पत्र संपादक के नाम

भारत भर से आई पाठको की  प्रतिक्रियाएं
भारत भर से आई पाठको की प्रतिक्रियाएं

मीडिया बना जज

आउटलुक की 21 सितंबर की आवरण कथा बहुत सही समय पर आई है। मीडिया की इस भूमिका पर भी बात होनी ही चाहिए। यदि सभी को मीडिया के ऐसे कवरेज खराब लगते हैं, तो फिर इन्हें देखता कौन है, इन चैनलों के पास टीआरपी कहां से आती है? इससे पहले भी मीडिया संवेदनशील मामलों में निर्णायक बन कर किसी दूसरे पक्ष को दोषी ठहरा देता है। बाद में अदालतें अलग ही फैसला देती हैं। इस पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून की जरूरत है।

आशा मिश्रा | कटिहार, बिहार

सटीक संपादकीय

21 सितंबर का संपादकीय पढ़कर मन विचलित हो गया। इस संपादकीय का एक-एक शब्द मीडिया की आज की हालत को बयान करता है। जब संपादक इस तरह निराश हैं तो हम आम आदमी मीडिया से क्या उम्मीद रखें। मीडिया को खुद को नियंत्रित करने की जरूरत है। पता नहीं हमारे सरकार का सूचना और प्रसारण मंत्रालय ऐसे मामलों में मीडिया ट्रायल पर सख्त कदम क्यों नहीं उठाता है। मीडिया को आत्मसंयमित होकर निष्पक्ष जांच तक सिर्फ संतुलित रिपोर्टिंग करना चाहिए।

डी राज अरोड़ा | अंबाला, हरियाणा

टीआरपी की सनसनी

यह सच है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद से ही उनके प्रशंसक और परिवार वाले सच्चाई जानना चाहते हैं। लेकिन मीडिया खास कर टीवी मीडिया ने इस मामले को टीआरपी के लिए जिस तरह सनसनीखेज बना दिया है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। 21 सितंबर की आवरण कथा में आउटलुक ने बहुत अच्छे ढंग से मीडिया की कार्यशैली को बताया है। साथ ही इस उद्योग से जुड़े लोगों के विचारों ने इसे संपूर्ण बनाया है। सभी चाहते हैं कि दोषियों को सजा मिले लेकिन बिना किसी ठोस साक्ष्य या तथ्यों के केवल अपने चैनल का नाम चमकाने के लिए ऐसा करना गलत है। इस तरह के मीडिया ट्रायल से एक बार यदि व्यक्ति संदेह के घेरे में आ जाता है, तो बाद में उसे समाज में परेशानी उठानी पड़ती है। 

दीपक कुमार त्यागी | धनबाद, झारखंड

 

पुरस्कृत पत्र

सच का हर पहलू

आउटलुक हमेशा से ही बहुत विश्वसनीय पत्रिका रही है और यह हमेशा ही ताजे घटनाक्रम पर हर पहलू से सूचना मुहैया कराती है। 21 सितंबर के अंक में सबसे ज्यादा नंबी नारायण का लेख अच्छा लगा। आउटलुक से ही प्रशांत भूषण के मामले को समझने में आसानी हुई। आसान भाषा में इस मामले को समझाया गया है। प्रोफेशनल कॉलेज की रैंकिंग उन छात्रों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिन्हें इस वर्ष प्रवेश लेना है। लेकिन यह समझना होगा कि क्या वाकई इस तरह की रैंकिंग छात्रों के लिए फायदेमंद होती है। क्योंकि आउटलुक से ही मुझे ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए कई ऐसे छात्रों को जानने का मौका मिला, जिन्होंने देश की प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता पाई थी। जाहिर सी बात है, यूपीएससी देने वाले ये छात्र किसी कॉलेज की रैंकिंग में नहीं पड़े होंगे। 

नीति श्रीवास्तव | लखनऊ, उ.प्र

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से