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बंटवारे के खिलाफ

यह किताब उस अफसाने को रोशनी दिखाती है, जो यह मानता है कि बंटवारे के लिए देश के सभी मुसलमान दोषी रहे हैं
भारत-विभाजन विरोधी मुसलमान

आज देश में विभाजनकारी प्रवृत्तियों और कट्टरता का आलम यह है कि 16वीं लोकसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व सर्वाधिक कम स्तर पर पहुंच गया। अल्पसंख्यकों की बात करना देशद्रोही बता दिए जाने का खतरा बन जाता है। मॉब लिंचिंग को जायज ठहराया जा सकता है। मुसलमानों की देशभक्ति पर संदेह चरम पर पहुंच गया है। ऐसे दौर में प्रसिद्ध रंगकर्मी शम्सुल इस्लाम की ‘भारत विभाजन विरोधी मुसलमान’ किताब उस अफसाने को रोशनी दिखाती है, जो यह मानता है कि बंटवारे के लिए देश के सभी मुसलमान दोषी रहे हैं। इसमें इतिहास के पन्नों से देशप्रेमी मुसलमानों और संगठनों की ऐसी अनकही कहानियां हैं, जो मुस्लिम लीग के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के धुर विरोधी थे और लगातार सक्रिय थे। इनमें कई नेताओं और लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी।

ऐसी ही शख्सियत थे अल्लाह बख्‍श सुमरो जिन्होंने आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की स्‍थापना की थी और बंटवारे के विरोध में मुस्लिम लीग के खिलाफ खड़े होने की कीमत जान देकर चुकाई। 1943 में उनकी हत्या सिंध के शिकारपुर कस्बे के पास की गई और उसमें मुस्लिम लीग के तत्वों की भूमिका ठीक उसी तरह रहस्य बनी हुई है, जैसे महात्मा गांधी की हत्या में कट्टरवादी तत्वों की। आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस बंटवारे के खिलाफ किस कदर सक्रिय था, यह इससे पता चलता है कि उसने 23 मार्च 1940 को लाहौर में मुस्लिम लीग के ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ के पांच हफ्ते के भीतर ही दिल्ली में विशाल सम्मेलन बुलाकर इसका विरोध किया। दिल्ली में 27 से 30 अप्रैल तक हुए इस जलसे में हिंदुस्तान के हर हिस्से से 1400 नुमाइंदों ने हिस्सा लिया। इसमें हिस्सा लेने वाले संगठनों ऑल इंडिया जमीअत उलमा, मजलिस अहरार, शिया पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस, खुदाई खिदमतगार, बंगाल कृषक प्रजा पार्टी, अंजुमने-वतन, बलूचिस्तान, जमीअत अहले हदीस वगैरह शामिल थे। 26 अप्रैल को निकले इसके स्वागत जुलूस में हजारों की भीड़ उमड़ आई थी।

जिन्ना और मुस्लिम लीग के दो कौमों के सिद्घांत के खिलाफ बड़े नेताओं में सरहदी गांधी, मौलाना आजाद मुख्तार अहमद अंसारी, शहीद अशफाक उल्लाह खान, कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला वगैरह जैसी शख्सियतों के नाम तो कुछ परिचित हैं। लेकिन ऐसे बहुत से नाम हैं जो इतिहास के गर्दोगुबार में खो गए हैं या देश की आजादी में उनके संघर्षों को भुला दिया गया है। अब लोगों को यह भी भूलता जा रहा है कि जामिया मिल्लिया की स्‍थापना दो-मुल्कों के सिद्घांत के खिलाफ देशप्रेम का पाठ पढ़ाने के लिए हुई थी और उस दौर में लीगी नेता इसके संस्‍थापकों को हिंदुओं का पिट्ठू बताया करते थे।

यही नहीं, जमीअत उलमा-ए-हिंद जैसे संगठन और देवबंदी स्कूल भी देशप्रेमी मुसलमानों के ही संगठन हुआ करते थे। आज इन्हें संदेह की नजर से देखा जाता है। शायद ऐसे ही मुस्लिम नेताओं और संगठनों की बनिस्बत गांधी अंत तक मानते रहे कि मुस्लिम लीग को चुनौती दी जा सकती है। लेकिन किताब में ‘देशप्रेमी मुसलमान क्यों नाकाम रहे’ अध्याय में दस्तावेजों और उस दौर के घटनाक्रमों के जरिए बंटवारे की वजहों का भी खुलासा होता है। इसमें देशप्रेमी मुसलमानों के प्रति अंग्रेज शासकों की दुश्मनी, मुस्लिम लीग का आतंक, हिंदुत्व की नफरत, कांग्रेस का ढुलमुल रवैया और विश्वासघात के बारे में विस्तार से बताया गया है।

एक अध्याय में 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में हिंदुओं-मुसलमानों की अनोखी मिसाल और कुर्बानियों का भी जिक्र है। यह संघर्ष खु-ब-खुद दो-मुल्कों के सिद्घांत को चुनौती देता है। सावरकर भी 1907 में लिखी अपनी किताब ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस’ में बताया है कि हिंदू और मुसलमान भली-भांति जानते थे कि मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए दोनों को मिलकर रहना जरूरी है। किताब में ऐसे शायरों की भी नज्म और गजलें दी गई हैं जो पाकिस्तान पर गहरे सवाल खड़े करते हैं और इस सिद्घांत को ही चुनौती देते हैं कि कोई एक देश पाक कैसे हो सकता है। आज के दौर में यह जरूरी किताब है, जिससे नई पीढ़ी को सच्चाई पता चले और सच्ची देशभक्ति की भावना प्रवाहित हो। हर भारतीय को यह जरूर पढ़नी चाहिए।

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