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30 नवंबर 2020 · NOV 30 , 2020

संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आईं पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

पुरस्कृत पत्र

रोजगार की चिंता

हिंदी आउटलुक की 16 नवंबर, 2000 की आवरण कथा, ‘दावेदारी का दम’ रोमांचक और विश्लेषण से परिपूर्ण लगी। ‘प्रथम दृष्टि’ में बहुत ही सूक्ष्म विश्लेषण है, जिससे पता चलता है कि आउटलुक ने बिहार की नब्ज पर हाथ रखा है। पंजाब में किसानों की समस्या पर, ‘मानने के मूड में नहीं किसान’ नए कृषि कानून पर अमरिंदर सरकार के जोर को दिखा गया। किसानों का धरना जारी रहना बताता है कि मोदी सरकार के खिलाफ असंतुष्टि का संकेत बिलकुल साफ हैं। भविष्य की नौकरियों के बारे में आलेख, ‘हरफनमौला की तलाश’ बहुत ही विचारोत्तेजक है। जीएसटी विवाद पर छत्तीसगढ़ के वाणिज्य कर मंत्री टी.एस.सिंहदेव का साक्षात्कार भी बहुत सराहनीय और विचारणीय है। 

सुरेश प्रसाद |दार्जीलिंग, पश्चिम बंगाल

 

परेशान आमजन

‘दावेदारी में तो दम’ आवरण कथा (16 नवंबर) पढ़ी। बिहार की गद्दी पर चाहे जिसकी ताजपोशी हो, लेकिन प्रदेश और जनता के हित में दमदार काम होना चाहिए। बिहार की जनता को काफी छला और लूटा गया है। आमजन अब बेदम है, उसकी सहनशक्ति जवाब देने लगी है। आखिर बेदम वादों के नाम पर काठ की हांडी दोबारा चढ़ने वाली नहीं है। इसीलिए बिहार की जनता तेजस्वी में आशा की किरण देख रही है। अगर वे सत्ता में आते हैं तो यह उनकी अग्निपरीक्षा होगी। एक तरफ जनता महंगाई, बेरोजगारी, बदहाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चिंतित है, तो दूसरी तरफ उसे प्रदेश के पुख्ता विकास कार्यों और बदहाल कानून व्यवस्था को लेकर चिंता है। चाहे जो भी हो, तेजस्वी यादव में जनता को उम्मीद की किरण दिखाई देती है। अगर जनता उन्हें सत्ता की रास थमाती है, तो हर हाल में उन्हें कसौटी पर खरा उतरना होगा।

हेमा हरि उपाध्याय | उज्जैन, मध्य प्रदेश

 

व्यक्ति एक, काम अनेक

आउटलुक के 16 नवंबर के अंक में नई तरह की नौकरियों के बारे में बहुत अच्छी जानकारी दी गई है। यह लेख बहुत महत्वपूर्ण है और इसे हर नौजवान को जरूर पढ़ना चाहिए। महामारी के बाद वाकई नियोक्ता नए ढंग से सोचेंगे। ऐसे में रोजगार पाने वालों को भी चाहिए कि वे नई तकनीक के साथ नई व्यवस्था पर नजर बनाए रखें। लेख में सच कहा गया है कि अब एक व्यक्ति को कई काम एक साथ करने होंगे। तभी नौजवान नौकरी पा सकेंगे और नौकरियों में टिके रह सकेंगे।

अक्षय शर्मा | सहरसा, बिहार

 

विकेटकीपिंग के मास्टर

तथ्यपरक और वास्तविकता के धरातल पर आधारित आउटलुक के आलेखों का कोई जवाब नहीं है। बिहार चुनाव के उलझे हुए जटिल समीकरण पर आधारित खोज परक आलेख, ‘दो नेता दोनों लाए बदलाव’, (2 नवंबर) पठनीय है। नीतीश और लालू की समीक्षा ने सच में बहुत प्रभावित किया। वहीं, ‘नए गणित और नई चुनौतियां’ आलेख भी तथ्यपरक रहा। आजादी के इतने सालों बाद भी दलित उत्पीड़न की खबरें विचलित करती हैं। ‘हाशिए पर दलित’ लेख दिल को छू गया। जोंटी रोड्स जैसे विलक्षण क्षेत्ररक्षक का साक्षात्कार बहुत अच्छा लगा।

