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पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

राजनीति में सब जायज

आउटलुक 27 जून का नीतीश केंद्रित अंक उनकी राजनीतिक मंशा को स्पष्ट नहीं कर पाया। मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवाद और सबका विकास की नीति में जाति गणना का रोड़ा और भाजपा का स्पष्ट कथन कि जाति सिर्फ दो है, अमीर-गरीब और देश को इसी को पाटना है गलत कैसे है? अब वर्तमान परिस्थितियों में जन को वैचारिक रूप से राजनीतिक समर में उतरना चाहिए। देश को बांटने वाले कौन हैं? मतदाता खुद विश्लेषण करें। शिवसेना और जदयू भाजपा पर सवार बाहरी राजनीतिक परजीवी है। खैर शिव सेना ने डूब का पथ चुन लिया है। उसे अब हिंदू राष्ट्रवाद का उद्घोषक कोई नहीं कहेगा। नीतीश कुमार को बीच की नीति का नायक कहना ठीक नहीं है।

अरविंद पुरोहित | रतलाम, मध्य प्रदेश

 

तेवर कायम रहे

आउटलुक की आवरण कथा (27 जून), बीच की नीतीश नीति में बिहार की राजनीति के असली दांव-पेच समझ में आए। नीतीश ने जाति जनगणना के मुद्दे पर जो सर्वदलीय बैठक बुलाई, वह उनका साहसिक कदम है। अगर नीतीश इसी तरह आगे बढ़ते रहे, तो हो सकता है वह अकेले ही भाजपा के विजय रथ को रोकने में कामयाब हो जाएं। यह वाकई उनकी बड़ी उपलब्धि है कि अनिच्छा के बावजूद भाजपा को बैठक में शामिल होना पड़ा। प्रदेश भाजपा नेतृत्व कितना भी कहता रहे कि पार्टी सिर्फ दो ही जाति– अमीर और गरीब लेकिन सब जानते हैं कि भाजपा डरी हुई है। बहुत दिनों बाद किसी ने भाजपा को ऐसे डराया है। नीतीश और राजद प्रमुख लालू प्रसाद एक साथ आ जाएं, तो वाकई दोनों मिल कर बिहार की दशा सुधार सकते हैं। भाजपा यह कैसे भूल रही है कि बिहार में जाति समीकरण अब भी चुनावी रणनीति का अभिन्न अंग है।

संजय सूर्य | दरभंगा, बिहार

 

आत्मविश्वास कुंजी

हाल ही में आरसीपी सिंह को तीसरी बार राज्यसभा न भेज कर नीतीश ने दिखा दिया है कि वे भी कड़े फैसले ले सकते हैं। (आवरण कथा, 27 जून) 25 वर्षों से वे नीतीश के विश्वासपात्र बने रहे लेकिन जब उन्होंने देखा कि मोदी मजबूत होते जा रहे हैं, तो उनसे करीबी बढ़ाने लगे। आरसीपी सिंह को लगा होगा कि वे तो भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रह चुके हैं, सो उन्हें मात देना इतना आसान नहीं होगा। जदयू के टिकट पर राज्यसभा में जाने के बाद भी वे यदि मोदी सरकार को ही पूजेंगे, तो नीतीश उन्हें बाहर का रास्ता ही दिखाएंगे। ये नए नीतीश हैं, जिनके पास खूब आत्मविश्वास है। उन्होंने बता दिया है कि राजनीति के खेल में वे भी कम माहिर नहीं हैं।

श्रीरंग कुलकर्णी | मुंबई, महाराष्ट्र

 

जैसे को तैसा

12 वर्षों से जदयू में नीतीश के बाद राजनैतिक रूप से दूसरे नंबर पर सबसे प्रभावशाली नेता माने जाने वाले आरसीपी सिंह को जोर का झटका जोर से ही लगा है। आवरण कथा, (27 जून) में यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि मोदी सरकार में मंत्री बनने के बाद दोनों के बीच मनमुटाव हुआ कैसे। खैर, जो भी हो लेकिन नीतीश ने मोदी को कड़ा संदेश दिया है, जो जरूरी भी था, क्योंकि कोई और तो है नहीं जो मोदी को बताए कि वो क्या गलत कर रहे हैं। ममता बनर्जी हैं लेकिन वे बहुत लाउड और आक्रमक हैं। पता ही नहीं चलता कब किस बात पर उखड़ जाएं। इसलिए सभी पार्टियां उनसे दूरी बनाए रखती हैं। ममता बनर्जी के साथ काम करना आसान नहीं। ऐसे में यदि नीतीश ऐसे ही खेलते रहे, तो संयुक्त विपक्ष का वह चेहरा साबित हो सकते हैं

प्रतिभा पाल | मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

 

