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संपादक के नाम पत्र

पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

नई इबारत

ऋषि सुनक भारतीयों के लिए नए नायक की तरह उभरे हैं। ‘विश्व सियासी मंच पर भारतवंशी’ (8 अगस्त) रिपोर्ट अच्छी लगी। भारत में यदि सुविधाएं हों, माहौल हो तो कोई क्यों अपना वतन छोड़ेगा। लेकिन जान कर अच्छा लगता है कि भारतीय दूसरे देशों में नाम कमा रहे हैं। कहीं वे सर्वोच्च पद पर हैं, तो कहीं सर्वोच्च पद की दौड़ में हैं। जाहिर सी बात है भारतीय होशियार होते हैं। तभी तो वे किसी भी देश में जाएं वहां अपनी जगह बना लेते हैं। अगर सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो यह वाकई गर्व का पल होगा।

सत्यमित्र वशिष्ठ | अंबाला, पंजाब

 

कर्मठ भारतीय

‘विश्व सियासी मंच पर भारतवंशी’ भारतीयों की सियासी समझ को बताती है। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय कर्मठ, मेहनती और ईमानदार होते हैं। यहीं तीनों गुण उन्हें हमेशा आगे रखते हैं। लेकिन एक बात है, छोटे देशों में बने राष्ट्राध्यक्ष कई पीढ़ी पहले भारत से गिरमिटिया बन कर चले गए थे। फिर भी उनका भारत के प्रति प्रेम साफ दिखाई पड़ता है। वे लोग अपने परिवार के साथ भारत आते हैं और यहां की धरती को नमन भी करते हैं। लेकिन बड़े देशों की राजनीति में आने वाले अपने देश का नाम लेने तक से हिचकते हैं। जब कमला हैरिस उप राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रही थीं, तब उन्होंने भारतीय के बजाए अमेरिकी अश्वेत पहचान पर ज्यादा जोर दिया। क्योंकि वे जानती थीं कि उन्हें अश्वेत वोटों की जरूरत है। जबकि उनकी मां भारत की ही हैं। लगता नहीं कि सुनक भी- यदि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो, भारत को तवज्जो देंगे। फिर भी हमें तो इन सभी लोगों पर गर्व है।

रामेश्वर रावल | बुराहनपुर, मध्य प्रदेश

 लंदन में आउटलुक पत्रिका के साथ ऋषि सुनक और शरद झा

लंदन में आउटलुक पत्रिका के साथ ऋषि सुनक और शरद झा

दोषी कौन

‘छूटे वे दिन फिर छाए काले साए’ (8 अगस्त) पढ़ कर ही समझ आ जाता है कि यह राजनीति से प्रेरित मामला है। एनसीबी ड्रग्स को लेकर रिया के साथ, दीपिका पादुकोण, रकुल प्रीत सिंह, सारा अली खान और श्रद्धा कपूर से भी पूछताछ कर चुकी है। लेकिन आश्चर्य इन लोगों को बस पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया। नई सरकार आते ही एनसीबी का दावा है कि उसके पास रिया मामले में नई बातें हैं। जब नई बातें थीं ही तो एनसीबी ने पहले कुछ क्यों नहीं बताया। एनसीबी का दावा है कि रिया और उनके भाई शौविक चक्रवर्ती ने एक बार नहीं, बल्कि कई बार ड्रग्स खरीदे और सुशांत को मुहैया कराए। पहले तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि आखिर उन्हें ये ड्रग्स मिलते कहां से थे। दोनों भाई-बहन खुद कहीं से खरीदते होंगे। लेकिन जो इतने बड़े पैमाने पर ड्रग्स बेच रहा है, जाहिर सी बात है वो बड़ा आदमी होगा और वहां तक पुलिस की पहुंच नहीं होगी। रिया को खलनायक की तरह पेश किया जाता है। यह ठीक नहीं है। जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाते रिया की निजता और प्रतिष्ठा दोनों का खयाल रखा जाना चाहिए।

समता किरण | पटना, बिहार

 

