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27 जून 2022 | JUN 27 , 2022

पत्र संपादक के नाम

पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

जटिल संबंध

13 जून की आवरण कथा में स्त्री मन के लगभग हर पहलू पर गौर किया गया है। हर लेख उम्दा है और सहज-सरल तरीके से पाठको से संवाद स्थापित करता है। लेकिन मूल प्रश्न तो वही है जिस पर हल्की सी रोशनी, ‘न हर पुरुष दुष्ट न हर महिला भोली’ में डाली गई है। ‘कानून के तर्क वितर्क’ लेख में पुरुषों के लिए वैवाहिक बलात्कार कानून के खतरों पर बात की गई है। विवाह संबंध इतना जटिल है कि इसे किसी कानून के दायरे में बांधना असंभव है। इस संबंध को पति-पत्नी ही समझ सकते हैं। बेहतर हो कि अदालतें इस तरह के संबंधों को उन दोनों के ऊपर ही छोड़ दे।

रतीश कुमावत | महू, मध्य प्रदेश

 

लांछित संस्कार

विवाह बहुत करीबी और निजता से भरा रिश्ता है। अगर इसमें भी बलात्कार जैसे पाश्विक कृत्य की जगह हो, तो यह सामाजिक संस्कार को लांछित ही करता है। आउटलुक के 13 जून के अंक में, ‘देह का हक’ में उन तमाम बातों को शामिल किया गया है, जिन पर बात नहीं होती। अगर किसी संबंध को न्यायालय की धाराओं के हिसाब से ही चलना पड़े, तो बेहतर है कि वह संबंध खत्म कर दिया जाए। सामाजिक और लैंगिक दोनों ही रूप में आचरण ऐसा होना चाहिए कि किसी को कष्ट न पहुंचे। यही विशिष्टता हमें पाश्विकता से अलग करती है। भारतीय समाज में विवाह जन्म-जन्म के साथ का संकल्प है। इसमें परस्पर इच्छा-अनिच्छा का खयाल, संतुष्टि, विवेक और धैर्य का ख्याल न हो, तो ऐसा विवाह किस काम का रहेगा। सभ्य समाज में वैवाहिक बलात्कार की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी स्त्री ने अविवेक में या गुस्से में अपने पति पर दोष लगा दिया, तो इसे कैसे साबित किया जाएगा, यह कानून बनाने से पहले ध्यान रखना चाहिए। परस्पर समर्पण के बीच के झगड़े को दो ही लोग सुलझा सकते हैं। स्त्री की अस्मिता का खयाल रखा जाए लेकिन इसका दुरपयोग न हो यह सुनिश्चित हो।

अरविन्द पुरोहित | रतलाम, मध्यप्रदेश

 

दुर्लभ सोच पर बात

13 जून का अंक, ‘स्त्री तन के सवाल’ बहुत से सवालों की श्रृंखला है। भारतीय समाज में विवाह में बलात्कार हो सकता है यह सोचना ही दुर्लभ है। यदि कानून बन भी जाए, तो कितनी स्त्रियां होंगी, जो परिवार के खिलाफ जाकर अपने पति के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलेंगी। यहां सवाल सिर्फ पति का नहीं, बल्कि उस ‘परमेश्वर’ है जो उसकी इच्छा या कभी-कभी अनिच्छा पर भी उसके जीवन में आ ही जाता है। अगर लड़कियां माता-पिता की मर्जी से शादी करें, तो उन पर घर की इज्जत की खातिर शादी को बनाए रखने का दबाव होता है, अगर पसंद से शादी करें, तो ‘विद्रोह’ की कीमत वे चुप रहकर चुकाती हैं ताकि कोई यह न कहे कि पसंद से की गई शादियां चलती नहीं हैं। यानी स्त्री के लिए तो एक तरह कुआं है और दूसरी तरफ खाई। अगर इसके लिए कोई कानून लाया भी जाता है, तो यह तय है कि जिन्हें वाकई न्याय चाहिए वे इससे वंचित ही रहेंगी। लेकिन फिर भी कुछ प्रतिशत पुरुष तो हैं, जो कानून के डंडे से डरते हैं। वे लोग शायद पत्नी के प्रति नरमी बरतने लगें। जो भी हो, लेकिन कानून बनाते वक्त इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि दहेज कानून की तरह न इसका दुरुपयोग हो, न ही कोई बेगुनाह का जीवन खराब हो।

इति मेहता | बांदा, उत्तर प्रदेश

 