इंद्रजीत कौशिक | बीकानेर, राजस्थान

 

कसौटी पर खरा

आउटलुक का 2 नवंबर अंक पढ़ा। हमेशा की तरह इस अंक में भी समसामयिक मुद्दों जैसे कृषि कानून, बिहार चुनाव, फर्जी टीआरपी का मामला, कोविड-19 आदि को बड़े गहन विश्लेषण और निष्पक्ष तरीके के साथ प्रस्तुत किया गया है। संपादकीय, ‘मीडिया की बेरुखी क्यों’, ‘हाशिये पर दलित’, ‘उच्च शिक्षा के नए प्रतिमान’ और ‘शहरनामा’ बहुत अच्छा लगा। सभी आलेखों में हर पहलू पर विचार कर तथ्य सहित हर बात बताई गई है। फेक न्यूज और फर्जी टीआरपी मामले के कारण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विश्वसनीयता कम होती जा रही है। ऐसे में सही खबर और स्वच्छ कंटेंट को लेकर जनता की प्रिंट मीडिया से अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। खबर की विश्वनीयता और कंटेंट की कसौटी पर आउटलुक हमेशा खरा उतरा है।

सौरभ अग्रवाल | दिल्ली

 

सभी पक्षों को लेकर चलना

आउटलुक पढ़ने से देश के विभिन्न समस्याओं और घटनाओं पर विश्लेषण करने का मौका मिल जाता है। 2 नवंबर अंक में हाथरस घटना पर की गई समीक्षा ने बहुत प्रभावित किया। बिहार चुनाव पर, ‘बिहार में के बा’ ने राज्य के चुनाव के सभी पक्षों को हमारे सामने रखा। मीडिया की टीआरपी पर जिस तरह से कटाक्ष किया गया है, वह हमें मौजूदा समय में टीवी टीआरपी पर सोचने को मजबूर करता है। आउटलुक ने हमेशा किसानों की समस्या उठाया है। इस अंक में भी यह देखने को मिला।

विजय किशोर तिवारी | नई दिल्ली

 

नई पीढ़ी आगे आए

आउटलुक के नए अंक (2 नवंबर 2020) में संपादकीय, ‘हाथरस और हम’ पढ़ा। देश में इस तरह की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने ठीक लिखा है कि ‘हाथरस कांड एक लाइलाज बीमारी का लक्षण है।’ बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए केंद्र को सख्त कानून लाना ही चाहिए। लेकिन हाथरस की घटना सिर्फ बलात्कार की घटना नहीं है, बल्कि यह दलित उत्पीड़न की भी घटना है। दलितों, वंचितों और शोषित वर्ग की सुरक्षा हर राज्य सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए। नई पीढ़ी भी यदि इस वर्ग के प्रति संकुचित नजरिया रखेगी, देश कभी तरक्की नहीं कर पाएगा। पुरानी पीढ़ी अपनी मानसिकता तुरंत नहीं बदल पाएगी, लेकिन नई पीढ़ी को इस व्यवहार से आगे आना होगा।

कुसुम प्रखर | डाल्टनगंज, बिहार

 

दलितों पर अत्याचार

भारत में यह पहली बार नहीं है जब दलितों के साथ अत्याचार या बलात्कार हो रहा है। इतिहास गवाह है कि इस समुदाय ने हमेशा ही पीड़ा झेली है। दलितों के साथ अत्याचार करने वाले किसी दूसरे ग्रह से नहीं आते। वे इसी देश के लोग हैं, जिनमें कुछ ऐसे हैं जो उनकी स्त्रियों के साथ इसलिए दुराचार करते हैं ताकि समुदाय के पुरुषों से बदल ले सकें। पुरुष से दुश्मनी की कीमत स्त्रियों को चुकानी पड़ती है। हाथरस की घटना पर यदि फौरन न्याय नहीं होत है तो यह मान लेना चाहिए कि किसी भी राजनैतिक दल को इनकी फिक्र नहीं है।

डॉ. जसवंत सिंह जनमेजय | दिल्ली

 