सही फैसला

27 मई के अंक में अपने खंड को मजबूती लेख अच्छा लगा। नीतीश ने झारखंड में जदयू के प्रदेश अध्यक्ष खीरू महतो को राज्यसभा का टिकट देकर सही फैसला लिया है। टिकट देने से पहले उन्होंने हल्ला नहीं मचाया इससे लगता है वे वाकई राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। मोदी को वास्तव में नीतीश से घबराने की जरूरत है क्योंकि नीतीश के पास राजनीति की समझ भी है और पर्याप्त अनुभव भी। खुद खीरू महतो को घोषणा के बाद राज्यसभा का टिकट मिलने की जानकारी मिली। इसी से पता चलता है कि तंत्र में पारदर्शिता है। वरना आजकल प्रत्याशी अपने टिकट का ऐलान फेसबुक या ट्विटर पर पहले कर देता है और उसकी घोषणा बाद में होती है। केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह के पर कतर कर उन्होंने भाजपा को भी कड़ा संदेश दे दिया है। झारखंड में पिछले दो विधानसभा चुनावों में जदयू का एक भी विधायक नहीं है। 2019 में अकेले 40 सीटों पर लड़ी जदयू का वोट प्रतिशत भी 2005 में 4.6 से घटकर एक प्रतिशत के अंदर ही रह गया। अब पार्टी को झारखंड में फिर से प्रतिष्ठा दिलाना खीरू महतो की जिम्मेदारी है।

संजय शर्मा | दिल्ली

 

इतनी क्या जल्दी

27 जून के अंक में, बिना जुर्म की सजा में सारा दोष समीर वानखेड़े पर जड़ कर आर्यन को एकदम बेगुनाह साबित कर देना थोड़ी जल्दबाजी होगी। क्योंकि सभी जानते हैं कि शाहरुख भी कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं हैं। उनका बेटा यदि किसी केस में फंसता है, तो उसका पूरा करिअर और जिंदगी खराब हो सकती है। हो सकता है कि समीर वानखेड़े भ्रष्टाचारी अफसर हों लेकिन आर्यन खान भी कोई दूध का धुला हुआ नहीं है। अभी तो यह मामला पूरी तरह राजनैतिक हो गया था इसलिए अलग ढंग से जांच हुई, अलग ढंग से चार्जशीट पेश की गई। लेकिन हो सकता है कुछ साल बाद इस केस की कुछ नई परते खुलें और सच्चाई सामने आए। तब तक किसी को भ्रष्टाचारी और किसी को मासूम बताना सही नहीं होगा।

कीर्ति पटेल | भावनगर, गुजरात

 

सिर्फ बात नहीं

13 जून की आवरण कथा अलग हट कर विषय पर थी। सच है कि भारत में स्त्री की संतुष्टि या वैवाहिक हिंसा के बारे में बात करना कठिन है। जो इस विषय पर खुल कर बोलते हैं, उन्हें समाज संदिग्ध नजर से देखता है। पुरुष तो इस पर बोलते ही नहीं है लेकिन अधिकांश स्त्रियां भी मौन रहती हैं। विवाह में बलात्कार पर सिर्फ बात करने से कुछ नहीं होगा। हम ऐसा नहीं कह सकते कि इस विषय पर बात शुरू होना काफी है। बात चलने पर ही यदि हम खुश रहे, तो अदालतों के लिए किसी फैसले पर पहुंचना आसान नहीं होगा।

सुनयना चतुर्वेदी | इलाहबाद, उत्तर प्रदेश

 

नैतिकता से आगे

13 जून के अंक में ‘स्त्री के कंधो पर ही नैतिकता की जिम्मेदारी क्यों’ मन को छू गया। वाकई भारत में स्त्रियों को अपनी मर्जी से कुछ भी करने की इजाजत नहीं है। अभी भी देहात-कस्बों में स्त्रियां सामान्य मनुष्य में नहीं गिनी जाती हैं। यह बहुत दुखद है लेकिन सच है। आखिर स्त्रियों को अधिकार कैसे मिल सकता है यह सोचने का विषय है। मना करने का अधिकार केवल सेक्स में ही क्यों, हर बात में मिलना चाहिए। कुछ लोगों का तर्क है कि पुरुषों पर भी दबाव रहता है और वे भी कई बार स्त्री से सामंजस्य बैठाते हैं। इस तथ्य में कोई त्रुटि नहीं। लेकिन जब स्त्री के मुकाबले पुरुषों के सामंजस्य के आंकड़े आएंगे, तो वे स्त्रियों के आगे कहीं नहीं ठहरेंगे। कहने का मतलब यह कि हो सकता है कुछ पुरुष ऐसा करते हों, पर बहुसंख्यक स्त्रियां आज भी अपनी छोटी से छोटी इच्छा पूरी करने के लिए भी घर के पुरुषों पर ही आश्रित रहती हैं। यह सिर्फ गांव-देहात की नहीं, शहरी महिलाओं की भी विडंबना है। बिना सहमति के उसके शरीर को हाथ लगाने के बारे में तो वह बेचारी अभी सोच भी नहीं पा रही है क्योंकि यदि उसे बाजार भी जाना होता है, तो पिता, भाई या पति से आज्ञा लेना ही पड़ती है। शहर में कामकाजी महिलाओं के साथ भी घरेलू हिंसा होती है मगर वे समाज के डर से चुप्पी साध लेती हैं। हर रोज भयावह हिंसा की शिकार होती स्त्री के पास जब कानून की लाठी रहेगी, तो वो बिगड़े मर्दों को बेहतर ढंग से काबू में रख पाएगी।

