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पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं

पुरस्कृत पत्र

चुनाव प्रधान देश

भारत में अच्छी और सस्ती शिक्षा, समुचित स्वास्थ्य व्यवस्थाएं हमेशा चरमराई रहती हैं। लोगों के पीने के लिए साफ पानी नहीं है, खाने के लिए भरपेट अन्न नहीं है लेकिन यहां हर साल चुनाव होते रहते हैं। भारत को कृषि प्रधान देश के बजाय चुनाव प्रधान देश कहना ज्यादा उचित है। मध्य प्रदेश में एक पार्टी के आधे से ज्यादा विधायक पाला बदल लिए! अब वहां उपचुनाव हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव खत्म नहीं होंगे कि पश्चिम बंगाल और उसके बाद उत्तर प्रदेश के चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो जाएगी। केंद्र का हर बड़ा नेता इन राज्यों में, ‘स्टार प्रचारक’ होगा और विपक्ष भी उन्हीं राज्यों के मुद्दों को तूल देना जहां आगामी दिनों में चुनाव होंगे। ऐसे में कौन है, जो आम आदमी और उनकी समस्याओं के बारे में सोचेगा? हर साल होने वाले चुनाव का बोझ आखिर जनता पर ही पड़ता है।

पार्थ कुलकर्णी | नासिक, महाराष्ट्र्

शीर्षक ही सारांश

इस बार की आवरण कथा, ‘बिहार में के बा?’ (2 नवंबर 2020) के शीर्षक ने ही पूरे अंक का सारांश बता दिया। वाकई बिहार में क्या होगा यह सभी जानना चाहते हैं। पार्टियां मूल मुद्दे भूल कर सिर्फ तरह-तरह से मतदाताओं को लुभा रही हैं। इसमें मुफ्त कोरोना वैक्सीन ने बहस को नई दिशा में मोड़ दिया है। जो राज्य अपने यहां के मजदूरों की सुध न ले सका उसी राज्य में पार्टियां बिना संकोच जनता से वोट मांग रही हैं। मतदान के वक्त जनता अपनी ताकत दिखाए। 

देवेश त्रिपाठी ‘विरूपाक्ष’ | संत कबीर नगर, उप्र

तेजस्वी की परीक्षा

‘नए गणित, नई चुनौतियां’ (2 नवंबर 2020) पढ़ा। नीतीश कुमार को बिहार की सत्ता में 15 साल हो गए हैं और इस बार एंटी इनकंबेंसी उनकी जीत प्रभावित कर सकती है। लेकिन अभी तक नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग का कोई तोड़ नजर नहीं आ रहा है। यह सही है कि तेजस्वी का महागठबंधन युवा नेतृत्व से भरा हुआ है लेकिन लालू यादव के चारा घोटाले की काली छाया वोटरों के उत्साह को फीका कर सकती है। नई पार्टी के साथ युवा उम्मीदवार पुष्पम प्रिया के बारे में जानकर भी अच्छा लगा। उन जैसे और भी युवा राजनीति में आएं, तो यकीनन देश के हालात बदलेंगे और सुधरेंगे। देखना यह है कि तेजस्वी अपनी पार्टी को कहां तक ले जा पाते हैं। यह चुनाव उनके नेतृत्व की भी परीक्षा है।

हरिकृष्ण बड़ोदिया | रतलाम, मध्य प्रदेश

 

नई पीढ़ी आगे आए

आउटलुक के नए अंक (2 नवंबर 2020) में संपादकीय, ‘हाथरस और हम’ पढ़ा। इसमें ठीक लिखा गया है कि ‘हाथरस कांड एक लाइलाज बीमारी का लक्षण है।’ बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए केंद्र को सख्त कानून लाना ही चाहिए। नई पीढ़ी को इस वर्ग के प्रति समानता का नजरिया रखना होगा, तभी देश तरक्की कर पाएगा। पुरानी पीढ़ी अपनी मानसिकता तुरंत नहीं बदल पाएगी, लेकिन नई पीढ़ी को इस व्यवहार से आगे बढ़ना होगा। यही संदेश अहम है।

कुसुम प्रखर | गया, बिहार

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