुओं की अस्मिता पर लगातार चोट हो रही है।” लेकिन उनके भाषण के दौरान ही हो-हल्ला शुरू हो गया और लोग उठ कर जाने लगे। इसके विपरीत द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने अपनी धर्म संसद की और ऐलान किया कि 21 फरवरी से मंदिर निर्माण शुरू कर देंगे। इससे विवाद की नई तस्वीर सामने आ गई। हालांकि अयोध्या में इसका कोई असर नहीं दिखता। अयोध्यावासी इन सबसे बेफिक्र अपनी दिनचर्या में मशगूल हैं। उन्हें मंदिर-मस्जिद से वास्ता नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि मंदिर निर्माण पर राजनीति बंद हो। अयोध्या में इस समय सिर्फ बाहर से आने वाले श्रद्धालु और स्थानीय लोग ही हैं। संत समाज के ज्यादातर लोग प्रयागराज कुंभ में हैं। यहां हनुमान गढ़ी में अमूमन मंगलवार और शनिवार को भीड़ रहती है, लेकिन दो फरवरी को शनिवार होने के बावजूद सामान्य भीड़ थी। श्रीराम जन्म भूमि मंदिर प्रारूप (मॉडल) दर्शन स्थान पर सन्नाटा पसरा था और मंदिर निर्माण कार्यशाला स्थल पर बाहर से आने वाले चंद श्रद्धालु आ-जा रहे थे।

जन्मभूमि मंदिर प्रारूप (मॉडल) दर्शन स्थान के बाबा हजारी दास कहते हैं, “मंदिर निर्माण के लिए एक मंजिल का कार्य पूरा हुआ है। दूसरी मंजिल पर काम चल रहा है। प्रस्तावित मॉडल में दो मंजिल और 212 खंभे हैं। मंदिर की 135 फुट चौड़ाई, 270 फुट लंबाई और 125 फुट की ऊंचाई होगी। कार्य पूरा करने में दो साल लगेगा। जल्दी करने पर साल भर का वक्त लगेगा।” गुजरात के रहने वाले कारीगर रजनीकांत पांच साल से यहीं हैं। उन्होंने बताया कि पहले करीब पांच कारीगर थे। इस समय वे अकेले हैं, उनके अलावा चार-पांच मूर्तियों पर जमी काई को साफ करने के लिए सफाईकर्मी हैं। राजस्थान के सिरोही जिले से आए श्रद्धालु शंकरलाल मीणा ने कहा, “अयोध्या में जगह-जगह भगवान राम का वास है। नेता वोट के लिए राजनीति करते हैं। पत्थर काले हो गए हैं अब दोगुनी मेहनत करनी होगी।” हनुमान गढ़ी में फूल विक्रेता मनोज तो राजनैतिक गतिविधियां बढ़ने से कारोबार में नुकसान होने से चिंतित हैं।

लेकिन राजनीति का गणित तो शायद कुछ और ही है। उसे अयोध्या के लोगों की चिंता और परंपराओं तथा मर्यादाओं से सरोकार शायद थोड़ा ही है। पहली एनडीए सरकार में मंत्री रह चुके मगर भाजपा छोड़ चुके यशवंत सिन्हा कहते हैं, “जब तक विवाद का निपटारा नहीं होता, अधिग्रहीत जमीन के बारे में भी फैसला नहीं किया जा सकता। अधिग्रहीत जमीन विवादित स्‍थल के चारों ओर है इसलिए उसे वापस करने के बाद तो कोई मतलब नहीं रह जाएगा।” 

हालांकि बाबरी मस्जिद के मुद्दई मो. इकबाल अंसारी का कहना है, “हमको मस्जिद से मतलब है। बाकी जमीनें सरकार ने खरीद ली थी और उसका मुआवजा भी दे चुकी है। वह जमीन सरकार की है। सरकार जिसको भी देना चाहती है दे, जहां इस्तेमाल करना चाहती है करे। मुझे कोई एतराज नहीं है।”

मगर, मणिराम छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन कहते हैं, “मैं धर्म संसद में था। धर्म संसद में कहा गया कि राम जन्मभूमि के साथ-साथ हमें राष्ट्र का निर्माण भी करना है, राष्ट्र को देखना है। आने वाले चुनाव में राष्ट्र निर्माण के लिए हमें मैदान में भी उतरना पड़े तो हमें कोई परहेज नहीं है।”

