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पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

प्रेरणादायी लेख

आउटलुक की आवरण कथा, (31 अक्टूबर) में ‘गहराते अंधेरे सांध्य तारे’ बहुत अच्छी लगी। जीवन की आशा से भरा ये लेख बताता है कि उम्र कोई भी हो, यदि व्यक्ति चाहे, तो ऊर्जा और उमंग बरकरार रख सकता है। आपने जितने लोगों के परिचय कराया, उससे भी कहीं ज्यादा लोग होंगे, जो जीवन की अंतिम वेला में भी अपने काम में लगे होंगे। इस उत्साह में बस इस बात की अनदेखी नहीं होनी चाहिए कि जिन बुजुर्गों को आराम की जरूरत हो, उन्हें भी अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए काम करना पड़े। क्योंकि कई बुजुर्गों के पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि वे उम्र होने पर मेहनत का काम करना छोड़ सकें। लेकिन यह आलेख उन लोगों को तो प्रेरणा देता ही है, जो जरा-जरा सी बात पर उम्र का रोना रोते हैं।

मधुर शेल्के | नंदुरबार, महाराष्ट्र

 

समय का सदुपयोग

आजकल की दुनिया में उम्र चाहे कितनी भी हो जाए, कोई बूढ़ा होना नहीं चाहता। कहने का मतलब कम से कम उम्रदराज दिखना तो बिलकुल नहीं चाहता। इतने तरह के क्रीम, लोशन, तेल आदि मौजूद है, जो त्वचा को जवां बनाए रखते हैं। लेकिन त्वचा को जवां बनाए रखने का मतलब बुढ़ापे को रोकना कतई नहीं है। नए अंक की आवरण कथा, (31 अक्टूबर, ‘मोहल्ला अस्सी’) बुजुर्गियत के बहुत से पहलुओं पर रोशनी डालती है। संयुक्त राष्ट्र खुद चिंतित है कि इतनी बुजुर्ग जनसंख्या को कैसे मैनेज किया जाएगा। इन लोगों की सुरक्षा भी सामाजिक चिंता का विषय है। वरिष्ठ नागरिकों के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर आई कुछ रिपोर्टों में दिए गए सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2031 में 60 बरस या उससे ज्यादा उम्र के नागरिकों की संख्या मौजूदा (13.9 करोड़) से लगभग दोगुना हो जाएगी। आज 75 साल या उससे ज्यादा उम्र के नागरिकों की संख्या करीब तीन करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2022’ के अनुसार 2039 तक यह संख्या दस करोड़ हो जाएगी। जाहिर है इतनी बड़ी संख्या में लोग काम से बाहर हो जाएंगे। फिर इन्हें देखभाल की जरूरत होगी और समय काटने की परेशानी भी होगी। अब तक जो बड़ी युवा या प्रौढ़ आबादी फायदे का सौदा थी वही लोग हमारे लिए चिंता का विषय बन जाएंगे। सांख्यिकी मंत्रालय की रिपोर्ट ‘यूथ इन इंडिया 2022’ भी कहती है कि 2021 से 2036 के बीच आबादी में युवाओं के मुकाबले वृद्धों का अनुपात बढ़ता जाएगा। इसका सीधा-सा अर्थ यह बनता है कि आज जो देश जवान है, वह कल बूढ़ा होगा। हमें इसी बूढ़े होते समाज की चिंता करना है। यही लोग हैं, जिनकी देखभाल करना है और इन्हें अच्छा जीवन मुहैया कराना है। इन लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि ये लोग फोन या टीवी में अपना समय नष्ट न कर कुछ सार्थक काम करें और समय का सदुपयोग करें।

वीना अवस्थी | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 

नाम ही काफी

80 साल की उम्र में भी अमिताभ बच्चन का किसी युवा की तरह काम करना आश्चर्य में डालता है। पता नहीं उनके अंदर कौन का उर्जा का सोता बहता है, जो लगातार उन्हें काम में लगाए रखता है। वे 1969 से फिल्म उद्योग में हैं और बस बीच में कुछ ही साल ऐसे गए हैं, जब उनकी फिल्में फ्लॉप हुई हैं। आज भी वे बड़े और छोटे परदे पर लगातार सक्रिय हैं और निरंतर खुद को संवारते रहते हैं। पिछले साल आई उनकी फिल्म गुलाबो-सिताबो में तो उन्हें पहचानना मुश्किल था कि वे अमिताभ हैं। अपनी चाल-ढाल, रूप, बोलन का अंदाज सब उन्होंने फिल्म के चरित्र के अनुरूप कर लिया था। वे अपनी हर भूमिका में कुछ नया देने की कोशिश करते हैं। अक्षय, आमिर, सलमान, शाहरूख सब उनके आगे फीके दिखाई देते हैं। नए से नए और छोटे से छोटे कलाकारों के साथ वे खुशी-खुशी काम कर लेते हैं। कभी नहीं कहते कि वे फलां के साथ काम नहीं करेंगे। यही वजह है कि युवा अभिनेत्री रश्मिका मन्दाना को भी उनके साथ गुडबाय करने का मौका मिल पाया। उनके जैसा कलाकार लगातार काम कर दूसरों को भी प्रेरणा देता है। दोनों की कहानियां (31 अक्टूबर, जय-वीरू का जज्बा) हमारे अंदर भी जज्बा जगा गया।

सीमा शाक्य | बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश

 

जहां देखिए...

