संपादक के नाम पत्र

पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रयाएं
पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रयाएं

जहरीली हवा में घुटता दम

आउटलुक के 27 दिसंबर के अंक में प्रदूषण का ज्वलंत मुद्दा उठाया गया है। यह सच है कि प्रदूषण के नाम पर चर्चा सिर्फ दिल्ली-एनसीआर या चंद बड़े शहरों की होती है। हकीकत तो यह है कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, बिहार समेत कई राज्यों के अनेक शहर पूरे साल जहरीली हवा की चपेट में रहते हैं। वहां लोग तमाम बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं, लेकिन उनके बारे में कभी कोई बात करने तक की जहमत नहीं उठाता। जैसा कि लेख में बताया गया है, झरिया तो सौ साल से झुलस रहा है। सरकारों को कुछ करना होता तो अब तक कर चुकी होतीं। बेहतर यही होगा कि लोग पर्यावरण को बचाने की पहल करें।

राजेंद्र कुमार | धनबाद, झारखंड

 

नजरअंदाज होतीं बोलियां

आउटलुक के अनूठेपन का जवाब नहीं। यह एक बार फिर साबित हुआ। क्या किसी खबरिया पत्रिका से अपेक्षा रखी जा सकती है कि वह बोली और भाषा की महत्ता बताने वाले लेख छापेगी? भारत में भाषा से भी ज्यादा महत्व बोली का है, (बोली की महत्ता बताने वाली जिज्जी, 27 दिसंबर) लेकिन इसके महत्व को कोई नहीं समझ सका है। इस लेख में कितना सही लिखा गया है कि “भाषा का मतलब शुद्ध उच्चारण और मानक प्रयोग से कहीं ज्यादा है।” वाकई ऐसा है लेकिन कोई इस पर ध्यान नहीं देता। इस लेख की एक और बात ने प्रभावित किया कि “बच्चों पर इसका दबाव नहीं होना चाहिए।” हम बच्चों की शिक्षा के लिए मातृभाषा की बात करते हैं, लेकिन बोलियों को अक्सर नजरंदाज कर देते हैं। ग्रामीण परिवेश में पल रहे बच्चे अपनी स्थानीय बोली में ही सहज रहते हैं लेकिन हमारी शिक्षा पद्धति है कि बच्चों को आर-ए-टी रैट और एम-ए-टी मैट पढ़ाने से ही फुर्सत नहीं पा रही है। सभी पर अंग्रेजी का भूत सवार है। मीडिया या जहां कहीं देखो यही समझाया जा रहा है कि अंग्रेजी रोजगार की भाषा है, ताकत की भाषा है। ऐसे में बच्चे सिर्फ रट रहे हैं और उनकी समझ हर दिन घट रही है।

ऋतु सारस्वत | भिलाई, छत्तीसगढ़

 

पिछड़ी नहीं है बोली

मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि बोली और भाषा की बहस ने हिंदी का जितना अहित किया है, वह अंग्रेजी के प्रसार के कारण हुए ‌अहित से कम नहीं है। अंग्रेजी का अपना महत्व है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन अंग्रेजी को भाषा से ऊपर उठा दिया गया और बोली को एकदम पिछड़ा बना दिया गया है। ऐसा नहीं कि स्कूल ही चाहते हैं कि बच्चे स्थानीय बोली के बजाय मानक हिंदी या अंग्रेजी बोलें। ऐसा सोचने वाले माता-पिता की तादाद भी कुछ कम नहीं है। माता-पिता भी बच्चों के साथ, “काउ को रोटी खिला दो”, “टाइगर फॉरेस्ट में रहता है”, “डोर लॉक करो” जैसी भाषा बोलते हैं। यही वजह है कि जो बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी नहीं बोल पाते, उन पर स्कूल में प्रवेश के साथ ही मानक हिंदी भाषा के इस्तेमाल का दबाव शुरू हो जाता है। बच्चे फल या सब्जी का स्थानीय नाम बेहतर तरीके से याद कर पाते हैं, क्योंकि वे इसे लगातार सुनते रहते हैं। लेकिन फिर भी ‘बनाना, एप्पल और ग्रेप्स’ के साथ ‘कैबेज, पोटेटो और टोमेटो’ के बीच उनका स्थानीय ज्ञान दब जाता है। इसे सुधारने के लिए पहले माता-पिता को सोच बदलनी पड़ेगी, उन्हें स्थानीय भाषा में बोलने में शर्म महसूस न हो यह आदत डालती होगी।

रेवाराम शास्त्री | श्रीगंगानगर, राजस्थान

 

