जो छूटे परेशान समर्थक हैरान

गुवाहाटी से अनुपम बारदोलोई
कहां जाऊः असम के बारपेटा में बेकी नदी के किनारे फोन पर बात करता एक व्यक्ति
कहां जाऊः असम के बारपेटा में बेकी नदी के किनारे फोन पर बात करता एक व्यक्ति
सुरजीत शर्मा

गुवाहाटी से अनुपम बारदोलोई
अंतिम सूची से भाजपा के दावे की पोल खुली, तो वैकल्पिक विधायी उपायों की बात करने लगी

कुछ कहानियां अधूरी ही रह जाती हैं। कथानक अस्त-व्यस्त हो जाता है और अंत भटक जाता है। फिर भी उस कहानी को पढ़ना रोमांचक लगता है। असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। इसकी शुरुआत 35 साल पहले हुई थी और यह कहानी चार साल से लिखी जा रही थी। फिर भी 31 अगस्त 2019 को जब इसका अंत सामने आया तो लगा कि विवादास्पद एनआरसी के लिए यह एक नई शुरुआत है। इसके पात्र और चरित्र वही रहेंगे, लेकिन कथानक संभवतः बदल जाएगा। गुवाहाटी के एक स्कूल शिक्षक अभिजित ने आउटलुक से कहा, “मुझे पाइरेट्स ऑफ द कैरीबियन सीरीज की एक फिल्म का डायलॉग याद आता है... ‘कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है, यह बस बिजनेस है।’ एनआरसी और अवैध प्रवासियों का मुद्दा भी बिलकुल उसी तरह है। इन मुद्दों पर राजनैतिक पार्टियों, संगठनों और समूहों की बहुत सी दुकानें चलती हैं। उनके लिए शो हमेशा चलते रहना चाहिए।”

असम में यह निराशा और कटुता अभिजित की अकेली नहीं है, और इसी में पूरे मुद्दे का निचोड़ दिखता है। एनआरसी की अंतिम सूची में महज 19 लाख के आसपास लोगों के नाम नहीं हैं, यानी उन पर “बहिरागत” होने का संदेह है। सो, सूची जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर एनआरसी उन बहुतों के लिए ‘अछूत’ बन गया, जिनमें ज्यादातर आखिरी क्षण तक इसके मुख्य समर्थक थे। अचानक उन्होंने पाया कि राज्य में “अवैध प्रवासियों” की पहचान करने का तरीका काफी दोषपूर्ण था और यह तथाकथित “जनसांख्यिकी घुसपैठ” की सही तसवीर पेश नहीं करता, जो 1970 के दशक के अंत में अवैध प्रवासियों के खिलाफ आंदोलन का मूल कारण था।

इसमें कोई संदेह नहीं कि एनआरसी में संख्या ही अहम थी। यह उस वक्त भी इतना ही सही था जब पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र की कांग्रेस सरकार 1951 के सिटीजन रजिस्टर का नवीनीकरण करने पर सहमत हुई थी और 1985 के असम समझौते में यह प्रावधान किया गया। लेकिन उसके बाद केंद्र की सरकारों- जिनमें ज्यादातर कांग्रेस की थीं-ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया। भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि मुस्लिम वोट बैंक खोने के डर से कांग्रेस ने कोई कदम नहीं उठाया। दलील सीधी-सी थी कि बांग्लादेश से सटे राज्य में ज्यादातर मुस्लिम प्रवासी ही आए होंगे। इसी तर्क के साथ भाजपा सरकार ने एनआरसी को अपडेट करने का फैसला किया। लेकिन कहानी हमेशा कथानक के हिसाब से नहीं चलती, खासकर तब जब उसमें लाखों पात्र हों। पिछले साल जब एनआरसी का अंतिम ड्राफ्ट जारी किया गया तो पता चला कि उसमें 40 लाख लोगों के नाम नहीं हैं। सूची के विश्लेषण से तभी स्पष्ट हो गया था कि एनआरसी की अंतिम सूची में मुसलमानों से ज्यादा हिंदू बाहर हो सकते हैं।

इसलिए अंतिम सूची जारी होने से पहले ही भाजपा ने पूरी प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया और एनआरसी की खामियों को दूर करने के लिए वैकल्पिक विधायी उपायों की बातें करने लगी। पार्टी के विधायक दिलीप कुमार पॉल मानते हैं कि भारत में हिंदू कभी विदेशी नहीं हो सकते। आउटलुक से उन्होंने कहा, “पूरी प्रक्रिया पर करीब 1,300 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। हम दोषमुक्त और विदेशी-मुक्त एनआरसी चाहते हैं। अभी जो सूची जारी हुई है उसमें 95 से 96 फीसदी अवैध बांग्लादेशी मुसलमानों के नाम हैं। हमारा अनुमान है कि बहुत से हिंदुओं के नाम इस सूची में नहीं हैं। जो विदेशी थे वे भारतीय हो गए हैं, और जो भारतीय हैं वे विदेशी हो गए। हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे।”

