रंग दिखा सकते हैं स्थाानीय मुद्दे

बीड़, अहमदनगर, जालना, औरंगाबाद से प्रशांत श्रीवास्तव
साधने की कोशिशः बीड़ की रैली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ पंकजा मुंडे
साधने की कोशिशः बीड़ की रैली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ पंकजा मुंडे
पीटीआइ

बीड़, अहमदनगर, जालना, औरंगाबाद से प्रशांत श्रीवास्तव
पानी का संकट और दशकों पुरानी दूसरी समस्याएं दे रहीं भाजपा-शिवसेना गठबंधन को टक्कर, लेकिन विपक्ष बिखरा-बिखरा

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के हाई-प्रोफाइल चुनावी क्षेत्रों में से एक बीड़ जिले में प्रवेश करते ही आपका सामना टूटी-फूटी सड़कों और बेतरतीब ट्रैफिक सिस्टम से होता है। छह विधानसभा क्षेत्र वाले बीड़ में भाई-बहन, चाचा-भतीजा और पारिवारिक वर्चस्व की रोचक लड़ाई है। बीड़ में हर जगह सबसे ज्यादा चर्चा परली विधानसभा क्षेत्र की है। वहां से भाजपा के कद्दावार नेता रहे गोपीनाथ मुंडे की बेटी और राज्य सरकार में मंत्री पंकजा मुंडे अपने चचेरे भाई और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के धनंजय मुंडे के सामने खड़ी हैं। लड़ाई परिवार में ही है, इसलिए पंकजा जीत के लिए सारे दांव-पेच आजमा रही हैं।

पहले तो उनके समर्थन में खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सांवर घाट इलाके में रैली की। बंजारा समुदाय के प्रभाव क्षेत्र वाले बीड़ में शाह, स्थानीय संत भगवान बाबा के जरिए लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करते नजर आए। भगवान बाबा की याद दिलाने के लिए रैली में उन्होंने गुलाबी रंग की पगड़ी पहन रखी थी। वे यही अपील करते रहे कि भगवान बाबा के आदर्शों को पहले गोपीनाथ मुंडे और अब पंकजा मुंडे आगे बढ़ा रही हैं। जाते-जाते शाह लोगों को अनुच्छेद 370 और तीन तलाक पर लिए गए फैसले की याद दिलाना नहीं भूलते हैं।

रैली में आए राकेश पाटिल कहते हैं, “पूरे जिले के लिए गोपीनाथ मुंडे ने बहुत काम किया है। ऐसे में हम पंकजा को धोखा नहीं देंगे।” विकास के नाम पर क्षेत्र अब भी पानी की समस्या से जूझ रहा है। इसकी वजह से खेती की स्थिति अच्छी नहीं है। रोजगार भी बड़ी समस्या है। लेकिन स्थानीय स्तर पर विपक्ष के पास मजबूत नेताओं की कमी भी जनता को बेचैन कर रही है। बीड़ के विट्ठल जाधव कहते हैं, “औरंगाबाद-शोलापुर चार लेन हाइवे बनने से बहुत राहत मिली है। लेकिन रोजगार की समस्या की सुनवाई कहीं नहीं है। समस्या यह है कि यहां विपक्ष का कोई मजबूत नेता नहीं है। ऐसे में हम किसे वोट दें? राकांपा और कांग्रेस वाले अपने ही लोगों के पैर खींच रहे हैं। स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली क्षीरसागर परिवार से ताल्लुक रखने वाले जयदत्त क्षीरसागर ने राकांपा का दामन छोड़कर शिवसेना का दामन थाम लिया है। इसका असर जमीनी स्तर पर भी दिखता है। राकांपा के कार्यकर्ता रह चुके बापू जाधव कहते हैं कि जमीनी स्तर पर हमारी कोई पूछ नहीं है। इसलिए हमने भी पाला बदलकर शिवसेना का दामन थाम लिया है।

