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पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं

सौंदर्य से आगे

जो लोग सोचते हैं कि सौंदर्य प्रतियोगिताएं सिर्फ देह या सौंदर्य का प्रदर्शन हैं, वे बिलकुल गलत हैं। (आवरण कथा 10 जनवरी, ‘खूबसूरती की दुनियादारी’) कई लोगों को लगता है कि स्त्रियों को इस तरह देह दर्शना के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना उन्हें पीछे धकेलने की सोची-समझी साजिश है। लेकिन मिस वर्ल्ड या मिस यूनिवर्स बनना सौंदर्य प्रतियोगिता जीतने से कहीं आगे की बात है। पितृसत्ता तो चाहती ही है कि लड़कियां कुछ न करें। अब डॉक्टर, इंजीनियर या एस्ट्रोनॉट बनने के लिए तो उनकी आलोचना की नहीं जा सकती इसलिए ब्यूटी कॉन्टेस्ट की ही आलोचना करने लगते हैं। कुछ नारीवादी स्त्रियां भी इसमें कूद पड़ती हैं। उन्हें भी लगता है कि ये प्रतियोगिताएं सौंदर्य के अलग मानदंड बनाती हैं, जिसके कारण लड़कियां पढ़ाई छोड़ कर इन्हीं सब में लग जाती हैं। लेकिन पिछले कुछ साल में सौंदर्य प्रतियोगिताओं का स्वरूप बदला है। अब सिर्फ रंग, रूप, ऊंचाई या देश से नहीं बल्कि प्रतियोगी के आत्मविश्वास और हाजिर जवाबी की भी परीक्षा होती है। उस मंच पर पहुंच कर प्रतियोगी राष्ट्रीयता, मानवाधिकार जैसे जटिल मामलों को करीब से जानती और समझती हैं। हरनाज संधू ने मिस यूनिवर्स 2021 के अंतिम सवाल के जवाब में कहा, “मैं युवाओं को खुद पर भरोसा करने के लिए कहूंगी क्योंकि यही सबसे ज्यादा मुश्किल है आज की दुनिया में।” ये सिर्फ सुंदर ही नहीं बल्कि सजग लड़किया हैं। इनका आदर किया जाना चाहिए।

विनीता श्रीवास्तव | श्रावस्ती, बिहार

 

ये आग कब बुझेगी

‘एक जलता हुआ शहर’ (आवरण कथा, 27 दिसंबर) पढ़कर मन विचलित होना जरूरी है। देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले कोयलांचल के लगभग सभी कोलियरी की वर्तमान दशा चिंताजनक है। कोलियरी की खदानों में बरसों से लगी आग अंदर ही अंदर आगे चलकर देश की आर्थिक जमीन को भी खोखला कर सकती है। जलती हुई आग कौतूहल के साथ-साथ चिंतन का भी विषय है। संबंधित मंत्रालय के लिए भी आग की पहेली बुझाना सबसे बड़ा काम होना चाहिए। एक अन्य लेख (‘ममता महत्वाकांक्षा के मायने’) ममता जी की सुसुप्त आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं, दोनों की पोल खोलता है। ममता को यह बात विपक्षी दल समझाने में विफल हैं कि कांग्रेस (चाहे जितनी भी पतनशील हो रही हो) के बगैर विपक्ष का ‘एक’ होना असंभव है। कांग्रेस के बिना विपक्षियों द्वारा पीटा जाने वाला ‘एकता’ का ढोल बजने से पहले ही फट जाएगा। रवीना टंडन जैसी बड़ी अभिनेत्री का वेब सीरीज में आना नई घटना नहीं है। एक समय था जब स्टार छोटे पर्दे पर एहसान जताने के लिए किसी लोकप्रिय सीरियल के एकाध एपिसोड में आते थे और निर्माता-निर्देशकों एवं दर्शकों को धन्य करते थे। वेब सीरीज का प्रचलन शुरू होने के बाद अब यही छोटा पर्दा सभी को आकर्षित करने लगा है। मनोरंजन जगत के लिए यह अच्छी बात हो सकती है मगर बड़े पर्दे के लिए खतरा पैदा होने की पूरी संभावना है।

राजीव रोहित | मुंबई, महाराष्ट्र

 

राहत के आसार नहीं

आउटलुक के 27 दिसंबर के अंक में ‘धुआं होती जिंदगी’ लेख पढ़ कर लगा कि देश में सरकारें साल दर साल किसी तरह अपनी जिम्मेदारियों से बचने का रास्ता खोजती रहती हैं। शहरों के साथ गांवों में भी प्रदूषण रोकने और इस संकट से आमजन को उबारने के लिए सरकारों को ठोस उपाय करने होंगे। इसके लिए सत्ताधारी नेतृत्व में दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ दूरदर्शी योजना बनानी होगी। ये योजनाएं जल्द से जल्द लागू होंगी तभी हर तरह के प्रदूषण से राहत मिल पाएगी। इस काम में आमजन की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी और साथ ही विद्यालय स्तर से ही पर्यावरण संरक्षण की जरूरत और महत्व को अगली पीढ़ी को समझाना होगा। बड़े शहरों के साथ-साथ जानलेवा प्रदूषण से बेहाल देश के छोटे शहरों की आबोहवा सुधारने के लिए भी जरूरी कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इस अंक में झरिया की खुली कोयले की खदानों में लगी आग से फैली त्रासदी को बड़े ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। क्या सरकारें अब भी नहीं जागेंगी?

