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8 अगस्त 2022 | AUG 08 , 2022

संपादक के नाम पत्र

पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं

तो, इतने छात्र बदहाल क्यों

25 जुलाई का अंक देश के टॉप कॉलेज के नाम रहा। लेकिन ई-लर्निंग के लिए ‘बूम या बुलबुला’ शीर्षक शायद सही सवाल उठाता है। हालांकि टॉप कैंपस, टॉप कॉलेज की फेहरिस्त भ्रामक भी हो सकती है। जो टॉप हैं, उनके बारे में सब जानते हैं। ऐसी रैंकिंग निजी कॉलेजों को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं। अगर ये कॉलेज इतने ही टॉप हैं, तो हर साल इतने छात्र कैंपस से निकलकर बदहाल क्यों हैं। लाचार शिक्षण व्यवस्था, मजबूर अभिभावक और लोलुप शिक्षण संस्थान, जिनके लिए शिक्षा मात्र पैसा कमाने का साधन है। अकर्मण्य सत्ता, भ्रष्ट अधिकारी, संवेदनहीन मीडिया के चलते कॉलेज बस तमाशे की वस्तु है। कुछ ही कॉलेज होंगे, जो सार्थक होंगे। देश के करोड़ों युवाओं के लिए इससे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति नहीं हो सकती।

हरीशचंद्र पाण्डे | हल्द्वानी, उत्तराखंड

 

कैसे होगा बदलाव

25 जुलाई के नए अंक में कहा गया है कि नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद व्यापक बदलाव आएंगे। ऐसा नहीं है कि शिक्षा नीति में पहली बार बदलाव हुआ है। लेकिन यह समझना होगा कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज की पढ़ाई सिर्फ बदलावों पर नहीं चलती। यहां सिर्फ पाठ्यक्रम बदल देने से शिक्षा का स्तर ऊंचा नहीं हो जाता। दशकों पुरानी व्यवस्था में नई शिक्षा नीति कोई चमत्कार नहीं दिखा पाएगी। इसमें यह भी लिखा है कि इसके लिए सभी संबंधित पक्षों की प्रतिबद्धता चाहिए। अब प्रतिबद्धता कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे सुनिश्चित किया जा सके। कहा जा रहा है कि नई नीति विदेशी संस्थानों को भारत में कैंपस खोलने को प्रोत्साहन देगी। लेकिन सबसे पहले पता होना चाहिए कि इन कैंपस में पढ़ने का खर्च कितना आएगा। कई लोग आशान्वित हैं कि नई नीति के कारण छात्रों की संख्या और गुणवत्ता में बहुत बदलाव आएगा। लेकिन अभी इस तरह सोचना जल्दबाजी होगी। सावधानीपूर्वक प्लानिंग, निगरानी, सामूहिक अमल, समय पर फंड की उपलब्धता तथा विभिन्न चरणों की समीक्षा ऐसी बातें हैं, जिनकी प्राथमिकताएं तय करके ही लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

कनक तिवारी | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 

दूर है मंजिल

25 जुलाई के अंक में नई शिक्षा नीति के बुनियादी बदलाव पर बात की गई है। लेकिन रास्ता इतना भी आसान नहीं है। इसमें कहा गया है कि इसका प्रमुख काम स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पारंपरिक, प्रोफेशनल, टेक्निकल और वोकेशनल कोर्स को फिर से स्थापित करना है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या भारत में इन सबके लिए बुनियादी ढांचा है। सिर्फ अंग्रेजी पढ़ने और विदेश में जाने की दौड़ के कारण इस ढांचे को हम कब से तोड़ चुके हैं। कोई कितना भी कह ले कि नई शिक्षा पद्धति में कई बुनियादी बदलाव किए गए हैं, प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए विस्तृत योजना बताई गई है लेकिन सवाल वही है, यह होगा कैसे। इस प्रश्न का जवाब नई नीति बनाने वालों के पास भी नहीं है। 

संजय चौधरी | उदयपुर, राजस्थान

 

