संपादक के नाम पत्र

पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रयाएं
पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रयाएं

अच्छा अंक

आउटलुक का 18 अक्टूबर का अंक बहुत अच्छा लगा। संघ लोक सेवा आयोग 2020 में कुल 761 उम्मीदवारों में कटिहार के शुभम कुमार का साक्षात्कार अच्छा है। माता-पिता का सकारात्मक सहयोग सफलता के लिए जरूरी होता है। इस साक्षात्कार की प्रेरक बातों पर युवाओं को ध्यान देना चाहिए। शुभम ने अच्छी तैयारी के लिए फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया को बंद कर दिया था। उन्हें फिल्म देखना पसंद नहीं है। नौकरशाहों पर राजनीतिक दबाव पर दिए गए शुभम के उत्तर पर नौकरशाहों को ध्यान देना चाहिए। नौकरशाह स्थायी होते हैं, जबकि नेता-मंत्री अस्थायी। वे बदलते रहते हैं। दोनों के बीच तालमेल से ही किसी भी क्षेत्र का विकास संभव है। नौकरशाहों की तानाशाही प्रवृत्ति पर शुभम का कहना है कि अधिकारियों को धैर्यपूर्वक और लोकहित में कार्य करना चाहिए। भारत गांवों में बसता है। इस क्षेत्र से ज्यादा छात्रों का आना नौकरशाही के लिए बेहतर होगा। गांव का अनुभव जमीनी सुधार लाने में मदद करेगा। आवरण कथा, “ताज की लड़ाई” में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को दो एक दिवसीय और विश्व टेस्ट मैच के फाइनल में मिली हार का मूल्यांकन करना चाहिए। निश्चित रूप से टीम के नेतृत्व का परिवर्तन एक वर्ष पहले कर देना चाहिए था। रोहित शर्मा को तीनों प्रारूपों के लिए कमान दे देनी चाहिए। हमारे देश के शानदार गेंदबाजों के कारण भारत ने श्रृंखलाएं जीतीं, लेकिन गेंदबाजों को हटाने से टीम पर प्रभाव पड़ा। भुवनेश्वर कुमार जैसे श्रेष्ठ गेंदबाज का चयन टेस्ट चैंपियनशिप में नहीं किया गया। हमारी टीम आगामी 20-20 विश्वकप जीत कर आए, मेरी हार्दिक शुभकामनाएं भारतीय क्रिकेट टीम के साथ हैं। यह अंक शानदार है। संपादन के लिए पूरी टीम को हार्दिक धन्यवाद।

कुलदीप मोहन त्रिवेदी | उन्नाव, उत्तर प्रदेश

 

स्टार से बड़ा अभिनेता

18 अक्टूबर का अंक, “कप्तानी दंगल” सार्थक और सटीक है। इस लेख में बहुत खरा-खरा और सही लिखा है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी का साक्षात्कार भी मन को छू गया। उनकी यह बात दिल में बस गई कि उन्हें अभिनेता बनना है, स्टार नहीं। नवाज ने सुधीर मिश्रा पर एकदम सही विचार दिए हैं। सुधीर जी सचमुच बेहतर फिल्मकार हैं। शहरनामा पढ़ कर सर्वेश जी के साथ एक बार फिर से गोपालगंज जाकर मन भावुक हुआ। पच्चीस साल पुरानी जलेबी याद आ गई। पंचतत्व में विलीन कमला जी की तो मैं उपासना करती हूं। आज हजारों युवतियों की वे प्रकाश स्तंभ हैं। वे गई नहीं, हम सब में समा गई हैं। हमारे राजस्थान से पढ़ाई कर वे विदेश गईं, सामाजिक व्यवस्था के पाठ कमला जी ने राजस्थान के अनुभवों से समझे। वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र के साथ काम करती रहीं। समय ने पल-पल जिस कमला को गढ़ा, उसमें संकीर्णता और क्षुद्रता की कोई जगह नहीं थी। सारी दुनिया को एक मान कर वे सबके लिए जीने वाली थीं। दुनिया भर में उनके संपर्क थे। एशियाई महिलाओं के लिए वे जैसी प्रतिबद्धता से बात करती थीं, वह काबिले तारीफ है। वे ऊर्जा से भरी थीं लेकिन सहजता से जीती थीं। पहली मुलाकात में अपनी लगने लगती थीं। वे समाज और ठेकेदारों से नहीं उनकी गलत सोच से टक्कर लेती थीं। उनके काम की बदौलत वे हमेशा अमर रहेंगी।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

