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16 मार्च 2026 · MAR 16 , 2026

पत्र संपादक के नाम

पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

भयावह संत्रास

2 मार्च के अंक में, ‘हक नहीं, हुक्म का इंसाफ’ जेल की अंदरूनी कहानी बयां करती है। यह लेख बुद्धिजीवियों की यातना को बहुत ही सजीव और मार्मिक ढंग से उकेरता है। आनंद तेलतुम्बडे, वरवर राव और कर्नल पुरोहित के अपराध और सजा का जो रूप सामने आ रहा है, वो हिला देने वाला है। यथास्थितिवाद का समर्थन आम आदमी की नियति है। यह संत्रास बहुत भयावह है। पूरी जिंदगी जेल में सड़ना, जमानत की लगातार कोशिश फिर बिना अपराध साबित हुए बरी हो जाना कितना त्रासद है। इससे पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है। भुक्तभोगियों की आपबीती दुखद है।

यशवन्त पाल सिंह | वाराणसी, उत्तर प्रदेश

 

कैसा न्याय

2 मार्च के अंक में, ‘हक नहीं, हुक्म का इंसाफ’, भारत की न्याय व्यवस्था का अलग ही चेहरा दिखाती है। जमानत के लिए जब बुद्धिजीवियों को इतना परेशान होना पड़ा, तो फिर आम नागरिक की क्या बिसात। पुलिस गिरफ्तार कर जेल में डाल देती है और सालोसाल आरोप साबित नहीं होते। जब आधा जीवन जेल में गुजर जाए और फिर बेकसूर साबित हों, तो जेल में गुजरे जीवन का खामियाजा कौन भरेगा? यह दुखद है कि बरसो-बरस आरोप-पत्र ही दाखिल नहीं हो पाते। यह न्याय नहीं, न्याय के नाम पर मजाक है।

रीति शाह | दिल्ली

 

विडंबना

आनंद तेलतुम्बडे वाकई बुद्धिजीवी हैं। 2 मार्च के अंक में, ‘‘जमानत थोड़ी राहत जैसी, जिंदगी तो खो गई’’ इसका सबूत है। यह आनंद ही कर सकते हैं कि जेल की यातना भरे समय को हास्य बोध के साथ याद करें। जेल के अपने अनुभव में उन्होंने, जो लिखा है, ‘‘साब ला विचारतो’’ यह वाकई जेल की दुनिया का ही नहीं बल्कि जेल से बाहर का भी सबसे शक्तिशाली मंत्र है। सारे फैसले, सभी राहतें साहबों की मुट्ठी में ही बंद है। साहबों से पूछे बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। और साहब है कि उन्हें बाहरी दुनिया से कुछ लेना-देना ही नहीं है। हर विभाग, हर मंत्रालय, हर दफ्तर की कहानी इस, ‘‘साब ला विचारतो’’ में समाई हुई है। दफ्तर सरकारी हों या निजी, कुंजी साहब के पास ही है। वह दिन पता नहीं कब आएगा, जब ये कुंजी निकलेगी और हर समस्या के ताले को खोल देगी। तब तक हमें तेलतुम्बड़े जैसे पढ़े-लिखे लोगों की भयावह दास्तान को भी हंसी-मजाक की तरह याद रखना होगा। यह विडंबना ही है कि आनंद की तमाम पढ़ाई लिखाई को हमने कैद के अकेले पलों के मजेदार वाकयों में समेट कर रख दिया है।

प्रवीणा साही|जमशेदपुर, झारखंड

 