श्रेया वीरवानी | जयपुर, राजस्थान

 

सदाबहार विवाद

13 जून के अंक में ‘पुराने विवाद पर नई सियासत’ देश की बदहाल स्थिति को दिखाता है। वैसे देखा जाए, तो इस पर हो रही सियासत नई नहीं है। बस इसकी पैकेजिंग बदल गई है क्योंकि इस विवाद को हवा देने वालों के हाथ में सत्ता है। ये लोग चाहेंगे, तो हर इमारत को खुदवा कर मंदिर निकाल लेंगे। वह दिन दूर नहीं जब अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद पर फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट में भी कोई मंदिर होने की बात बता दे। 1947 में देश की आजादी के पहले के पूजा-स्थलों और ऐतिहासिक स्मारकों पर पहले ही फैसला दिया जा चुका है लेकिन अब ये लोग ज्ञानवापी पर अड़ गए हैं। पता नहीं ये लोग कौन सी इतिहास की पुस्तकें पढ़ते हैं, जिनमें इतनी गलतियां है कि इन्हें लगातार सुधारने की मशक्कत करनी पड़ रही है। संविधान को तो ये लोग एक किताब भर समझते हैं। 2014 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तब कहा जा रहा था कि मोदी अब चुनाव नहीं होने देंगे और डिक्टेटरशिप से ही देश चलाएंगे। लेकिन मोदी इन सब कयास लगाने वालों से सयाने निकले। वे चुनाव भी कराते हैं और डिक्टेटरशिप भी रखते हैं। महंगाई, बेरोजगारी पर बात करते नहीं और मस्जिदों से बस मंदिरों को निकाला करते हैं। उन्होंने पिछले आठ साल में जनता को इन मुद्दों में ऐसा उलझा कर रखा है कि जिसे देखो वह पुरातत्ववेत्ता बना मंदिर खोज रहा है।

समर्थ कुलकर्णी | औरंगाबाद, महाराष्ट्र

 

बदलती सियासत

13 जून के अंक में ‘पुराने विवाद पर नई सियासत’ पढ़ा। यह बहुत ही चिंताजनक है कि देश के सामने भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई जैसे दूसरे गंभीर मुद्दे होने के बावजूद इतिहास को आधार बना कर देश की जनता को आपस में लड़वाया जा रहा है। राजनीति में सब जायज है कहने वाले नहीं जानते कि दो कौम के बीच जहर घोल कर वे देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। माहौल खराब करने वालों को सोचना चाहिए कि कल के भारत की तस्वीर उनके लिए भी परेशानी का सबब बनेगी। 2014 के बाद से नए भारत का दावा हो रहा है। लेकिन किसी भी भारतवासी ने ऐसे नए भारत का सपना तो नहीं देखा है। यह समझना होगा कि केवल मन की बात करने से बात मन की नहीं होती। बल्कि मन की सुनना भी पड़ती है। ये देश का माहौल बदलने के लिए सम्मिलित प्रयासों की जरूरत है। क्योंकि ये जो हो रहा है, यह न देशहित में है न समाज हित में। मंदिर या मस्जिद न भी हो तो देश चल सकता है लेकिन सभी को भरपेट अन्न और शिक्षा जरूर मिलना चाहिए।

अनंत बोरसे | ठाणे, महाराष्ट्र

 

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पुरस्कृत पत्र: वफादारी का इनाम

यह पढ़ कर अच्छा लगा कि नीतीश ने इस बार ऐसे व्यक्ति को राज्यसभा भेजा, जिन्होंने कभी पाला नहीं बदला। झारखंड में कुर्मियों का समर्थन वापस पाने की कोशिश उतना बड़ा मकसद नहीं है, जितना ऐसे व्यक्ति को मान देना जिसने उसका साथ कभी न छोड़ा हो। राजनीति में ऐसा कम ही देखने को मिलता है। यानी पहले तो व्यक्ति हमेशा साथ नहीं रहता, दूसरा यदि कोई साथ रह भी जाए, तो राजनीति में उस पर ध्यान दिया जाए यह जरूरी नहीं। आजकल जिसे देखो वह भाजपा की ओर चला जा रहा है। ऐसे में खीरू महतो वाकई अपवाद हैं और तारीफ के पात्र भी। नीतीश भी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस दौर की खराब राजनीति में यह संदेश दिया कि पार्टी सभी का ध्यान रखती है।

शीतल बजाज | उज्जैन, मध्य प्रदेश

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