शुद्धतावादी रवैया

आउटलुक के नए अंक में भाषा और बोली के बारे में पढ़ा। (बोली की महत्ता बताने वाली जिज्जी, 27 दिसंबर) अच्छा लेख है। हम भारत के लोग हर क्षेत्र में शुद्धतावादी रवैया अपनाते हैं। हमारी भाषा भी इससे अछूती नहीं है। स्थानी बोली का कोई शब्द या वाक्य बोलने पर व्यक्ति को गंवार समझ लिया जाता है। यही वजह है कि स्कूलों और कॉलेजों पर भी शुद्ध उच्चारण सिखाने और पढ़ाने का दबाव आ जाता है। किसी भी फिल्म में यदि किसी पात्र या चरित्र को भदेस दिखाना होता है, तभी वह पात्र किसी स्थानी बोली या भाषा बोलते नजर आता है। कोई भी पढ़ा या सभ्य पात्र फिल्मों या धारावाहिक में ऐसा करते नजर नहीं आता। पुष्पा जिज्जी अपनी स्थानीय भाषा में बोलती जरूरी हैं लेकिन यह सोचने वाली बात है कि वे भी बात राजनीति की ही करती हैं। सरकार के काम पर तंज ही करती हैं। इससे वो क्या बोल रही हैं, दर्शकों का ध्यान उस ओर जाता है न कि वे किस भाषा में बोल रही हैं उस पर। ऐसे और भी लोग हो जाएं और स्थानीय बोली को महत्व देने लगे, तो हो सकता है कि परिदृश्य बदले।

श्रीलेखा जोशी | इंदौर, मध्य प्रदेश

 

राज्य नेतृत्व जिम्मेदार

आत्मकेंद्रित सत्ता और बिहार की जनता की दुर्दशा के आंकड़े दिल दहला देते हैं। नए अंक (27 दिसंबर) में बहुआयामी गरीबी सूचकांक में बिहार का अव्वल होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं लगी। जहां स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर पर कभी काम ही ना हुआ, वहां राज्य की यही हालत होगी। राज्य की सत्ता में बैठे लोग भी यह जानते हैं, लेकिन कुछ करना नहीं चाहते। जीवन स्तर में गिरावट बहुत सी बातों से दर्ज होती है। इन सब में बिहार अव्वल है यानी किसी भी क्षेत्र में किसी भी सरकार ने काम करने की कोशिश नहीं की। जबकि सरकार का पहला दायित्व है कि पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में नागरिकों को बेहतर सुविधा दे। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र जी की करतूतें शर्मसार कर गईं। ‘विश्वविद्यालय नहीं घोटालों का अड्डा कहिए’ पढ़ कर लगा कि शिक्षा के मंदिर का यही स्तर है और वहां इतने गोरखधंधे हैं, तो छात्रों का भविष्य अंधकारमय ही होगा। मनीष जी ने देवास शहर का चित्र कविता की तरह व्यक्त किया। रवीना टंडन का अच्छा साक्षात्कार है। सवाल और जवाब दोनों ही रोचक हैं। खास तौर पर वह सवाल, जिसमें पहले वाली मस्त गर्ल रवीना और आज नेटफ्लिकस पर आ रही अरण्यक की रवीना के बीच अंतर वाला। जवाब और भी अच्छा लगा कि कलाकार के लिए कंफर्ट जोन उचित नहीं है।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

खराब प्लानिंग

आउटलुक के नए अंक (27 दिसंबर) में ‘भारतवंशियों का बढ़ता दबदबा’ पढ़ कर लगा कि हम भारत के लोग युवाओं को पढ़ा ही इसलिए रहे हैं कि वे आगे जाकर किसी अमेरिकी कंपनी की कमान संभाले और उस देश को आगे ले जाएं। जिस दिन भारत के पराग अग्रवाल को माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर की कमान मिली उसी दिन लोकसभा में केंद्र सरकार ने जानकारी दी कि पिछले पांच सालों में छह लाख से अधिक भारतीयों ने नागरिकता छोड़ दी है। सितंबर 2021 में एक लाख से अधिक भारतीयों ने नागरिकता छोड़ दी थी। यह चिंता की बात होनी चाहिए कि भारतवासी उज्ज्वल भविष्य के लिए विदेश जाना पसंद करते हैं। हमारे यहां नफरत की राजनीति जोर पकड़ रही है और ऐसे में जो युवा इसमें फंसना पसंद नहीं करते वो देश छोड़कर अपनी नई राह बना लेते हैं। बाकी युवा नफरत की राजनीति को ऐसे ही किसी सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाने में व्यस्त हैं। भारत की खराब प्लानिंग का ही नतीजा है कि आजकल मध्य आय वर्ग का परिवार भी चाहता है कि उसका बच्चा लंदन, न्यूयार्क, कनाडा जैसे किसी देश की नागरिकता ले ले। सरकार को समझना पड़ेगा कि सिर्फ ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोसता हमारा’ बोल लेने भर से ही भारत अच्छा नहीं बन जाता।

वीरेंद्र बहादुर सिंह | नोएडा, उत्तर प्रदेश

 