आतंरिक लोकतंत्र जरूरी

आउटलुक में कांग्रेस पार्टी पर लिखी विशेष रपट, “सुधारो और बिगाड़ो” (18 अक्टूबर) पढ़ी। कांग्रेस आजकल, “अशर्फियां लुटें, कोयलों पर मुहर” लोकोक्ति चरितार्थ कर रही है। सिंधिया से लेकर अमरिंदर सिंह तक अनेक कद्दावर जमीनी नेता उपेक्षा के कारण पार्टी छोड़ चुके हैं या छोड़ने वाले हैं। वक्त की कसौटी पर खरे उतरे इन नेताओं की जगह कांग्रेस कन्हैया कुमार, जिग्नेश, सिद्धू जैसों पर दांव लगा रही है जिनकी विचारधारा और राजनीति दोनों अपरिपक्व है। मंशा अगर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की है, तो फिर सिंधिया, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव जैसे नेताओं को मौका क्यों नहीं मिला? पायलट क्यों नाराज हैं? पंजाब में तो कांग्रेस न घर की रही न घाट की, क्योंकि यहां युवा और अनुभवी दोनों नाराज हैं। पार्टी युवाओं को मौका देने की बात पर अनुभव की बात करती है। अनुभवी लोगों को कमान देने से बचने के लिए वह युवाओं की बात करने लगती है। यह पार्टी का दोहरा रवैया है। कांग्रेस को युवा और अनुभवी लोगों के बीच भाजपा जैसा तालमेल बिठाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र हो। 

बृजेश माथुर | गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

 

बकवास फिल्में

बॉलीवुड पर लेख में बहुत सही विषय उठाया गया है। “कड़वी हकीकत, वॉर मूवी में धार नदारद” (4 अक्टूबर) में बिलकुल सही कहा गया है कि अब वॉर के नाम पर दर्शकों की भावनाओं पर वार होता है। भुजः द प्राइड ऑफ इंडिया देख कर इतनी निराशा हुई कि क्या कहें। कुछ लोगों को इस फिल्म को देख कर लगा कि वे थिएटर नहीं गए, ओटीटी पर देखी इसलिए यह घाटे का सौदा नहीं है। लेकिन ऐसे लोग भूल जाते हैं कि ओटीटी के सबस्क्रिप्शन में पैसे लगते हैं, जो डेटा वो खर्च कर रहे हैं, वह भी मुफ्त नहीं मिलता और सबसे कीमती वो समय है, जो ऐसी बकवास फिल्मों पर खर्च हो रहा है।

मीनाक्षी भारद्वाज | हिसार, हरियाणा

 

रुटीन इंटरव्यू

उत्तराखंड में इतनी आसानी से मुख्यमंत्री बदल जाते हैं कि पता ही नहीं लगता। इतनी जल्दी तो लोग टीवी का चैनल भी नहीं बदलते। पुष्कर सिंह धामी का इंटरव्यू (4 अक्टूबर) पढ़ा। ऐसा ही इंटरव्यू तीरथ सिंह रावत का था। उससे पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत भी यही सब कहा करते थे। उन्होंने भी कहा था सब ठीक चल रहा है। सबका सहयोग मिल रहा है। लेकिन एक दिन अचानक उनकी छुट्टी हो गई। जब सब ठीक चलता है या सबका सहयोग मिलता है, तो फिर इन्हें बदल क्यों दिया जाता है। इस तरह के रुटीन इंटरव्यू बिलकुल मजा नहीं देते। पाठक भी समझते हैं कि जो ये कह रहे हैं, वह कहना उनकी मजबूरी है क्योंकि बेचारे ये तो कह नहीं सकते कि मुझे खुद ही नहीं पता कि कल मैं रहूंगा या नहीं। किसी भी कानून या नीति से जुड़े सवाल का हर राजनेता के पास एक रटा-रटाया जवाब होता है कि एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई है। उसके बाद कभी पता नहीं चलता कि उस उच्चस्तरीय कमेटी ने क्या किया और उसके परिणाम क्या रहे। और जिसे उच्चस्तरीय कहा जा रहा है, वह उच्चस्तरीय क्यों है। खैर, धामी टिक जाएं हम तो यही चाहेंगे, ताकि हमारे राज्य में कुछ तो स्थिरता हो।

भरत कुमार रावत | देहरादून, उत्तराखंड

 