सत्ता के खेल

‘छूटे वे दिन फिर छाए काले साए’ (8 अगस्त) पढ़ कर रिया चक्रवर्ती से सहानुभूति और बढ़ जाती है। यह सोच कर ही डर लगता है कि अब लोगों का भविष्य सरकार बदलने से प्रभावित होने लगा है। जांच एजेंसियां सरकारों के सामने गौण हो गई हैं। उद्धव ठाकरे की सरकार आते ही यह केस सुर्खियों से दूर हो गया। लेकिन जैसे ही भाजपा समर्थित सरकार आई ये केस फिर खुल गया। एक कलाकार के लिए इससे बड़ी परेशानी क्या हो सकती है कि वह अपना काम धाम छोड़ कर अदालत या एनसीबी के दफ्तर चक्कर ही काटता रहे। रिया पर सारी जिम्मेदारी डाल देना इसलिए भी आसान है क्योंकि वह सुपरस्टार नहीं है। वह अभी भी संघर्ष कर रही है। इस केस की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि रिया का करिअर तबाह न हो। यह बहुत जरूरी है वर्ना न्यायपालिका से लोगों का भरोसा उठ जाएगा।

गुंजन शर्मा | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

वक्त आएगा

‘एक अदद शतक की तलाश’ (8 अगस्त) कोहली की कहानी को बड़े अच्छे से बयां करती है। दरअसल हर आम व्यक्ति की परेशानी है कि वो सफल व्यक्ति को हमेशा सफल ही देखना चाहता है। यह सच है कि अभी विराट कोहली परेशानी के दौर से गुजर रहे हैं लेकिन यह तय है कि वे दोबारा अच्छा खेलेंगे और उनका वक्त आएगा। कोहली भी इंसान हैं और हर इंसान के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। उन्हें लोग दिल्ली का डाइनामाइट कहते थे इसलिए उनका प्रदर्शन देख कर निराशा ज्यादा हो रही है। वरना हर खिलाड़ी का खराब समय आया और उसने उस समय से बाहर निकल कर फिर अच्छा खेला। कोहली को थोड़ा वक्त देना होगा। वह फिर डाइनामाइट ही साबित होंगे।

विनीत सिन्हा | दिल्ली

 

धैर्य रखें

‘एक अदद शतक की तलाश’ (8 अगस्त) लेख बहुत अच्छा लगा। इसमें जरा शक नहीं कि भारतीय टीम के पूर्व कप्तान विराट कोहली के लिए पिछला लंबा समय खराब निकला है। उनके प्रशंसक उनके पुराने प्रदर्शन को देखने के लिए तरस गए हैं। लेकिन बीच-बीच में वे अच्छा खेलते रहे हैं। इससे इनकार नहीं कि 33 साल के खिलाड़ी का सभी फॉर्मेट में ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है। 102 टेस्ट और 49.53 के तगड़े औसत से 8,074 रनों का खजाना बटोरने वाले कोहली अब तक 27 सैकड़ा मार चुके हैं। कोहली ने 261 एकदिवसीय पारियों में 57.87 के मार्के के औसत से 43 शतकों के साथ 12,327 रन बटोरे हैं। सौ से बस एक कम टी-20 अंतरराष्ट्रीय में उन्होंने 3,308 रन (औसत 50.12) बनाए हैं मगर एक भी सैकड़ा नहीं जड़ पाए हैं। फिर यदि कुछ समय के लिए उनके खेल में वैसी आक्रमकता न दिखे, तो हल्ला नहीं मचना चाहिए। उन्होंने देश के लिए बहुत मेहनत की है और लगातार अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।

संजय उपाध्याय | बीकानेर, राजस्थान

 

समतावादी विचारधारा

आउटलुक के 25 जुलाई के अंक में राष्ट्रपति चुनाव पर लेख बेहतरीन, पारदर्शी, निष्पक्ष, सटीक और न्यायसंगत लगा। राजेन्द्र बाबू, राधाकृष्णन और बाद में‌ के.आर. नारायणन जी की कार्य शैली, व्यक्तिगत व्यवहार, मधुर भाषा, समतावादी विचारधारा और राष्ट्र निर्माण के विकास एवं अनुशासनात्मक कार्यवाही में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। राजेन्द्र बाबू की सादगी और काम करने का ढंग हमेशा सकारात्मक रहा। के. आर. नारायणन उच्च श्रेणी के शिक्षाविद थे और वे आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ और विदेश नीति की जटिलता भी खूब समझते थे। मौजूदा राष्ट्रपति भी यदि पारदर्शी, निष्पक्ष, न्यायप्रिय और समतावादी विचारधारा की हों, तो कहना ही क्या।

डॉ. जसवंत सिंह जनमेजय | नई दिल्ली

 