गोपीनाथ मुंडे के समय से क्षेत्र की राजनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषक सी.के. पाटिल कहते हैं,  “मुंडे परिवार बंजारा जाति से आता है। धनंजय टक्कर तो देंगे, लेकिन जीतना मुश्किल होगा। पंकजा जीतीं तो मंत्री बनेंगी, धनंजय जीतकर भी नामदार (विधायक) ही बनेंगे। ऐसे में लोगों को लगता है कि वोट देने का क्या फायदा?” लेकिन धनंजय से मिलने वाली टक्कर का पंकजा को अहसास है। रायमोह क्षेत्र में शिवसेना प्रत्याशी जयदत्त क्षीरसागर के लिए चुनाव प्रचार करने आईं मुंडे अपने भाई पर हमला करने से नहीं चूंकीं। उन्होंने कहा, “मैं हैट्रिक लगाने वाली हूं। ईवीएम मशीन पर मेरे भाई का नंबर दूसरे स्थान पर आता है। वे चुनाव में भी दूसरे नंबर पर आएंगे।” धनंजय मुंडे भी परली के सुभाष चौक इलाके की सभा में कहते हैं, “मेरे खिलाफ सब इकट्ठा हो गए हैं। पूरी ताकत लगाई जा रही है, लेकिन मेरे साथी मेरी जीत की दुआएं करते हैं। सत्ताधारी मुंह के बल गिरेंगे।”

परली की तरह बीड़ विधानसभा क्षेत्र में भी क्षीरगागर परिवार की लड़ाई चर्चा में है। यहां राज्य सरकार में मंत्री और शिवसेना उम्मीदवार जयदत्त क्षीरसागर और उनके भतीजे राकांपा के संदीप क्षीरसागर में सीधी लड़ाई है। चाचा-भतीजे की लड़ाई में एआइएमआइएम के शेख शफीक के उतरने से मुस्लिम वोट बंटने का नुकसान राकांपा को उठाना पड़ सकता है। इस बार वंचित बहुजन मोर्चा का एआइएमआइएम के साथ गठबंधन नहीं होने से पार्टी ने मराठा नेता अशोक हिंगे को मैदान में उतारा है। विपक्ष के वोटों का बंटना तय है।

शिवसेना के मजबूत गढ़ अहमदनगर में 2014 में राकांपा ने सेंध लगाई थी। पार्टी को भाजपा और शिवसेना के अलग-अलग लड़ने का फायदा मिला था। इस बार भाजपा-शिवसेना साथ हैं। इस वजह से राकांपा प्रमुख शरद पवार के लिए चुनौती बड़ी है। स्थानीय निवासी सुदम देशमुख कहते हैं, “दक्षिण अहमदनगर में पानी की भारी किल्लत है। पांच साल में कुछ खास काम नहीं हुआ है। किसानों की कर्जमाफी भी दिखावा रह गई। शहर से 10 किलोमीटर की दूर इंडस्ट्रियल एरिया की ओर जाते वक्त आपको खस्ताहाल सड़कों का दीदार हो जाएगा।” उद्योगों की स्थिति पर एसोसिएशन ऑफ अहमदनगर मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज के प्रेसिडेंट राजेंद्र कटारिया कहते हैं, “इकोनॉमी की सुस्ती का असर हम पर भी हुआ है। 15-20 फीसदी नौकरियों पर संकट है। शहर में ज्यादातर कंपनियां ऑटो इंडस्ट्री से जुड़ी हैं। पिछले पांच साल में हमें उम्मीद थी कि बड़ी कंपनियां आएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन्‍फ्रास्ट्रक्चर सुधारने का काम भी उम्मीद के अनुसार नहीं हुआ है।” जिले में कुल 12 विधानसभा क्षेत्र हैं। इस बार भाजपा आठ और उसकी सहयोगी  शिवसेना चार सीटों पर चुनाव लड़ रही है। राकांपा नौ और कांग्रेस तीन सीटों पर अपनी किस्मत आजमा रही हैं। जिले की सबसे हॉट सीट कर्जत-जामखेड़ है, जहां शरद पवार के भतीजे रोहित पवार की टक्कर राज्य सरकार में मंत्री और भाजपा नेता राम शिंदे से है। कभी कांग्रेस का गढ़ रही जामखेड़ सीट पर 1995 से भाजपा का कब्जा है। दो बार से जीत रहे राम शिंदे की हैट्रिक की राह रोहित पवार ने मुश्किल कर दी है। यह बात भाजपा नेता भी मान रहे हैं। उनके अनुसार शरद पवार की वजह से रोहित कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

अहमदनगर शहर में भाजपा-शिवसेना गठबंधन का जमीनी स्तर पर तारतम्य नहीं दिख रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद के अनुसार, कार्यकर्ता शिवसेना से गठबंधन के खिलाफ थे। भाजपा के लिए पूरे राज्य में वर्चस्व बनाने का यह अच्छा मौका था। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने विधानसभा चुनावों में भी गठबंधन करवा लिया।