अमिताभ तो अब ऐसे हो गए हैं कि जहां देखे वहीं नजर आते हैं। 31 अक्टूबर का लेख, ‘जय-वीरू का जज्बा’ इन दोनों ही कलाकारों के लिए बड़े प्यार से लिखा गया है। धर्मेंद्र भले ही कम काम कर रहे हैं, लेकिन सक्रिय हैं। अमिताभ तो खैर अभी भी केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। ऐसा क्या काम है, जो वे नहीं कर रहे हैं। चर्चित टीवी कौन बनेगा करोड़पति में भी न वे थके हुए दिखते हैं, न ही उनकी आवाज में अब तक किसी तरह का कंपन आया है। इसी लेख से मालूम हुआ कि वे डिज्नी-हॉटस्टार पर शुरू हुई नई शृंखला द जर्नी ऑफ इंडिया में भी सूत्रधार बने हैं। ब्रह्मास्त्र में भी वे हाल ही में दिखे थे। विज्ञापनों के ऑफर से उनकी झोली भरी हुई है। लोकप्रिय गेम शो कौन बनेगा करोड़पति को वे कितनी अच्छी तरह संचालित करते हैं, यह किसी को बताने की जरूरत ही नहीं है। हर सीजन में प्रतिभागियों के बीच उनके प्रति दीवानगी का वही आलम रहता है। यह उनकी सफलता का ही राज है या उनके प्रति लोगों का जुड़ाव कि अमेजन के अलेक्सा के हिंदी संस्करण में भी उनकी जादुई आवाज को ही तरजीह दी। यह सच है कि उम्र के नौवें दशक में भी अमिताभ उतने ही ऊर्जावान दिखते हैं जितना वे सत्तर के दशक में मनमोहन देसाई-प्रकाश मेहरा के मल्टी-स्टारर युग में दिखते थे। अभिनय के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण को देखकर कई लोगों के साथ मशहूर स्क्रिप्ट लेखक सलीम खान भी आश्चर्य करते हैं और उन्हें सलाह देते हैं कि अमिताभ ने अपनी जिंदगी और करियर में हर मुकाम हासिल कर लिया है और उन्हें अब ब्रेक ले लेना चाहिए। लेकिन आखिर उन्हें ब्रेक क्यों ले लेना चाहिए। यदि वे काम करने में सक्षम हैं, अस्वस्थ नहीं हैं, तो उन्हें खूब काम करना चाहिए। काम ही मनुष्य को जवान बनाए रखता है। वे लगातार काम करते रहे, इसलिए आज तक युवाओं को टक्कर दे रहे हैं। उन्हें काम रोकना तो दूर अपनी रफ्तार बिलकुल धीमी नहीं करना चाहिए।

जीवन मराल | भिलाई, छत्तीसगढ़

 

हर पीढ़ी के अमिताभ

आउटलुक का 31 अक्टूबर अंक का कई मायनों में सराहनीय है। अमिताभ-धर्मेंद्र की जय-वीरू की जोड़ी हर पीढ़ी को लुभाती है। अमिताभ बच्चन अब सिर्फ अभिनेता नहीं रह गए हैं, वे जीवित किंवदंती बन गए हैं। संभवतः वह हिंदी सिनेमा उद्योग के पहले ऐसे कलाकार होंगे, जिन्हें तीसरी पीढ़ी भी चाव से देख रही है और उनकी प्रशंसक है। ‘जय-वीरू का जज्बा’ अमिताभ की पूरी फिल्मी यात्रा को विस्तार से रखती है। कई लोग अमिताभ बच्चन से उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं की वजह से खफा हो गए या उनसे दूर चले गए। लेकिन अभी भी एक बड़ा वर्ग है, जो उनका काम बड़े परदे पर देखना चाहता है। निजी जीवन में उनके किसके साथ कैसे संबंध रहे, किस राजनेता ने उन्हें क्या मदद दी या बदले में उन्होंने उसे क्या दिया यह एक अलग तरह का विषय हो सकता है। लेकिन यदि कोई ईमानदारी से स्वीकार करे, तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि आज तक उनके खिलाफ ऐसी कोई कहानी बाहर नहीं आई कि वे शूटिंग बीच में छोड़ कर चले गए, शूटिंग पर देरी से पहुंचे या उनकी वजह से किसी निर्माता को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। एक समर्पित कलाकार से यही उम्मीद की जा सकती है। कोई बड़ा विवाद भी उनके नाम नहीं है। और अभिनय में तो खैर उन्हें कोई नहीं पछाड़ सकता। हर बार उन्होंने खुद के लिए ही और बड़ी चुनौती पेश की है। हर भूमिका के पीछे उनकी मेहनत दिखाई पड़ती है। आज भी वह किसी कलाकार के आगे बीस ही बैठते हैं। यह निर्विवाद है कि वे सदी के महानायक हैं और कोई उनका मुकाम नहीं छीन सकता।