लेकिन ये सब अभी अटकलें हैं। सूची से बाहर कितने लोग किस धर्म के हैं, यह जानकारी अभी सामने नहीं आई है। भाजपा का स्टैंड इसलिए चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि उसकी पहचान “पीड़ित हिंदुओं का साथ” देने वाले की रही है। इसी आधार पर नरेंद्र मोदी सरकार इस साल नागरिकता संशोधन विधेयक भी लेकर आई थी। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान था। यह बिल जनवरी में लोकसभा में तो पास हो गया था, लेकिन उसके बाद पूर्वोत्तर के राज्यों में इसके खिलाफ हिंसक विरोध शुरू हो जाने के बाद इसे राज्यसभा में पेश नहीं किया गया। कुछ संगठन इसलिए इस विधेयक का विरोध कर रहे थे क्योंकि उन्हें डर था कि उनके यहां पड़ोसी देशों के शरणार्थी भर जाएंगे। अब जब भाजपा कई विधेयकों को राज्यसभा में पारित कराने में कामयाब रही है, तो नागरिकता संशोधन विधेयक को दोबारा पेश किए जाने की संभावना बनी है। सबसे आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया असम के संगठनों की रही है। इनमें ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) भी शामिल है, जिसने 1980 के दशक में छह साल तक बहिरागत-विरोधी आंदोलन की अगुआई की थी। आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल कुमार भट्टाचार्य ने कहा, “अंतिम सूची की संख्या केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बताई जाने वाली संख्या के आसपास भी नहीं है। इसलिए हम इससे संतुष्ट नहीं हैं।” असम पब्लिक वर्क्स (एपीडब्लू) नाम के एक समूह ने 2009 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसका आग्रह था कि मतदाता सूची से विदेशियों के नाम हटा दिए जाएं। अंतिम सूची पर असंतोष व्यक्त करते हुए इसने फिर से कोर्ट जाने की बात कही है। एपीडब्लू के प्रमुख अभिजीत शर्मा ने पत्रकारों से कहा, “हम इससे कतई खुश नहीं हैं। हम इन आंकड़ों का री-वेरिफिकेशन चाहते हैं।”

जो लोग एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर रह गए हैं उनमें न तो खास गुस्सा है और न ही वे निराश हैं। 54 साल की मंजू देवी ने कहा, “हम निश्चिंत हैं कि देर-सबेर हमारा नाम सूची में आ जाएगा। सवाल यह नहीं कि यह कैसे होगा, बल्कि कब होगा। लेकिन हमें इसके लिए एक बार फिर लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा और वह बड़ा निराशाजनक है।” मंजू देवी असम के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी छबीलाल उपाध्याय की पोती हैं। गोरखा समुदाय की मंजू को कई साल पहले संदिग्ध मतदाता की सूची में डाल दिया गया था और तब से वह अपनी नागरिकता साबित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनके पति का नाम एनआरसी में है, लेकिन उनके बेटे-बेटी के नाम इस सूची में नहीं हैं। गोरखा समुदाय की शीर्ष संस्था भारतीय गोरखा परिसंघ के अनुसार करीब एक लाख गोरखा एनआरसी से बाहर हो सकते हैं।

दूसरी तरफ बदरुद्दीन अजमल का ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट एनआरसी की अंतिम सूची को सही ठहरा रहा है। एक समय यह फ्रंट एनआरसी के मुखर आलोचकों में एक था। बहरहाल, एनआरसी से बाहर 19 लाख लोगों के लिए यह एक नई कहानी, एक और लंबी यात्रा की शुरुआत है। गुवाहाटी में घरों में काम करने वाली रेखा बेगम कहती हैं, “मैंने 1951 की एनआरसी से जुड़े दादी के कागजात जमा किए। यह प्रक्रिया काफी थकाने वाली है।” 35 साल की रेखा बेगम के पति, बच्चे, भाई-बहन, माता-पिता सबके नाम एनआरसी की अंतिम सूची में हैं। सिर्फ रेखा का नाम नहीं है। वह कहती हैं, “मेरे बच्चे रो रहे हैं। उन्हें डर है कि मुझे डिटेंशन सेंटर में भेज दिया जाएगा।”

...और इसी तरह यह कहानी बिना किसी अंत के चलती रहती है।

 

आखिर कितने हैं विदेशी

- 1992 में असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने विधानसभा में कहा कि राज्य में 30 लाख विदेशी हैं। दो दिन बाद बोले कि राज्य में एक भी अवैध प्रवासी नहीं है

- 1997 में तत्कालीन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने संसद में कहा कि असम समेत पूरे भारत में एक करोड़ विदेशी रह रहे हैं

- 2004 में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि भारत में 1.2 करोड़ विदेशी हैं, इनमें 50 लाख असम में हैं

- 2016 में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने राज्यसभा में कहा कि भारत में दो करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं

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