पिछड़े छात्रों पर ध्यान

भारत की शिक्षा का स्तर किसी से छुपा हुआ नहीं है। यहां कई डिग्रीधारी बेरोजगार घूम रहे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित किए बिना कोई भी नीति लाई जाए, सफल नहीं होगी। इसके लिए सही पाठ्यक्रम, अध्यापन और निरंतर एसेसमेंट जरूरी है। साथ ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों पर भी बराबर ध्यान देना होगा। शिक्षा तक पहुंच बढ़ाकर ही एक बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार किया जा सकता है। भारतीय शिक्षा ऐसी हो कि साधारण से साधारण बच्चा भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात पूरे आत्मविश्वास से रख पाए। छात्रों में आत्मविश्वास पैदा करना जरूरी है। लाखों की संख्या में हर साल भारतीय छात्र विदेशी संस्थानों में पढ़ने जाते हैं। लेकिन इन लोगों की पृष्ठभूमि और आर्थिक आधार अलग तरह के होते हैं। इसलिए जरूरी है कि सामान्य पृष्ठभूमि के छात्रों को भी पता चले कि विदेश में पढ़ाई कैसे की जा सकती है। भारत में अभी भी सिर्फ तकनीकी विषय की पढ़ाई करने वालों के लिए नौकरी के दरवाजे खुले रहते हैं। ऐसा हर विषय के साथ होना चाहिए। हर विषय के लिए बराबर मौके हों, यह हो सके तो अच्छा हो। 

जूली शर्मा | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

अजब राजनीति

महाराष्ट्र के घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय जनता पार्टी की दिलचस्पी सिर्फ सरकार बनाने में है। (25 जुलाई, ‘दलबदल का कमल’) सरकार चाहे जिसकी बने, बहुमत चाहे जिसे मिले लेकिन अंत में सत्ता भाजपा के हाथ में ही आती है। एकनाथ शिंदे की ताजपोशी से जनादेश फिर तार-तार हो गया। भाजपा के आने के बाद से दलबदल करवाकर दूसरी पार्टी की सरकार को अल्पमत में लाना सत्ता हथियाने का नया तरीका बन गया है। फिर बहुत आसानी से इसे विचारधारा की लड़ाई कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। सभी इन दावों की सच्चाई जानते हैं। ऐसे दावे न सिर्फ हास्यास्पद लगते हैं बल्कि इससे पार्टी की छवि भी धूमिल होती है। ढाई साल पहले 2019 में जब महाराष्ट्र में शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस की महा विकास अघाड़ी सरकार बनी, तभी भाजपा ने कहा था कि तीन पहिए वाली सरकार अपने ही विरोधाभासों के चलते गिर जाएगी। ऐसी घोषणाएं ही बताती हैं कि भाजपा की मंशा क्या थी। खुद शिंदे ने जाहिर कर दिया कि इससे पहले वे पांच बार भाजपा के साथ सरकार बनाने का प्रयास कर चुके थे। यह नया चलन है, जो भारत के हर राज्य में फैल गया है।

पारस उपाध्याय | रांची, झारखंड

 

लोकतंत्र का दुर्भाग्य

25 जुलाई के अंक में ‘दलबदल का कमल’ पढ़ कर बस निराश ही हुआ जा सकता है। शिवसेना हिंदुत्व का चेहरा थी, लोग उसे उसी रूप में जानते थे। फिर भी शिवसेना जीती हुई बाजी में बाहर हो गई। कुछ लोगों का आरोप है कि शिवसेना को भी परिवारवाद खा गया। हर पार्टी में असंतोष के कई कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ी विडंबना ही यह है कि ये पार्टियां लगातार ऐसे मुद्दों की अनदेखी करती रहती हैं। यही वजह है कि एक दिन जब बम फटता है, तो पार्टियां कहीं की नहीं रहती। हर पिता चाहता है कि उसका बेटा ठीक तरह से स्थापित हो जाए। लेकिन आज का राजनैतिक माहौल ऐसा नहीं रहा कि पिता नेता हो, तो जनता उसके बेटे को भी नेता स्वीकार ले। अब अलग तरह की राजनीति का माहौल हैं। उद्धव बेटे को भी बेटे आदित्य ठाकरे को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने की इतनी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए थी। अब जमीन से जुड़े नेता पल भर में जनता को अपने पक्ष में करने में सक्षम हैं। शिंदे मुख्यमंत्री बन पाए, तो इसकी वजह उनकी जमीनी ताकत रही है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। अभी भी राजनैतिक पार्टियां नहीं चेतीं, तो भाजपा हर जगह राज करेगी और लोग इसे बस कोसते रह जाएंगे।

रोहन मिस्त्री | मुंबई, महाराष्ट्र

 