हर वर्ग का रखे ध्यान

13 जून के अंक में ‘न हर पुरुष दुष्ट, न हर महिला भोली’ बहुत ही संतुलित टिप्पणी है। यह तो सच है कि हर मनुष्य का स्वभाव अलग-अलग है। इसे केवल स्त्री-पुरुष के नजरिये से नहीं देखा जा सकता। हालांकि माना जाता है कि स्त्रियां स्वभावगत कोमल होती हैं, जो कुछ हद तक सही भी है। लेकिन पुरुष हमेशा निर्दयी या जोर-जबरदस्ती करने वाला होगा, ऐसा भी नहीं है। यह टिप्पणी उसी की ओर बेहतर तरीके से इशारा करती है। स्त्रियों के प्रति किसी भी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए, लेकिन साथ ही पुरुष की गरिमा को भी ठेस न पहुंचे ऐसे उपाय कानून को करना चाहिए। न्यायालय को चाहिए कि वैवाहिक बलात्कार में हर वर्ग और तबके के परिवेश, स्वभाव, शिक्षा, आर्थिक रहन-सहन को ध्यान में रख कर विचार करे।

यशिका राज आप्टे | मुंबई, महाराष्ट्र

 

बड़े नामों का खोटापन

नई बॉक्सिंग क्वीन के बारे में लेख, ‘सुनहरी चमक की नई जरीन,’ (13 जून) पढ़ते हुए गर्व महसूस हुआ। गर्व इसलिए भी कि पिछले कुछ सालों से एक खास समुदाय के पिछड़ेपन पर खूब बातें होती हैं। लेकिन इसी समुदाय से आने वाली लड़की बॉक्सिंग की दुनिया में विश्व पटल पर भारत का नाम रोशन कर रही है। लेकिन मैरी कॉम के बारे में पढ़ कर निराशा हुई। बड़े खिलाड़ियों को तो हमेशा नए खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करना चाहिए। लेकिन जरीन के बारे में उनकी प्रतिक्रिया बहुत खराब थी। जरीन तो मेहनत के बल पर आ गईं। लेकिन ऐसी कितनी खिलाड़ी होंगी, जिन्हें बड़े खिलाड़ियों के ऐसे रवैये के चलते मौका भी नहीं मिल पाता होगा। यह दुखद है। इसे बदलना चाहिए।

चांद मोटवानी | मुंबई महाराष्ट्र

 

इंटरनेट का अतिशय उपयोग

30 मई के अंक में ‘सोशल मीडिया के शिकंजे में हमारे गांव’ लेख अपने भीतर समसामयिकता और युग सापेक्षता समेटे हुए है। लेखक ने सात समंदर पार बैठकर भारतीय गांवों की दुखती नब्ज को बखूबी टटोला है। निःसंदेह जब से सोशल मीडिया ने ग्रामीण इलाकों में अपने पैर पसारे हैं, लगता है वहां की संस्कृति और संस्कारों का अपहरण हो गया है। इंटरनेट का अतिशय उपयोग सामाजिक ढांचे को ढहाए जा रहा है और हम मूक होकर इसे देख रहे हैं। वैसे तो ग्राम्य जीवन की संजीदगी और सादगी पर सबसे पहले कुठाराघात अस्सी के दशक में टेलीविजन ने किया था लेकिन तब परिस्थितियां इतनी भयावह नहीं थीं, जितनी सोशल मीडिया के आने पर हुईं। लेख के सुझावों पर गौर करना लाजिमी है अन्यथा गांव का रहा-सहा भोलापन भी शीध्र समाप्त हो जाएगा।

पूजन गौतम | फरीदाबाद, हरियाणा

 

नई तरह की राजनीति

आउटलुक 30 मई के अंक में लेख ‘प्रतिशोध के सरकार’ पढ़ा। राजनीति में प्रतिशोध और सत्ता का दुरुपयोग नया नहीं है। पहले राज्यों की सत्ता की धमक सीमाओं के अंदर तक ही समिति थी। जैसे फरवरी 2019 में पश्चिम बंगाल में पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर गए सीबीआइ अधिकारियों को राज्य पुलिस द्वारा हिरासत में लेना। मगर जिग्नेश मेवाणी, तेजिंदर पाल सिंह बग्गा, अलका लांबा, कुमार विश्वास आदि मामलों के बाद लगता है कि अब राज्यों की पुलिस अखिल भारतीय हो गई है। एक तय प्रक्रिया के तहत अपराधियों, आतंकवादियों आदि को पकड़ने के लिए पुलिस हमेशा से राज्यों के बाहर कार्रवाई करती रही है। लेकिन राजनीतिक विरोधियों के लिए, नियमों को तोड़-मरोड़ कर, राज्यों से बाहर जाना एकदम नया है। अफसोस है कि नई तरह की राजनीति की बात करने वाली आम आदमी पार्टी भी सत्ता के दुरुपयोग के इस मकड़जाल खुद को बचा नहीं पाई।

बृजेश माथुर | गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

 