जाहिर है, मंदिर के नाम पर चुनाव की राजनीति ही लक्ष्य है। लेकिन संविधानविद राजीव धवन कुछ अलग तरह का सवाल करते हैं। वे कहते हैं, “प्रधानमंत्री खुद को कामदार और दूसरे नेताओं को नामदार कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके वे ट्रस्ट के बेनामदार हो गए हैं।” अब देखना है कि राम इन चुनावों में कैसे काम आते हैं।

विवाद की जमीन

- 23 दिसंबर 1949 : बाबरी म‌स्जिद के मुख्य गुंबद के भीतर रात के अंधरे में  रामलला की मूर्ति रख दी गई। स्‍थानीय अदालत ने मस्जिद पर विवाद निबटने तक ताला लगाने का आदेश दिया

-1 फरवरी 1986 : फैजाबाद जिला न्यायालय ने ताला खोलने और हिंदुओं को पूजा-अर्चना करने की इजाजत दी। मुस्लिमों ने फैसले का विरोध किया और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया

-14 अगस्त 1989 : इलाहाबाद हाइकोर्ट ने विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया

-6 दिसंबर 1992 : भाजपा नेताओं की मौजूदगी में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई

-1993 : केंद्र सरकार ने एक्यूजिशन ऑफ सर्टेन एरिया एट अयोध्या एक्ट के तहत विवादित क्षेत्र के आसपास की जमीन अधिग्रहीत कर ली। इस्माइल फारूकी सहित कई लोगों ने एक्ट के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देते हुए रिट याचिका दाखिल की।

-24 अक्टूबर 1994 : इस्माइल फारूकी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि विवादित जमीन से संबंधित मामले की सुनवाई अदालत करेगी

-6 जून 1996 : राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने अर्जी दाखिल कर केंद्र सरकार से जमीन वापस मांगी

-14 अगस्त 1996 : केंद्र ने कहा कि विवादित जमीन पर हाइकोर्ट का फैसला आने के बाद ही राम जन्मभूमि ट्रस्ट की अर्जी पर विचार होगा। ट्रस्ट इलाहाबाद हाइकोर्ट चला गया और हाइकोर्ट ने 1997 में उसकी याचिका खारिज कर दी

-फरवरी 2003 : वाजपेयी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 67 एकड़ अधिग्रहीत जमीन उसके मालिकों को लौटाने की इजाजत मांगी। अदालत ने यथास्थिति बहाल रखने को कहा

-मार्च 2003 : सुप्रीम कोर्ट ने असलम भूरे केस में कहा कि 67 एकड़ अधिग्रहीत जमीन केंद्र सरकार के पास रहेगी। यथास्थिति केस के फैसले तक बरकरार रहेगी

-30 सितंबर 2010 : दो-एक के बहुमत से इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने विवादित जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बांटने का फैसला सुनाया

-9 मई 2011 : इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई

-26 फरवरी 2016 :  विवादित जमीन पर राम मंदिर निर्माण की इजाजत मांगते हुए सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की

-21 मार्च 2017 : मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने सभी पक्षों को अदालत से बाहर मामले का निपटारा करने का सुझाव दिया

-7 अगस्त 2017 : इलाहाबाद हाइकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया

-8 फरवरी 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील पर सुनवाई शुरू की

-14 मार्च 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने सभी अंतरिम याचिकाओं को खारिज कर दिया। इसमें पक्षकार के तौर पर शामिल करने की सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका भी थी

-6 अप्रैल 2018 : वकील राजीव धवन ने साल 1994 के इस्माइल फारूकी बनाम भारतीय संघ के फैसले को पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग सुप्रीम कोर्ट से की

-27 सितंबर 2018 ः सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारूकी बनाम भारतीय संघ के 1994 के फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया और कहा कि अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में दीवानी वाद का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर होगा और पूर्व का फैसला सिर्फ भूमि अधिग्रहण के केस में ही लागू होगा। 29 अक्टूबर से मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय नई पीठ का गठन किया

-अक्टूबर 2018 :  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उचित पीठ जनवरी 2019 से सुनवाई करेगी

-8 जनवरी 2019 : सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय पीठ का गठन सुनवाई के लिए किया

-10 जनवरी 2019 : सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सुनवाई की अगली तारीख 29 जनवरी मुकर्रर की

-29 जनवरी 2019 : विवादित जमीन के अतिरिक्त अधिग्रहीत की गई भूमि उसके मालिकों को लौटाने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की

साथ में दिल्ली से अजीत झा और अयोध्या से शशिकांत

 

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