कब समझेंगे

‘दलबदल का कमल’ 25 जुलाई, में शिवसेना की कमजोरियां, भाजपा की ताकत, दलबदल कानून के दुरुपयोग पर अच्छी सामग्री है। कांग्रेस के पतन के कारणों में भी हमेशा परिवारवाद और उन तक पहुंच के मुद्दे मुख्य रूप से छाए रहते हैं। यदि फिर भी उद्धव ठाकरे ने इससे सबक नहीं लिया तो उनसे ज्यादा नासमझ और कोई नहीं है। इस लेख में भी है कि उद्धव सिर्फ चुनिंदा लोगों से घिरे रहते थे। एक मुख्यमंत्री यदि यह भी नहीं सीख पाए कि उसे अपने विधायकों को किस तरह लेकर चलना है, तो शिंदे जैसे मुखर लोग उसकी गद्दी हथिया ही लेंगे। शिंदे के साथ इतने विधायकों के जाने को सिर्फ भाजपा की चाल नहीं कहा जा सकता। यदि उद्धव ये असंतोष के बीज पनपने ही न देते, तो क्या स्थिति इतनी खराब हो सकती थी। जैसा कि शिंदे ने कहा भी, “यह एक दिन का नतीजा नहीं है। मुझे लंबे समय तक दबा कर रखा गया।” यानी चिंगारी को आग लगने तक भड़कने के जिम्मेदार उद्धव खुद हैं।

प्रेरणा नायक | जबलपुर, मध्य प्रदेश

 

भाईचारे में सेंध

25 जुलाई के अंक में, ‘नफरत के शोलों को हवा’ लेख दिल दहला गया। नुपुर शर्मा ने गलत किया यह सब मान रहे हैं। हालांकि जिस टीवी डिबेट में उन्होंने गलत बात कही, उसी में पहले दूसरे पक्ष से भी तीखी टिप्पणी आई थी। बहस दोनों पक्ष से हो रही थी। बेशक, इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी किसी का गला काट दे। नुपुर शर्मा के खिलाफ केस दर्ज हो रहे हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी फटकार लगाई। उन्हें वाकई बोली पर संतुलन रखना चाहिए था। लेकिन उदयपुर की वारदात की तो जितनी निंदा की जाए कम है। कम से कम सियासी दलों को ध्यान रखना चाहिए कि देश में माहौल न बिगड़े।

रूपाली साहू | अंबिकापुर, छत्तीसगढ़

 

एकतरफा सलाह

25 जुलाई के अंक में ‘नफरत के शोलों को हवा’ लेख बहुत दबा-छुपा कर लिखा गया है। लेकन यह समझना होगा कि संतुलन का मतलब सिर्फ एक ही पक्ष को कठघरे में खड़ा करना नहीं होता। नुपुर शर्मा दोषी हैं मगर हमें हर पक्ष के कट्टरपंथियों पर नजर रखनी होगी। इस लिहाज से कोर्ट की समझाइश पर तो उंगली नहीं उठाई जा सकती। संभव है, नुपुर ने सुर्खियां बटोरने और राजनीतिक एजेंडे के लिए ऐसा किया हो। इसलिए राजनैतिक दलों और तमाम जिम्मेदार लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि देश और समाज में संतुलन कायम रहे।

सन्मति जी.सी | जयपुर, राजस्थान

 

पुरस्कृत पत्र : सरकारी संस्‍थानों की संख्या बढ़े

नया अंक (25 जुलाई) शिक्षा की पांच सितारा व्यवस्था की ओर भी इशारा करता है। संभव है, रैंकिंग से छात्रों को आखिरी फैसले लेने में मदद मिलती हो, लेकिन कोई भी छात्र सिर्फ ऐसी रैंकिंग के आधार पर ही दाखिला नहीं लेता है। देश में शीर्ष शिक्षण संस्थानों के बारे में सभी जानते हैं। उनमें दाखिले की मुश्किलें भी किसी से छुपी हुई नहीं हैं। भारत में गिने-चुने ही निजी संस्थान हैं, जिन्हें स्तरीय कहा जा सकता है। लेकिन उनकी फीस इतनी है कि हर छात्र उनमें प्रवेश नहीं ले सकता। ऐसे में सरकारी संस्थानों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है, ताकि हर तबके के छात्र पढ़ाई कर सकें। लेकिन सरकार दूसरे कामों में इतनी व्यस्त रहती है कि उसे कॉलेज या विश्वविद्यालय खोलने की फुर्सत ही नहीं है। देश में अच्छा कॉलेज बने न बने, नई और अच्छी संसद बनना ज्यादा जरूरी है।

सुगंधा त्रिपाठी, वाराणासी, उत्तर प्रदेश

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