हिमांशु शेखर | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

 

भौगोलिक विस्तार बढ़े

आउटलुक के 27 दिसंबर अंक में, ‘ममता महत्वाकांक्षा के मायने’ अच्छा लेख है। कांग्रेस ने पिछले लगभग 12-15 साल में धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन खोई है। वहीं इस दौरान तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी ने न सिर्फ अपनी साख बनाई बल्कि अपना जनाधार भी बढ़ाया। ऐसे परिदृश्य मे तृणमूल कांग्रेस का विस्तार स्वाभाविक प्रक्रिया है। ममता बनर्जी बचे हुए उन कुछ नेताओं में से हैं, जिनका जनाधार अब भी विशाल है। वह जमीन से जुड़ी हुई नेता हैं। कांग्रेस के नेता जिन्हें कांग्रेस में सम्मान नहीं मिल रहा, जाहिर है वे अपने लिए दूसरा रास्ता खोजेंगे ही। इन सभी को मिल कर तृणमूल कांग्रेस को मजबूत करना चाहिए ताकि तृणमूल कांग्रेस को भी भौगोलिक विस्तार मिले। ममता बनर्जी को भी चाहिए कि वे हर क्षेत्र के नेता का दिल खोल कर स्वागत करें। इससे पार्टी को विशाल रूप मिलेगा। तृणमूल कांग्रेस को ध्यान रखना चाहिए कि त्रिपुरा, गोवा जैसे राज्यों में अचानक वह सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी। लेकिन अगर उनके नेता वहां के स्थानीय लोगों के साथ मिलकर उनके मुद्दों के लिए लड़ें और उनके बीच अपनी साख बनाएं, तो आने वाले समय में एक शक्तिशाली पार्टी के रूप मे उभर सकती है। जहां तक यूपीए खत्म होने की बात है, तो यह कहना जरा अतिशयोक्ति होगी। क्योंकि ममता को गैर एनडीए दलों द्वारा अपना नेता सर्वसम्मति से चुना जाना टेढ़ी खीर होगा।

बाल गोविंद | गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

 

बोली के प्रति प्रेम दिखाएं

27 दिसंबर के अंक में ‘बोली की महत्ता बताने वाली जिज्जी’ आलेख में बहुत समय से उपेक्षित कर दी गई बोलियों का महत्व बखूबी समझाया गया है। इससे समझ आया कि आखिर वह क्या है, जो बच्चों के सीखने को बाधित कर रहा है। अगर माता-पिता और अध्यापक इसे समझ लें, तो बच्चों के सीखने की बाधा को दूर किया जा सकता है। साथ ही इससे हिंदी साहित्य भी समृद्ध होगा। यदि हम मां की गोद, परिवार और समाज को बच्चे की पहली पाठशाला मानते हैं, तो इस विसंगति और विडंबना पर ध्यान देना होगा कि कैसे यहां से सीखी हुई बोली, बच्चे का विकास करती है। लेकिन यही सीखना स्कूल जाते ही पूरी तरह उपेक्षा का शिकार हो जाता है। आखिर ये कैसे होता है? जब हम इसका कारण समझ जाएंगे, तो बच्चों को बेहतर शिक्षा दे पाएंगे। यह लेख भाषा ही नहीं बल्कि शिक्षा पद्धति में भी एक सार्थक हस्तक्षेप है। जो बोली और भाषा के अंतर को समझ कर आगे बढ़ेगा, वह हमेशा विजेता रहेगा। न भाषा के लिए बोली की उपेक्षा हो न बोली के लिए भाषा की। दोनों जब साथ चलेंगी, तो बच्चों का सार्थक विकास होगा। शासक वर्ग द्वारा उपयोग की जाने वाली भाषा ने शाषित वर्ग की बोली को अनदेखा किया और अनुपयोगी कर दिया। बोली को लेकर हीन भावना पैदा कर दी। स्कूल, गोष्ठी, कार्यालय, बौद्धिक विचार विमर्श में बोली का प्रयोग करने का साहस हम नहीं जुटा पाते। पढ़े-लिखे शहरी समाज में बोली के शब्द और उच्चारण अक्सर मजाक और हिकारत से देखे जाते हैं। किसी बोली को हिकारत से तभी राहत मिल सकती है, जब प्रतिष्ठित पद पर बैठे विद्वान अपने क्षेत्र की बोली के प्रति प्रेम दिखाएं।