संविधान से परे

आनंद तेलतुम्बड़े के अनुभव सुनकर दिल दहल गया। वहां के कठिन हालात के बारे में जानकर लगा कि पुलिस को इससे कोई मतलब नहीं होता कि सामने वाला कौन है। वे बस सभी को एक ही लाठी से हांकते हैं। जो पुलिस वाले जेल में आनंद तेलतुम्बड़े का अपमान कर रहे थे, उन्हें मालूम भी नहीं होगा कि वह व्यक्ति उनसे कई गुना बुद्धिमान और समाज में एक हैसियत रखने वाला है। उन्होंने खाने के बारे में लिखा है कि उसे मुश्किल से ही खाना कहा जा सकता है। बिना दरवाजे वाले बदबूदार, शौचालय के बारे में पढ़ कर मन व्यथित हो गया। साफ और दरवाजे वाले शौचालय तो हर कैदी का हक है और यह उसे मिलना ही चाहिए। यह कोई विलासिता नहीं है यह तो जरूरत है। जब वे लिखते हैं कि जेल ने उन्हें सिखाया कि गरिमा, आजादी की तरह जेल में सिर्फ संवैधानिक कल्पना के रूप में जीवित रहती है, तब यह पढ़कर निराशा नहीं हुई, बल्कि लगा हम ऐसे देश में हैं, जहां एक व्यक्ति अपने जीवन के कई साल बर्बाद कर देता है और बाद में अदालत उसी गिरफ्तारी को अवैध घोषित कर देती हैं। इससे ज्यादा हास्यास्पद कुछ नहीं हो सकता। (2 मार्च, ‘‘जमानत थोड़ी राहत जैसी, जिंदगी तो खो गई’’)

रोहन सिंह खन्ना | मुंबई, महाराष्ट्र

 

समझाइश भी हल

2 मार्च के अंक में, ‘सवाल उठाएं या चुप्पी साध लें’, डरानेवाला लेख है। सामान्य सी फेसबुक पोस्ट पर यदि किसी को जेल में रहना पड़े इससे दुखद कुछ नहीं हो सकता। फेसबुक, एक्स ऐसे मंच हैं, जिन पर लोग अपनी भावनाएं लिख सकते हैं। जब तक ये मंच नहीं थे, तब तक लोगों के पास अपनी बात पहुंचाने का जरिया ही नहीं था। यह जरूर है कि पोस्ट लिखते वक्त सावधानी रखनी चाहिए क्योंकि कई बार इनसे बेकार के विवाद खड़े हो जाते हैं। लेकिन पुलिस गिरफ्तारी से पहले यह तो देख ही सकती है कि पोस्ट किस बारे में थी, उसकी भाषा क्या थी। यदि भाषा आपत्तिजनक नहीं थी, तो समझाइश देकर भी छोड़ा जा सकता है। लेकिन जब कोई सुनने वाला ही न हो, तो शिकायत किसके पास दर्ज कराएं, यह सबसे बड़ा, मुश्किल और जरूरी सवाल है।

चंद्र भूषण दांगी | शाजापुर, मध्य प्रदेश

 

बच्चों के बारे में सोचें

2 मार्च के अंक में, ‘जाने कहां ये फिल्में गई’, सारगर्भित लेख है। यह सच है कि आजकल सिनेमा में दर्शक के रूप में बच्चे गायब हैं। ऐसी फिल्में ही नहीं बन रही हैं, जो बच्चों को सिनेमाघर तक ला सके। भाषा के स्तर पर, कहानी के स्तर पर हर जगह बच्चों के बारे में कोई नहीं सोच रहा है। मनोरंजन के दूसरे साधनों ने भी इसमें बड़ी भूमिका अदा की है। बच्चों की फिल्में बनेंगी, तो वे भी उन फिल्मों को देखने सिनेमाघर जाएंगे। पर हां इतना जरूर है कि बच्चों की फिल्में करोड़ी क्लब तक पहुंचेंगी, यह नहीं कहा जा सकता। बच्चों की फिल्मों से मोटी कमाई नहीं होगी इसलिए उनके लिए कहानी कहने को कोई तैयार नहीं है। अब ऐसे रचनात्मक लोग भी कम हो गए हैं, जो यह सोचें कि बच्चों के लिए क्या बनाया जाए और कैसे बनाया जाए। जब इस पर विचार होने लगेगा तो खुद ब खुद सिनेमा बच्चों के बारे में सोचने लगेगा।

एम.एन.जाफरी | मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल

 

