रस्मी विरोध
अमेरिकी के फौजी हेलिकॉप्टर वेनेजुएला की राजधानी काराकस में घुसे, उनके सैनिक वहां से राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को ले आए। यह कहानी एकदम फिल्मी लगती है। राष्ट्रपति निवास में घुस कर बेडरूम में सोए मदुरो को पत्नी सहित अगवा कर न्यूयॉर्क लाना किसी के गले नहीं उतर रहा है। दुनिया हक्की-बक्की है और किसी की हिम्मत नहीं है कि ट्रम्प या अमेरिका के खिलाफ कुछ कह दे। विरोध के जो स्वर उठ भी रहे हैं, वे बस रस्मी हैं। अभी कोई भी देश अमेरिका के दबदबे को चुनौती देने की औकात नहीं रखता। चीन और रूस भी दादा बनना चाहते हैं, लेकिन अमेरिका से पंगा लेने का माद्दा अभी उनमें भी नहीं है। भारत ने तो इस मामले में चुप्पी ही साध रखी है। मदुरो को अगवा करके ट्रम्प ने जता दिया कि अमेरिका ही दुनिया का दादा है और वही राज करेगा। (‘दादागीरी के नए दायरे’, 2 फरवरी 2026)
उदयवीर सिंह | जयपुर, राजस्थान
तेल का खेल
2 फरवरी के अंक में, ‘दादागीरी के नए दायरे’ ट्रम्प की वेनेजुएला की सीधी कार्रवाई के बारे में अच्छा लेख है। ट्रम्प चाहते हैं कि तीसरा विश्वयुद्ध हो। वे दुनिया को उकसा भी रहे हैं। वे वेनेजुएला के तेल भंडार पर अपना अधिकार जताने के साथ-साथ बाकी देशों को यह भी बताना चाहते हैं कि उनके खिलाफ जाना कितना खतरनाक हो सकता है। अमेरिका पहले भी दूसरे देशों में इस तरह की दखलंदाजियां करता रहा है। लेकिन किसी देश के राष्ट्रपति को अमेरिका ले आना हद है। मदुरो को लाने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई बार तेल का जिक्र करके ट्रम्प ने इशारों-इशारों में इतना तो बता ही दिया है कि सारा खेल तेल का ही है। वेनेजुएला से तेल हथियाने के लिए अमेरिका इस हद तक चला गया है। ट्रम्प ने कहा भी है, “हमारी दिग्गज तेल कंपनियां, जो दुनिया में सबसे बड़ी हैं, वहां जाएंगी, अरबों डॉलर खर्च करेंगी, टूटे-फूटे तेल इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेंगी, और देश के लिए पैसा कमाना शुरू करेंगी। जरूरत पड़ी तो हम दूसरा और बहुत बड़ा हमला करने के लिए तैयार हैं।” इसके बाद भी दुनिया के सारे देश चुप हैं, तो इस पर क्या कहा जा सकता है।
मार्था सिल्विया | पणजी, गोवा
सिलसिलेवार कहानी
2 फरवरी के अंक में, ‘तख्तापलट और लूट की पुरानी कहानी’ अमेरिका के चौधरी बनने की पूरी कहानी को अच्छे और सिलसिलेवार ढंग से समझाती है। वेनेजुएला में चल रहा सरकार बदलने का ऑपरेशन सिर्फ तेल के लिए है। 2002 से अमेरिका इसी कोशिश में लगा हुआ है। पहले भी राष्ट्रपति शावेज को ऐसे ही सत्ता से हटाने की कोशिश की गई थी। यह अलग बात है कि तख्तापलट नाकाम रहा था और शावेज ने वापसी कर ली थी। जैसे बाकी देशों के लिए तेल जान की आफत बना हुआ है, वेनेजुएला में भी ठीक यही स्थिति है। तेल के कारण ही सद्दाम हुसैन ने भी अपनी जान गंवाई। अगर वेनेजुएला ट्रम्प को साधने में सफल न हुआ, तो उसका अंजाम पता नहीं क्या होगा।
रीति शाह | अहमदाबाद, गुजरात
अस्थिरता का दौर