श्याम बोहरे | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

चुनाव में जीत जरूरी

27 दिसंबर अंक में सभी लेख अच्छे हैं। चुनाव की सियासत शुरू हो चुकी है। जिसे देखो इसी रंग में रंगा है। हैरत की बात है कि संसद का शीतकालीन सत्र बीत गया लेकिन इसमें भी कोई काम नहीं हुआ। साफ है कि कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां कोशिश करती रह गईं पर प्रदूषण, शिक्षा का गिरता स्तर, खराब सेहत जैसे मसलों पर कोई चर्चा नहीं हो सकी। उत्तराखंड में भूमि कानून का मुद्दा, छत्तीसगढ़ में राजनीति में राम का नाम, पंजाब के सियासी गणित इन सब लेखों के बीच आवरण कथा, ‘दहकते, दमघोटूं, बेजान शहर’ पढ़ कर लगता है कि भारत कृषि प्रधान नहीं बल्कि चुनाव प्रधान देश है। गांवों तक प्रदूषण फैल रहा है लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं है। अगले साल फरवरी-मार्च में उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। लेकिन यहां भी चुनावी मुद्दों में प्रदूषण जैसी कोई बात नहीं है। सत्ताधारी दल भी नहीं चाहते कि इस तरह के मुद्दों पर जनता का ध्यान जाए। समस्या को स्वीकार कर उसका समाधान खोजना किसी नेता ने आज तक सीखा नहीं। न्यूज चैनल भी देश में कहां ईवीएम में गड़बड़ी हुई या इसके लिए कौन जिम्मेदार है, जैसी खबरें दिखाते हैं लेकिन कस्बों के प्रदूषण पर बात नहीं करते। इतने सवाल हैं लेकिन जवाब कहीं नहीं मिलते। मौजूदा सरकारें पब्लिक रिलेशन से सिर्फ अपना साफ दामन दिखाने की कोशिश करती हैं। धुंधला पक्ष दिखाना किसी को भी अस्वीकार है। सत्ता का ढोंग जारी रहना चाहिए, चुनाव में जीत मिलनी चाहिए बाकी तो सब बेकार है। अंक हमेशा की तरह विविधतापूर्ण लगा। आउटलुक वास्तव में सच की पक्षधर है।

हरीशचंद्र पांडे | हल्द्वानी, उत्तराखंड

 

सिस्टम में सुधार की जरूरत

‘विश्वविद्यालय नहीं, घोटालों का अड्डा कहिए’ (27 दिसंबर) पढ़कर आश्चर्य के साथ बहुत दुःख भी हुआ। जिन विश्वविद्यालयों की स्थापना का मूल उद्देश्य ही विद्यार्थियों को नीतिगत तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना था, उन्हीं विश्वविद्यालयों के कुलपतियों पर घोटालों के आरोप भारतीय शिक्षा व्यवस्था के दुर्भाग्य को तथा कानून व्यवस्था की लाचारी को प्रदर्शित करते हैं। जिस भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद ने देखा था, उस सपने को एक बड़ा धक्का मगध विश्वविद्यालय के कुलपति पर लगे आरोपों से लगा है। इस मामले की जांच चल रही है पर आगे ऐसे मामलों से बचने के लिए सभी सरकारी महकमों और सरकारी उपक्रमों की प्रतिवर्ष निष्पक्ष ऑडिटिंग होनी चाहिए, जिससे भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों में भय व्याप्त हो। सभी राज्यों में वार्षिक ऑडिट के लिए राज्य सरकारों के आंतरिक ऑडिट एवं निरीक्षण विभाग तथा भारतीय लेखापरीक्षा तथा लेखा विभाग हैं जिन्हें नए कानून बनाकर और संविधान संशोधन कर अन्य आवश्यक शक्तियां एवं मजबूती प्रदान करने की आवश्यकता है, जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लग सके। साथ ही भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की भी आवश्यकता है जिससे भ्रष्टाचार में कमी आए।

प्रियेश भारद्वाज | करौली, राजस्थान

 

 

पुरस्कृत पत्र

आलोचना क्यों

‘खूबसूरती की दुनियादारी’ (आवरण कथा, 10 जनवरी) पढ़ कर यही समझ आया कि दुनिया हमेशा दो राय में बंटी रहती है। हरनाज के खिताब जीतने के बाद एक धड़ा यह कहने से नहीं चूका कि ऐसे खिताब जीत कर लड़कियां आखिर करती क्या हैं? ऐसे लोगों से सिर्फ एक ही सवाल पूछा जाना चाहिए कि जो लड़कियां सौंदर्य प्रतियोगिता की तैयारी नहीं करतीं या उस मंच तक नहीं पहुंचती आखिर वे क्या करती हैं? कोई भी करिअर इतना आसान नहीं है, चाहे वह सौंदर्य के क्षेत्र में ही क्यों न हो। समाज के लोग अपने बेटे के लिए सुंदर लड़की चाहते हैं लेकिन सौंदर्य प्रतियोगिताओं की आलोचना करते हैं। जैसे सुंदर बहुएं घर की शान होती हैं, बस वैसे ही सुंदर लड़कियां देश की शान होती हैं।

पार्थ सान्याल | कोलकाता, पश्चिम बंगाल

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