निष्पक्ष छवि

लोकप्रिय पत्रकार विनोद दुआ का निधन पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी पहचान न केवल बेबाक और निष्पक्ष पत्रकार के रूप में थी, बल्कि वे नेताओं से ऐसे सवाल भी पूछ लेते थे, जो अमूमन पत्रकार नेताओं से नहीं पूछते। दूरदर्शन के जमाने में लोकसभा, विधानसभा के चुनाव परिणामों को वे बड़े बेबाक और रोचक ढंग से पेश करते थे। पत्रकारिता पर उनकी निष्पक्ष छवि को साफ देखा जा सकता था। आउटलुक में उन पर बहुत कम सामग्री दी जबकि वे इससे ज्यादा के हकदार थे।

हेमा हरि उपाध्याय | उज्जैन, मध्य प्रदेश

 

कानून वापसी से कुछ नहीं होगा

पिछले अंक में (कानून वापसी का लाभ कितना, 13 दिसंबर) आपने लिखा कि “इस सियासी कयास को शायद ही कोई बेदम माने कि कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा की बड़ी वजह चुनावी हो सकती है। केंद्र और उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा जानती है कि 2024 का आम चुनाव जीतने के लिए 2022 में यूपी जीतना जरूरी है।” उत्तर प्रदेश में सियासी फायदे के लिए ऐसा किया गया है यह तो निश्चित है। लेकिन सिर्फ कृषि कानून को लेकर ही भाजपा के खिलाफ माहौल नहीं है। उत्तर प्रदेश में वाकई अपराध बहुत बढ़ गए हैं और इसकी कहीं कोई सुनवाई भी नहीं है। प्रधानमंत्री भले मान लें कि कृषि कानून वापस लेने से उन्हें उत्तर प्रदेश में कम नुकसान होगा लेकिन हकीकत यही है कि हम जैसे नौकरीपेशा भी त्रस्त हैं। काशी में विकास के नाम पर विनाश किया गया है। पुरानी धरोहर को नष्ट कर किसी एक मंदिर का प्रांगण बड़ा कर देना कहां की समझदारी है। उन्हें लगता है कि गंगा में डुबकी लगा लेने से उन्हें वोट मिल जाएंगे, तो वे गलत सोचते हैं।

रेवाराम डहेरिया | बनारस, उत्तर प्रदेश

 

तेल और तेल की धार

13 दिसंबर के अंक में ‘कानून वापसी का लाभ कितना’ में अच्छा विश्लेषण किया गया है। कुछ लोगों का मत है कि इससे प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचेगा। लेकिन सच्चाई तो यह है कि इससे प्रधानमंत्री की छवि और भी निखरी है। जो लोग अब तक उन पर तानाशाह होने का टैग लगाते थे, उन्हें इससे पीड़ा हुई होगी। देश के प्रधानमंत्री होने के बाद भी वे लोगों के सामने झुके, कानून वापस लिए और अपील की कि देश में सौहार्द बना रहे। मोदी जानते हैं कि उन्हें कब क्या करना है। कृषि कानून की वापसी के लिए भी उन्होंने सिखों के पवित्र त्योहार गुरुपरब का दिन चुना। यह कम बड़ी बात नहीं है। हो सकता है यह निर्णय भारतीय जनता पार्टी के लिए उतना लाभदायक न हो पर यह देश के लिए लाभदायक है। क्योंकि कृषि कानून के विरोध की आड़ में देश विरोधी खलिस्तानी ताकतें सिर उठाने लगी थीं। खलिस्तानियों की वजह से पहले सिर्फ पंजाब ही जल रहा था लेकिन यदि किसान के नाम पर बैठे ये लोग कुछ दिन और टिक जाते तो पूरा देश जलता। पार्टी से ऊपर देश हित के बारे में सिर्फ मोदी सोच सकते हैं। रही उत्तर प्रदेश के चुनाव की बात, तो मोदी जादूगर हैं और उनका जादू आज भी कायम है।

प्रफुल्ल गुप्ता | बरेली, उत्तर प्रदेश

 

पुरस्कृत पत्र

जनता की जीत

‘कामयाब आंदोलन की नजीर’ (13 दिसंबर) इस अंक का सबसे अच्छा लेख है। सरकार ने मनमाने ढंग से इस कानून को लागू करने की कोशिश की थी, लेकिन किसानों ने बता दिया कि अहिंसा के जरिये कैसे अपना हक लिया जाता है। जब कोरोना से पूरा देश त्रस्त था, तब ये कानून अध्यादेश के रूप में आए थे। सरकार ने हर आवाज को अनसुना किया। लेकिन अंततः जीत जनता की ही हुई। सरकार के यू-टर्न पर जाहिर सी बात है वे लोग तो निराश होंगे ही जो सरकार की ढपली बजा रहे थे। चुनाव जीतने के लिए सरकारें कुछ भी कर सकती हैं। केंद्र सरकार नहीं चाहती कि सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश उनके हाथ से निकले। अब कोई भी सरकार फैसला थोपने से डरेगी।  

हरीश माथुर | दिल्ली

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