दोषी हम, इल्जाम हाथियों पर

16 फरवरी के अंक में ‘अब नहीं रहे, हाथी हमारे साथी’ आलेख पढ़ा। इसमें बताया गया है कि पश्चिम बंगाल, असम, ओड़िशा, झारखंड के हाथी बाहुल्य क्षेत्रों से हाथियों ने मानव बस्तियों में घुसपैठ कर लोगों पर हमले किए जिससे कई लोग मारे गए। इस तरह की घटनाओं पर चिंता जायज है। पर देखा जाए तो इसका कारण भी मानव निर्मित ही है और हम इसके लिए शांत और संवेदनशील हाथियों को दोष दे रहे हैं। आज विकास के नाम पर जंगल काटे जा रहे हैं। सिर्फ हाथी ही नहीं बाघ, तेंदुए, शेर भी बस्तियों में घुसकर हमले कर रहे हैं। हमने अफ्रीकी से चीते मंगवा लाखों-करोड़ों खर्च कर दिए। पर हम जंगलों का दायरा बढ़ाने की जगह सीमित करते जा रहे हैं। जंगल कम होने से जानवरों के प्राकृतिक आवास, भोजन, पानी के स्रोत खत्म होते जा रहे हैं। भूख-प्यास की मार से वे मानव बस्तियों में आहार-पानी खोजते हुए दाखिल हो जाते हैं। इस समस्या से निपटने का एक ही रास्ता है, सघन जंगलों का दायरा बढ़ाकर जंगलों में मानव दखल बंद हों। जानवरों को उनकी दुनिया में जीने दिया जाए।

संजय डागा | इंदौर, मध्य प्रदेश

 

ऊंची उड़ान

16 फरवरी के अंक में, ‘संघर्ष और साहस की सफलता’ पढ़कर एहसास हुआ कि बेटियां भी किसी भी क्षेत्र में बेटों से कम नहीं हैं। बेडमिंटन स्टार साइना नेहवाल उन बेटियों के लिए मिसाल हैं, जो काबिलियत होने के बावजूद अपनों से उपेक्षा पाती हैं। इस कारण वे मनचाहा मुकाम हासिल नहीं कर पातीं। वर्तमान में होनहार बेटियों ने अपने दम और हुनर के बल पर प्रतिष्ठा हासिल की है। यह लेख पढ़ कर लगा कि बेटियों को बस उड़ने के लिए खुला आसमान देने की जरूरत है। उनके लिए ‘पराया धन’ जैसे शब्द इस्तेमाल कर हम उनकी क्षमता को कम कर देते हैं।

विमल वर्मा | पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

 

खबरनवीस

16 फरवरी के अंक में, संपादकीय, ‘खबरों की विश्वसनीयता’ ने मार्क टली को बहुत अच्छे ढंग से याद किया है। मार्क टली खबरों के लिए ही जीते थे। इसे पढ़कर वह दौर याद आ गया, जब हम उनकी खबरों का इंतजार करते थे, वे विश्वसनीयता के प्रतीक बन गए थे। वे विदेशी थे लेकिन भारत को उन्होंने बहुत अच्छे ढंग से आत्मसात कर लिया था। बीबीसी के लिए काम करते हुए उन्होंने लगभग हर विषय को गहराई से छुआ था। उनके बारे में कहा जा सकता है कि वे पत्रकारिता का चलता-फिरता स्कूल थे। आज के दौर के पत्रकारों को देख कर लगता है कि सनसनी बनाना ही उनका एकमात्र उद्देश्य रहता है, जबकि मार्क टली इससे बिलकुल उलट थे। वे किसी सनसनीखेज खबर को भी संतुलित कर देते थे।

सुनील माखीजा | फरीदाबाद, हरियाणा

 

पुरस्कृत पत्र: सच्चा अंक

2 मार्च की आवरण कथा, ‘जेल ही जीवन’ कैद से निकली हुई कहानियों का दुखद कोलाज है। कैद मुश्किल होती है यह सब जानते हैं लेकिन इस मुश्किल को जब कोई निरपराध भोगता है, तो मन ज्यादा व्यथित होता है। इस अंक में कई बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने जेल के अनुभव लिखे हैं। उन्होंने जो परेशानी झेली वह अलग बात है लेकिन उससे भी बुरा यह है कि इनमें किसी का भी दोष सिद्ध नहीं हुआ। बेगुनाह लोगों को सालोसाल जेल में रखने पर अब ठोस काम होना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि अदालतें बेगुनाह लोगों से लिखित माफी मांगें और उन्हें हर्जाने के रूप में भारी रकम चुकाएं। किसी के जीवन के कीमती साल बर्बाद करने की सजा आखिर किसे मिलेगी? संभव है, तब यह सिलसिला रुकेगा।

प्रज्ञा शर्मा|जयपुर, राजस्थान

 

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