सियासी बदलाव

4 अक्टूबर के अंक में, “ताकि कमान ढीली न पड़े” में आपने लिखा है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्यों में अपनी पकड़ दुरुस्त करने की प्रक्रिया में मुख्यमंत्री बदले हैं। इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता। राजनैतिक हलकों में तो इस तरह की बातें चलती ही रहती हैं। यह रिपोर्ट लिखने के बाद चूंकि पंजाब में फेरबदल हुआ इसलिए इसमें उसका जिक्र नहीं है। लेकिन यदि इस लेख के विश्लेषण के हिसाब से देखा जाए, तो क्या कांग्रेस ने भी अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ही नवजोत सिंह सिद्धू के कहने पर कैप्टन अमरिंदर सिंह को नहीं बदल दिया? लेकिन इससे कांग्रेस ने राज्य में खुद को कमजोर ही किया है। कोई कितना भी कहे कि दलित को मुख्यमंत्री बनाना कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक है लेकिन जनता अमरिंदर सिंह का अपमान भी देख रही है और समझ भी रही है। इसी तरह भाजपा शासित जिन राज्यों में मुख्यमंत्री बदले गए हैं, वो सियासी बदलाव हैं, इसमें कोविड का ठीकरा किसी दूसरे के मत्थे फोड़ने जैसा कुछ नहीं है। दूसरी लहर में जो हुआ वो किसी भी सरकार के बूते के बाहर था। कोई भी सरकार होती, वो इतने लोगों को सुविधा नहीं दे पाती। भारत की जनसंख्या इसमें रोड़ा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने ऑक्सीजन के नाम पर जो खिलवाड़ किया, उस पर तो मीडिया चुप्पी साधे बैठा है। केजरीवाल ने मांग से भी ज्यादा ऑक्सीजन मांगी और फिर उसकी कालाबजारी की। लेकिन मुफ्त पानी और बिजली के लालच में फिर भी उसे वोट मिलेंगे। जनता भूल जाएगी कि दिल्ली में मुख्यमंत्री की वजह से कितनी तबाही हुई। यह केवल मोदी सरकार की विफलता नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा होता तो सुपर पावर अमेरिका में भी लोगों की मौत कोविड के कारण हो रही है और वहां भी लोगों को अस्पताल में जगह नहीं मिल रही है।

सुरेश जाधव | नंदुरबार, महाराष्ट्र

 

लीपापोती भर

4 अक्टूबर के अंक में, “ताकि कमान ढीली न पड़े”  पढ़ कर लगा कि कांग्रेस का बचाव करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सभी लोग देख रहे हैं कि कांग्रेस खुद अपनी स्थिति सुधारना नहीं चाहती है। क्या वजह है कि पार्टी अब भी राहुल गांधी को ढो रही है। अब वक्त आ गया है कि कमान पूरी तरह से प्रियंका गांधी के हाथ में दे दी जाए। अभी भारतीय जनता पार्टी अपने ही राज्यों में कमजोर पड़ रही है। कांग्रेस को इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। गुजरात और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बदलने से भी भाजपा को बहुत फायदा नहीं होगा। लेकिन कांग्रेस का जब तक आम जनता से जुड़ाव नहीं होगा तब तक पार्टी की जीत सुनिश्चित नहीं की जा सकती। लंबा अरसा हो गया है, कांग्रेस गांव-देहात के लोगों के बीच से गायब हो गई है। लोगों के दिल में कांग्रेस को दोबारा बसाने का काम सिर्फ और सिर्फ प्रियंका गांधी ही कर सकती हैं।

लीना मल्होत्रा| रायबरेली, उत्तर प्रदेश

 

मेहनत का नतीजा

“ताकि कमान ढीली न पड़े” (4 अक्टूबर) बहुत संतुलित लेख है। भारतीय जनता पार्टी अभी कई मुद्दों पर बुरी तरह फंसी हुई है। भाजपा शासित अलग-अलग राज्यों की स्थिति का इसमें अच्छा आकलन किया गया है। मुख्यमंत्री बदलना ही यदि समाधान होता, तो पंजाब में भी कांग्रेस की स्थिति संभल गई होती। भाजपा ने तो बस अपने जख्मों की पट्टी बदली है। लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी भूल रही है कि सिर्फ पट्टी बदलने से जख्म नहीं भरा करते। जिस तरह भाजपा के हाथ से राजस्थान और छत्तीसगढ़ फिसला है, उसी तरह उसके हाथ से उत्तर प्रदेश भी जाने वाला है।

शांतिलाल जैन | कवर्धा, छत्तीसगढ़

 

पुरस्कृत पत्र

वाकई दंगल

भारत में क्रिकेट और बॉलीवुड सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाला क्षेत्र है। लगभग हर युवा चाहता है कि यदि वह खिलाड़ी बने तो क्रिकेट ही खेले। ऐसे ही आजकल छोटे शहरों के युवा भी चाहते हैं कि अभिनय के क्षेत्र में जाएं। ऐसा सोचने वालों की मंजिल मुंबई होती है। कारण कि दोनों ही क्षेत्रों में पैसा बरसता है। 18 अक्टूबर की आवरण कथा यूं तो रोहित शर्मा और विराट कोहली के बीच होड़, कप्तानी और टीम इंडिया पर इसके असर की है, लेकिन इसके शीर्षक में दंगल शब्द ने विशेष रूप से ध्यान खींचा। आइपीएल आने के बाद से ये खेल वाकई दंगल में बदल गया है। बीस-बीस ओवरों के मैच ने खिलाड़ियों का धैर्य खत्म कर दिया है। मनी मशीन- यही उनकी सच्चाई है। 

सौरभ कुलकर्णी | कोल्हापुर, महाराष्ट्र

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