छात्रों को मिले न्याय

30 मई की प्रथम दृष्टि में, ‘परीक्षा तंत्र की परीक्षा’ में हालिया आयोजित बीपीएससी पर्चा लीक का जिक्र है। यह एक तरह से दुखती रग पर हाथ धरने जैसा है। इस परीक्षा के बारे में संपादकीय में लिखना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे छात्रों को थोड़ी तो सांत्वना मिलेगी कि उनके बारे में कोई सोच रहा है। छात्र कड़ी मेहनत से तैयारी करते हैं और घर से दूर मिले परीक्षा केंद्रों पर जाकर परीक्षा देते हैं। वे वहां तक कैसे पहुंचते हैं यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। छात्र परीक्षा देकर घर भी नहीं पहुंचते कि परीक्षा रद्द हो जाती है। यह कहां का न्याय है। ऐसी घटनाएं छात्रों को आर्थिक रूप से तो तोड़ती ही हैं, मानसिक रूप से भी परेशान करती हैं। जो भी परीक्षा रद्द हो, उन सभी छात्रों को मुआवजा मिलना चाहिए। पेपर लीक की पूरी साजिश में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि परीक्षा तंत्र में फिर कोई सेंध न मार सके।

जफर अहमद | मधेपुरा, बिहार

 

असल जीवन में भी मिसाल

‘कालीन भैया की देशज कथा’, (16 मई 2022) पढ़कर मन गदगद हो उठा। जिस गांव में बिजली नहीं, दुनिया को जोड़ने वाली सड़क नहीं, उस गांव से एक बालक कड़ी मेहनत कर संघर्ष से जूझता हुआ बिना किसी गॉडफादर या सहायता के स्वयं फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में अपना न सिर्फ सफल मुकाम बनाता है बल्कि अपनी जमीन से जुड़ा भी रहता है। धन्य हैं पंकज त्रिपाठी जिन्होंने अपने सहज, स्वाभाविक जीवंत अभिनय द्वारा अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। कहते हैं एक प्रतिभाशाली अभिनेता अपने किरदार की आत्मा के अंदर पहुंच उसे पर्दे पर साकार करता है और हर बार अपनी प्रसिद्ध छवि तोड़ नए किरदार में घुस नई छवि को साकार कर देता है। पंकज त्रिपाठी इसमें पारंगत हैं। गांव से निकल कर मुंबई तक की यात्रा की कहानी काफी संघर्षपूर्ण है और लोगों को प्रेरणा देती है। मन में अगर कोई सच्ची इच्छा है और दिल में लगन है, तो कायनात भी उस सफलता में अपना योगदान देती है। शायद यही उनकी सफलता का राज है। सफलता और प्रसिद्धि के मुकाम पर पहुंच कर भी वही सरलता और अपने गांव से जुड़े होने की सादगी, जरूरतमंदों की सहायता के लिए तैयार रहना उनके चरित्र की सरलता को दिखाता है।

नीरजा वर्मा | रायपुर, छत्तीसगढ़

 

फिर बदलेंगे हालात

30 मई के अंक में, कांग्रेस पार्टी पर ‘पुरानी जड़ों की ओर’ लेख अच्छा लगा। कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण पार्टी है। सबसे अच्छा संकेत यही है कि पार्टी अभूतपूर्व बदलाव के लिए मंथन कर रही है, चिंतन कर रही है। वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस उन जड़ों की ओर लौट आएगी, जो उससे कहीं छूट गई थी। इसके बाद उसकी जो सुनहरी आभा बिखरेगी, वह कहीं किसी को नहीं टिकने देगी। हालांकि अभी हालात चुनौती भरे हैं लेकिन पार्टी हर चुनौती से जूझना जानती है। यह दल फिर से इतिहास रचेगा, यह पक्का विश्वास है। भारत में अब भी अनेक लोग हैं, जो इसी पार्टी को उसके आदर्शवाद के लिए पसंद करते हैं।

संदीप पाण्डे | अजमेर, राजस्थान

 

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पुरस्कृत पत्र : आज नहीं तो कल

नया अंक (13 जून 2022) क्या करें और क्या न करें की स्थिति में छोड़ गया है। नए दौर में वाकई नए तरीके से सोचने की जरूरत होती है। करीब पांच-छह साल पहले तक, ‘मेरी देह मेरा हक’ जैसे नारे कोरे बकवास लगते थे। लेकिन जब वैवाहिक बलात्कार के बारे में धीरे-धीरे पढ़ता गया तो लगने लगा कि यह ऐसा विषय है, जो वाकई साल बीतने के बाद भी अछूता है। ‘देह का हक’ केवल स्त्री की देह के हक की बात नहीं बल्कि मनुष्यता का हक है। किसी के साथ केवल इसलिए जबर्दस्ती की जा सके कि सामने वाला पत्नी के रूप में जिंदगी में है, इससे बुरी बात और क्या हो सकती है। आज भले ही अदालत के दो जज एकमत नहीं हो सके या नतीजे पर नहीं पहुंचे, लेकिन जब बात शुरू ही हो गई है, तो न्याय के नतीजे तक जरूर पहुंचेगी।

कमलकांत शर्मा | हिसार, हरियाणा

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