श्रीलेखा जोशी | जयपुर, राजस्थान

 

संकट बनाम संकल्प

31 अक्टूबर के अंक में, ‘जन जोड़ो, धन जोड़ो पर मन का क्या!’ कांग्रेस की दशा और दिशा को बयान करती है। केवल राहुल गांधी ही क्यों हर भारतीय जो लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहता है, उसे राहुल के साथ पैदल निकल जाना चाहिए। अभी सभी लोग सोच रहे हैं कि उन्हें करने दो जब हमारा नंबर आएगा तब हम करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। पैदल भारत जोड़ो यात्रा के सफर पर निकले राहुल को मीडिया में अपेक्षित जगह तो मिल रही है, लेकिन मीडिया बड़ी चालाकी से राहुल का कद बड़ा नहीं होने दे रहा है। वह यात्राओं की अच्छी तस्वीरें दिखाता है, लोगों के साथ उनके सौहार्दपूर्ण रिश्ते को बताता है लेकिन बीच-बीच में यह भी बता देता है कि राहुल अभी अपरिपक्व हैं। राहुल बिना लाग-लपेट के सच्चे मन से जनता से वाकिफ होते हैं। उन्हें खूब घुमा-फिरा कर पांडित्य झाड़ना नहीं आता। बस उनकी इसी सादगी को कुछ लोग ऐसे पेश करते हैं, जैसे राहुल को कुछ नहीं आता है। राहुल को बस इतना करना है कि जो भी नकारात्मकता पार्टी में फैल रही है उसे खत्म करें। गुटबाजी पर ध्यान दें और उसे खत्म करने की कोशिश करें। अभी होता यह है कि सोनिया कुछ कहती हैं और प्रियंका कुछ और करना चाहती हैं। इसी का नतीजा है कांग्रेस पार्टी और राहुल को भुगतना पड़ता है।

चंद्र प्रकाश मोलवानी | जयपुर, राजस्थान

 

मीम पर अनोखा अंक

17 अक्टूबर का मीम पर आधारित अंक पढ़ कर लगा कि एक छोटी सी कल्पना कितने लोगों के चहरे पर मुस्कराहट ले आती है। यह कल्पना ही है, जिसकी उड़ान पल भर में यहां से वहां पहुंच जाती है। एक चित्र और साथ में दो मजाकिया पंक्तियां। इस निष्ठर जीवन में और क्या चाहिए। सारी तुच्छताओं, विचारधारा, राग-द्वेष से दूर ये मीम सबके हैं, सभी को स्वीकार्य हैं। मीम हंसने-मुस्कराने का माध्यम हैं।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

वाकई रंग चोखा

मीम का रंग वाकई चोखा आता है। बिना खर्च के यह ज्यादा लोगों तक पहुंचता है और गहरा असर डालता है। 17 अक्टूबर का अंक बहुत ही जानकारी भरा था। नए विषय से इस माध्यम से वाकिफ हुए।

सीमा शर्मा | भिवानी, हरियाणा

 

पुरस्कृत पत्र: जज्बा ही तो है

80 और 87 साल के लोग जब स्क्रीन पर हो, संवाद बोल रहे हों, अपना काम अनवरत चालू रखे हुए हों, तो उनके बारे में जनता सिर्फ आश्चर्य करती है। कितना सरल है, कहना कि इन लोगों के पास सुविधाएं हैं, इसलिए इस उम्र में भी फिट हैं। लेकिन लेख (31 अक्टूबर, ‘जय-वीरू का जज्बा’) पढ़ो तो मालूम पड़ता है कि न अमिताभ होना आसान है, न धर्मेन्द्र होना। यह केवल सुविधा के बूते नहीं है कि दोनों कलाकार आज भी कैमरे या स्टेज पर आ जाते हैं। उनकी मेहनत ही बताती है कि उम्र को दोनों ने खुद पर हावी नहीं होने दिया है। ये वाकई उनका जज्बा है, जो बताता है कि जो उम्र की संख्या को दिमाग में बैठा लेते हैं, वे बूढ़े होते हैं। और जो उम्र की संख्या को भूल जाते हैं, वे अमिताभ हो जाते हैं।

शालीन भारद्वाज | कोटा, राजस्थान

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