2 फरवरी के अंक में, ‘चुनौती कूटनीति की’ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मदुरो पर कार्रवाई, और उनकी कारगुजारियों पर सटीक विश्लेषण है। मदुरो को अमेरिका लाने के बाद अब उनकी नजर डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर है। ईरान के साथ उनका अलग ही मसला चल रहा है। वे दुनिया के तमाम देशों को धमका रहे हैं। कोई भी देश उन्हें पसंद नहीं करता और वे सबसे बिगाड़ कर रहे हैं। ऐसे में यह आशंका मन में आना स्वाभाविक है कि यह कहीं अस्थिरता के दौर की वापसी का संकेत तो नहीं है? यह लेख ऐसे कई प्रश्नों को उठाता है। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी है कि इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। स्थितियां लगातार बिगड़ रही हैं और अमेरिका अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है।
सुनील शर्मा | बड़वाह, मध्य प्रदेश
बाजार के हवाले
अमेरिका ने जो किया, वह सब बाजार के लिए है। 2 फरवरी के अंक में, ‘चुनौती कूटनीति की’ इन सभी बातों का जिक्र करता है। अमेरिका सुपर पॉवर है और कोई देश उसे चुनौती नहीं दे पा रहा है। अमेरिका भारत को भी दबाना चाहता है लेकिन भारत तमाम विरोध के बावजूद अपने पुराने सहयोगी रूस से सस्ते दर पर तेल खरीद रहा है। ट्रम्प इस कारण पहले ही भारत पर भारी टैरिफ लगा चुके हैं लेकिन भारत फिलहाल चुप है। अगर ट्रम्प को रोका न गया, तो वे पता नहीं और क्या-क्या गड़बड़ करेंगे।
सुनीता जगदीश | जमशेदपुर, झारखंड
जान की कीमत
2 फरवरी के अंक में, ‘अफसोस बहुत, जवाबदेही कोई नहीं!’ पढ़कर बहुत दुख हुआ। सबसे स्वच्छ शहर का खिताब जीतने वाला इंदौर अपने नागरिकों को साफ पानी नहीं दे पा रहा है। इससे भी दुखद यह है कि इतनी मौतों के बाद भी सरकार के माथे पर कोई शिकन नहीं है। सरकारों को लगने लगा है कि मुआवजा बांट देना हर समस्या का हल है। मध्य प्रदेश सरकार ने भी जान की कीमत 2 लाख रुपये लगाई है। इंदौर का यह इलाका निचली बस्ती है। इस लेख में एक महिला का बयान दिमाग में बजता रहा। वे कहती हैं कि हम आंदोलन करें कि जिंदगी की लड़ाई लड़ें। दरअसल यह सिर्फ उस महिला का नहीं, हर देशवासी का दर्द है। आंदोलन करने वाले दूसरे लोग हैं। जिन लोगों को वाकई हक चाहिए, जिनके साथ अन्याय हो रहा है, उनके पास लड़ने का समय ही नहीं है। वे लोग दो जून की रोटी कमाने में ही अपनी सारी ऊर्जा लगाए दे रहे हैं। सरकार की यह जिम्मेदारी तो बनती है कि कम से कम उन्हें साफ पानी मिले, उनके आसपास गंदगी न हो। जब इंदौर का यह हाल है, तो बाकी शहरों का भगवान ही मालिक है।
नीरज प्रकाश | पटना, बिहार
दादा ट्रम्प
19 जनवरी के अंक में, ‘दहलते हुए बदली दुनिया’ आलेख समकालीन वैश्विक राजनीति की अत्यंत चिंताजनक तस्वीर सामने रखता है। आलेख में जिस स्पष्टता और तथ्यपरकता के साथ अमेरीका के राष्टपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रमक अहंकारी और एकांगी नीतियों का विश्लेषण किया गया, वह पाठकों को सोचने पर विवश करता है। ट्रम्प का व्यवहार अब केवल अमेरिका की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी विश्व व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बनता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों, संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं और वैश्विक सहमति की अवहेलना करके एकतरफा निर्णय थोपना महाशक्ति होने का नहीं, बल्कि वैश्विक अराजकता का आमंत्रण देने का संकेत है।
शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी | फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश
मिलकर हो प्रयास
19 जनवरी के अंक में ‘दोहन की कानूनी भाषा’ पर्यावरण के साथ भयंकर छेड़छाड़ के मसले पर अच्छा लेख है। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि प्रकृति की रक्षा के लिए भी कोर्ट को आगे आना पड़ता है। पहाड़, जंगल, नदियां ये तो हमारे पालनहार हैं। उन्हें बचाना हमारी खुद की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जंगल कटने पर प्राकृतिक जीवों की पूरी खाद्य शृंखला और पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा जाएगा। यह हम सभी को मालूम है, फिर भी हम जंगल काटने से बाज नहीं आ रहे हैं। अरावली को बचाना सभी का कर्तव्य है। इसके लिए जो भी प्रयास करने हों, सभी को मिलकर करना चाहिए। वरना वह दिन दूर नहीं, जब हम सब बर्बादी का शोक मनाएंगे और हमारे हाथ कुछ नहीं रहेगा। पछताने से बेहतर है कि हम आज ही अपनी और आने वाली पीढ़ी की रक्षा के लिए कदम उठाएं।
अरविन्द पुरोहित | रतलाम, मध्य प्रदेश
सराहनीय कदम
अरावली पहाड़ियों के बारे में, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से इस पहाड़ी के दोहन पर रोक लगी है। सुप्रीम का यह सराहनीय कदम है। अरावली पहाड़ियों के बहाने पर्यावरण संरक्षण पर बात होगी। यह सिर्फ राजस्थान ही नहीं, दूसरे प्रदेशों के लिए भी जरूरी पर्वत शृंखला है। इस अंक में अन्य लेख भी पढ़े। बांग्लादेश के हालात दिनोदिन खराब होते जा रहे हैं। इस पर भारत सरकार की चुप्पी खतरनाक है। केरल के पंचायत चुनाव में कांग्रेस की बढ़त दक्षिण में इस दल की मजबूत होती स्थिति को दिखाता है। बीते साल में ट्रम्प ने भारत के लिए एक जबरदस्त हंगामा खड़ा किया और इस साल भी अमेरिका का रुख क्या होगा, यह भविष्य में है। आखिर में फिर वैभव का जिक्र जिसके कवर फोटो से क्रिकेट सम्राट का भ्रम हो गया। बेशक वैभव ने अच्छा का किया है। लेकिन यह विडंबना ही है कि हमारी पीढ़ी क्रिकेट स्टारों को ही पहचानती है। (‘दोहन की कानूनी भाषा’, 19 जनवरी)
यशवन्त पाल सिंह | वाराणसी, उत्तर प्रदेश
पुरस्कृत पत्र: ताकत का प्रदर्शन
यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका किसी पराई आग में कूदा है। किसी भी देश में जाकर दादागीरी करना अमेरिकी राष्ट्रपतियों का शगल रहा है। ट्रम्प केवल उसी परंपरा का अनुसरण कर रहे हैं। दुनिया में जितनी अराजकता, अस्थिरता रहेगी, अमेरिका उतना ही फायदे में रहेगा। अमेरिका भी जानता है कि फिलहाल उसके सामने कोई नहीं है, जो उसे चुनौती दे सके। पैसे में बहुत ताकत होती है और अमेरिका के पास पैसे की कोई कमी नहीं है। इसी पैसे के बल पर अमेरिका गुंडागर्दी करता है। हर देश की अपनी मजबूरी और अपनी राजनयिक दिक्कतें हैं। कभी किसी देश के हित अड़ते हैं, तो कभी किसी देश के। इसलिए देश अमेरिका की दादागीरी के खिलाफ एकजुट नहीं हो पाते। (‘दादागीरी के नए दायरे’, 2 फरवरी 2026)
बृजेश कुमार|मथुरा, उत्तर प्रदेश