तय नतीजा

देश को पहली आदिवासी राष्ट्रपति मिलने के बारे में किसी को कोई संशय नहीं था। यहां तक कि जब उनकी उम्मीदवारी की घोषणा हुई थी, तब भी पता था कि द्रोपदी मुर्मु ही जीतेंगी। बावजूद इसके 25 जुलाई के अंक में ‘हमे चाहिए ऐसा राष्ट्रपति’ बहुत ही उम्दा लेख था। किसी उम्मीदवार की तय जीत पर भी इतना अच्छा विश्लेषण हुआ कि हर बात नई लगने लगी। लेख में शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला और गोपालकृष्ण गांधी का उम्मीदवार न बनना और बिखरे हुए विपक्ष की कहानी को बहुत अच्छे से समेटा गया है। अगर विपक्ष एकजुट रहता तो शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला या गोपालकृष्ण गांधी में से किसी एक की जीत तय हो सकती थी। इन तीनों ने उम्मीदवारी से इनकार ही इसलिए कर दिया क्योंकि वाकई जीवन में हारना कोई नहीं चाहता। तब तो बिलकुल नहीं जब हार सामने ही दिखाई दे रही हो। विपक्ष इसी तरह असहाय रहा तो भगवान जाने देश का क्या होगा।

नरेश सिरोही | जयपुर, राजस्थान

 

मिले कार्यकर्ताओं को सम्मान

‘हमे चाहिए ऐसा राष्ट्रपति’ (25 जुलाई) बहुत ही सारगर्भित लेख है। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि विपक्ष उम्मीदवार तय नहीं कर पाया या देश को पहली आदिवासी राष्ट्रपति मिली। बात उस तैयारी की है, जो विपक्ष ने की ही नहीं। अंतिम समय में यशवंत सिन्हा का नाम देने से तो अच्छा था कि विपक्ष मुर्मु को निर्विरोध चुन कर आने का मौका दे देता। इससे संदेश जाता कि हर दल को आदिवासी राष्ट्रपति स्वीकार है। भारतीय जनता पार्टी ने बहुत सोच-समझ कर अपनी समर्पित कार्यकर्ता को राष्ट्रपति बनाना तय किया है। इससे कार्यकर्ताओं में संदेश भी गया कि पार्टी में हर व्यक्ति के लिए हर तरह के दरवाजे खुले हुए हैं। यह बात अन्य पार्टियां समझ जाएं और कार्यकर्ताओं को सम्मान देने लगें, तो निश्चित तौर पर आने वाले आम चुनाव में इसका परिणाम देखने को मिलेगा।

शोभा जिझौतिया | कटनी, मध्य प्रदेश

 

सब जायज

‘दलबदल का कमल’ (25 जुलाई) मौजूदा राजनीति की विडंबना बयान करता है। आजादी के बाद से ही राष्ट्र को मजबूत करने के बजाय इसी तरह की  राजनीति होती रही है। दलबदल के लिए कोई मजबूत कानून नहीं है। मौजूदा कानून बहुत हद तक अप्रभावी हो गया है या उसके तरीके निकाल लिए गए हैं। अस्थिरता का खेल ही देश को मजबूत नहीं बनने देता। मतदाता लाचार और लोकतंत्र हाशिए पर पड़ा हुआ है। अब एक मात्र शक्तिशाली पार्टी भारतीय जनता पार्टी ही बची है। शक्ति की वजह से ही नेता इस पार्टी की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। भाजपा का क्या है, वह तो अपनी जनसंख्या बढ़ा कर खुश है। सोचना तो दूसरी पार्टियों को है।

अरविन्द पुरोहित | रतलाम, मध्यप्रदेश

 

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पुरस्कृत पत्र: भूखे भजन...

पुरानी कहावत है कि भूखे भजन नहीं हो सकता। ईश्वर को याद करने से पहले भी भेट भरा हुआ होना चाहिए। भारत में जो लोग तीन वक्त ठीक तरह से खाना खाने के काबिल होते हैं, वे भूखे की व्यथा समझ ही नहीं सकते। ऐसे में यदि कोई सरकार भूखों को भोजन उपलब्ध करा रही है, तो किसी को दिक्कत क्यों होनी चाहिए (‘रसोई राजनीति का जायका’, 8 अगस्त)। शादी या अन्य समारोह में भोजन से भरी प्लेट कूड़े में डाल देना, होटल या रेस्टोरेंट में जूठन छोड़ना शहरी जीवन में बहुत आम बात है। होना तो कायदे से यह चाहिए कि इस योजना का हर दल स्वागत करे। हर राज्य इसे अपनाए। बल्कि इससे आगे बढ़ाते हुए सार्वजनिक जीवन में जूठा न छोड़ने को आंदोलन बनाए।

कोमल भारद्वाज, हिसार, हरियाणा

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