शिर्डी में कांग्रेस से भाजपा में शामिल होकर मंत्री बने राधाकृष्ण विखे पाटिल की टक्कर राकांपा के सुरेश थोरात से है। संगमनेर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विजय बाला साहेब थोरात के सामने शिवसेना के साहेबराव नवले हैं। छह बार विधानसभा चुनाव जीत चुके थोरात जल आंदोलन और दुग्ध सहकारी समितियों को लेकर इलाके में खासी पकड़ रखते हैं। मराठवाड़ा क्षेत्र राज्य के सबसे पिछड़े इलाकों में एक है। यहां बेरोजगारी और कृषि संकट काफी बड़ा है। लेकिन 20-25 साल पहले औरंगाबाद जिला उम्मीद की किरण जैसा था। बजाज, एलएेंडटी, वीडियोकॉन, स्कोडा जैसी कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट होने से इसकी पहचान औद्योगिक शहर के रूप में बन गई। लेकिन शहर के लोगों को चार दिन में सिर्फ एक बार पानी मिल पाता है। सड़कें भी खस्ताहाल हैं। शहर की म्युनिसिपल कॉरपोरेशन पर शिवसेना का करीब 30 साल से कब्जा है। लेकिन 2014 में तस्वीर बदल गई। एआइएमआइएम ने शिवसेना से यह सीट छीन ली है। जिले में नौ विधानसभा सीटें हैं। इनमें से तीन सीटों पर भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सीधी टक्कर एआइएमआइएम से है। हालांकि इस बार वंचित बहुजन अघाड़ी पार्टी से एआइएमआइएम का गठबंधन नहीं होने से वोट बंटने का फायदा भाजपा-शिवसेना को मिल सकता है।

ट्रैवल बिजनेस करने वाले इसाक का कहना है, “समृद्धि राजमार्ग और शोलापुर चार लेन से बिजनेस करना आसान हुआ है। लेकिन शिवसेना की हिंदूवादी राजनीति और भ्रष्ट्राचार काफी नुकसान पहुंचा रहा है। इसीलिए एआइएमआइएम के रूप में मजबूत विकल्प मिलने से एक बड़ा वोट बैंक उधर शिफ्ट हो गया है। औरंगाबाद पूर्व क्षेत्र में भाजपा के अतुल सावे की एआइएमआइएम के डॉ. गफ्फार कादिरी से टक्कर है। सावे को दो महीने पहले मंत्री बनाया गया है। उनकी सबसे बड़ी चुनौती शिवसेना कार्यकर्ताओं का समर्थन पाने की है। शिवसेना की रेणुकादास वैद्य ने पर्चा भर दिया था, पर बाद में नाम वापस ले लिया।

मराठवाड़ा जैसी स्थिति ही राज्य के दूसरे हिस्सों में भी कमोबेश है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस समय अपनी आंतरिक कलह से परेशान है। एक तरफ जहां मुंबई इकाई के पूर्व अध्यक्ष संजय निरुपम ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण भी चुनावों में ज्यादा समय अपने क्षेत्र नांदेड़ में बिता रहे हैं। उनके लिए इस बार का चुनाव प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। लोकसभा चुनावों में उन्हें अप्रत्याशित हार मिली थी। ऐसे में, इस बार वे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। नांदेड़ की तरह लातूर जिले की दो सीटें भी कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के दो बेटे अमित देशमुख और धीरज देशमुख भी चुनावी मैदान में हैं। अमित देशमुख जहां लातूर शहरी क्षेत्र से दोबारा चुनाव जीतने की कोशिश में हैं, वहीं धीरज देशमुख लातूर ग्रामीण क्षेत्र से पहली बार मैदान में हैं। दोनों सीटों पर चुनाव प्रचार के लिए उनके अभिनेता भाई रितेश देशमुख और उनकी पत्नी जेनेलिया डिसूजा भी लातूर में ही डेरा डाले हुए हैं।

कुल मिलाकर 288 विधानसभा सीट वाले महाराष्ट्र में इस बार 2014 जैसी स्थिति नहीं है। इस बार बिखरे  विपक्ष का सामाना भाजपा-शिवसेना गठबंधन से है। ऐसे में, भले ही राज्य में सूखा, बाढ़, कृषि संकट और बेरोजगारी जैसे मुद्दे आम जन के बीच लोगों की जुबान पर हैं। लेकिन 21 अक्टूबर को मतदाता दल-बदल, पारिवारिक वर्चस्व और बेहतर विकल्प की कमी के साये के बीच में ही अपने भविष्य का फैसला करने वाले हैं।

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