सामायिक टिप्पणी

आउटलुक के सितंबर अंक में संपादकीय, ‘शर्मिंदगी का सबब’ कई प्रश्नों के उत्तरों की सटीक व्याख्या करता है। जहां एक ओर मीडिया का अपना दायित्व बोध है, वहीं दूसरी ओर दूसरे पक्ष की सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है। मीडिया अभी सनसनीखेज खबरों में ही उलझी हुई है। संपादकीय में मीडिया और न्याय के बीच एक बारीक लकीर खींची गई है, जिसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

मोहन जगदाले | उज्जैन, मध्य प्रदेश

 

हर आमजन की आवाज

आउटलुक सितंबर 2020 अंक का संपादकीय पढ़कर अच्छा लगा। संपादकीय देश के लाखों करोड़ों की आवाज थी। जिस तरह का ‘मीडिया ट्रायल’ अब होने लगा है, वह पत्रकारिता के लिए खराब स्थिति है। यह केवल सुशांत सिंह राजपूत के मामले में नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित लड़की की हत्या को लेकर मीडिया ने जिस प्रकार अनावश्यक सक्रियता दिखाई उससे देश में कानून व्यवस्था, पुलिस और न्यायालय के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया। मीडिया ने मनगढ़ंत तथ्य न केवल परोसे बल्कि लोगों की निजता पर आक्रमण भी किया। संपादकीय, ‘शर्मिंदगी का सबब’ बहुत ही अच्छा लगा। 

रामभुवन सिंह कुशवाह | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

कौन बदलेगा हालात

आजकल देश अजीब माहौल से गुजर रहा है। जो सच है उसे कहने में भी लोग डरने लगे हैं। क्या वजह है कि मीडिया पक्ष और विपक्ष के खेमे में बंट गया है और इन्हें देख-सुन और पढ़ कर लोग भी दो भागों में बंट गए हैं। जिन नौजवानों को नौकरी और करिअर की चिंता करना चाहिए वे अपना भविष्य दांव पर लगा कर जुमलेबाजी का हिस्सा हो रहे हैं। यह चिंतनीय है।

श्रीराम परिहार | वाराणासी, उत्तर प्रदेश

 

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इतिहास का आईना

उत्तरायण, शांतिनिकेतन, बंगाल

19-2-‘40

प्रिय महात्माजी,

आज सुबह आपको हमारे विश्वभारती गतिविधि  केंद्र का केवल विहंगम दर्शन हुआ है। मुझे अंदाजा नहीं है कि आपने इसकी उत्कृषटता के बारे में क्या अनुमान लगाया है। आप जानते हैं कि यह संस्थान अपने तात्कालिक छवि में राष्ट्रीय होने के बावजूद अपनी भावना में अंतरराष्ट्रीय है, और अपने सर्वोत्तम साधनों के अनुसार भारत की संस्कृति को दुनिया के बाकी हिस्सों में पेश करता है।

इसके नाजुक क्षणों में से एक में आपने इसे पूरी तरह से टूटने से बचाया है और इसकी मदद की है। मित्रता के इस कार्य के लिए हम आपके आभारी हैं।

और अब आप इससे पहले शांतिनिकेतन की छुट्टी लें, मैं आपसे अपनी उत्कट अपील करता हूं। यदि आप इसे राष्ट्रीय संपत्ति मानते हैं तो इस संस्था को अपने संरक्षण में स्वीकार करें।

विश्व भारती एक जहाज की तरह है, जो मेरे जीवन के सर्वश्रेष्ठ खजाने को ढो रहा है। मुझे उम्मीद है कि यह अपने देशवासियों से इसके संरक्षण के लिए विशेष देखभाल का दावा कर सकता है...

बस इस समय कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जो हमारे भाग्य को अंधकारमय कर रहा है। ये, हम जानते हैं कि आपके रास्ते पर भीड़ बढ़ रही है और हममें से कोई भी उनके हमले से मुक्त नहीं है। आइए, इस उथल-पुथल की सीमा से कुछ समय के लिए गुजरें और आज हमारी मुलाकात दिलों की एक साधारण मुलाकात हो, जिसकी याद तब बनी रहेगी जब हमारी विचलित राजनीति के सभी नैतिक भ्रम दूर हो जाएंगे और सभी सच्चे प्रयासों का शाश्वत मूल्य सामने आ जाएगा।

स्नेह सहित

रबीन्द्रनाथ टैगोर

रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा महात्मा गांधी को लिखे गए एक पत्र के अंश

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