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संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आईं पाठकों की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रयाएं

ओटीटी का दम

आउटलुक का ताजा अंक, (20 सितंबर) ‘मुंबई में मनोज बा’ ताजा हवा के झोंके की तरह आया। हर तरफ चल रहे तनाव और आतंक की खबरों के बीच, मनोज बाजपेयी के बारे में जानना अच्छा लगा। फैमिली मैन वाकई अच्छी सीरीज है और उसमें मनोज ने कमाल का अभिनय किया है। यदि कोई और कलाकार उनकी जगह होता, तो शायद यह सीरीज उतनी लोकप्रिय नहीं होती। वे एक्टिंग नहीं करते बल्कि हर दृश्य को जीते हैं। लगता है कि वे वाकई श्रीकांत तिवारी हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म की वजह से ही हम ऐसे अभिनेताओं को देख पा रहे हैं, जिन्हें तथाकथित बॉलीवुड डाउन मार्केट हीरो समझता है। बड़े फिल्म निर्माताओं को अब समझ लेना चाहिए कि दर्शकों को उनकी रोमांटिक फिल्मों से ज्यादा वास्तविक अभिनय देखने में दिलचस्पी है।

सुधा जाटव | ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

ओटीटी को गंभीरता से लें

20 सितंबर की आवरण कथा के लिए आउटलुक को जितना धन्यवाद कहा जाए कम है। बॉलीवुड प्रतिभाओं की खान नहीं बल्कि प्रतिभाओं का कब्रिस्तान है। यहां प्रतिभाओं को मारने का काम किया जाता है और परिवारवाद को बढ़ावा दिया जाता है। ओटीटी आने के बाद पता चल रहा है कि माया नगरी में कितने हीरे दबे हुए थे। ये नया माध्यम न सिर्फ इन्हें खोज रहा है, बल्कि तराश भी रहा है। इस लेख का शीर्षक भी बिलकुल सटीक है, ‘प्रतिभा की पनाहगाह।’ जितनी भी सीरीज इन दिनों विभिन्न ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आ रही हैं, वे सब एक से बढ़ कर एक हैं। इनमें कहानी कहने का सिर्फ ढंग ही नया नहीं है बल्कि उसका प्रस्तुतीकरण भी कसा हुआ रहता है। दर्शकों को उत्सुकता रहती है कि आगे क्या होगा। अब भारतीय दर्शकों को सिनेमाघरों की जरूरत नहीं रह गई है। यह भी अच्छा रहा कि लंबे समय तक सिनेमाघर बंद रहे, जिससे ओटीटी को पैर जमाने की जगह मिल गई। कोई कितना भी कहे कि सिनेमा का कोई विकल्प नहीं पर इन हालात को देख कर लगता है कि दर्शकों को देखने की जो भूख है, वो ओटीटी सिर्फ शांत ही नहीं करती, बल्कि तृप्ति देती है। हर बड़े निर्माता-निर्देशक को चाहिए कि इस मंच को गंभीरता से ले। और रही सुपर स्टार की बात, तो सलमान, शाहरुख, आमिर को भूल जाइए। हमारे लिए तो मनोज बाबू ही काफी हैं।

कनुप्रिया पाठक | बरेली, उत्तर प्रदेश

 

विनम्र कलाकार

असली कलाकार वही है, जिसमें विनम्रता हो। अब तक भारतीय दर्शक सिर्फ अक्खड़ सुपर सितारों को देखते आए थे, उनके बारे में ही जानते आए थे। आउटलुक ने असली सुपर स्टार से परिचय कराया। बिहार के इतने छोटे गांव से निकल कर मायानगरी में अपनी पहचान बनाने वाले मनोज बाजपेयी को सौ सलाम भी कम हैं। इसके बाद भी वे कहते हैं कि मैं ‘सिर्फ और सिर्फ एक्टर हूं, न किंग, न सुपरस्टार’ (20 सिंतबर)। यह है असली सितारा जो इतना पा लेने के बाद भी खुद को सिर्फ अभिनेता मान रहा है। वर्ना बॉलीवुड में एक फिल्म हिट हो जाने पर लोगों का दिमाग आसमान पर पहुंच जाता है। मनोज बाजपेयी में इतनी विविधता है कि खान बंधु उनके आसपास भी नहीं पहुंच पाएंगे।

कहकशां कुरैशी | जामनगर, गुजरात

 

मौके के बजाय धोखा

आउटलुक के 20 सितंबर अंक में लेख, ‘ओटीटी: प्रतिभा की पनाहगाह’ पढ़ी। फिल्मों की संख्या के हिसाब से भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है। लेकिन भाई-भतीजावाद और कई कैंप में बंटे होने के कारण नए कलाकरों के लिए यहां बिना गॉडफादर पैर जमाना लगभग नामुमकिन है। ऐसे में उभरते कलाकारों को ओटीटी प्लेटफॉर्म वैसे ही मौके दे रहा है, जैसे क्रिकेटरों को आइपील और नेताओं को क्षेत्रीय दल देते हैं। अच्छाई के साथ-साथ ओटीटी के कुछ बुरे पहलू भी हैं। प्रभावी नियंत्रण के अभाव में ओटीटी धीरे-धीरे अश्लीलता और पोर्न का केंद्र बनता जा रहा है। मौका देने के नाम पर महिला कलाकारों का उत्पीड़न हो रहा है। ओटीटी पर पोर्न के प्रसार में फिल्म उद्योग के नामी-गिरामी लोगों की संलिप्तता भी विचलित करती है। अगर समय रहते ओटीटी पर पोर्न का प्रसार नहीं रोका गया तो ये कलाकरों के लिए मौके के बजाय धोखे का माध्यम बन जाएगा।

बृजेश माथुर | गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

 

प्रोत्साहन मिले

इस बार का ओलंपिक हर लिहाज से अच्छा रहा। ‘गोल्डन ब्वॉय मगर नजर अब भी पेरिस पर’ (20 सितंबर) पढ़ कर अच्छा लगा कि गांवों से प्रतिभा निकल रही हैं और देश का नाम रोशन कर रही हैं। ओलंपिक और पैरालंपिक में देश के लिए पदक जीतकर नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को सरकार की तरफ से धनराशि के साथ सम्मान और नौकरी भी दी जा रही है। खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए ये अच्छा कदम है। सरकार को कॉमनवेल्थ गेम, एशियाड, ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं के साथ राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भी झंडा बुलंद करने वाले खिलाड़ियों को विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, माध्यमिक, उच्च माध्यमिक, नवोदय, केंद्रीय विद्यालयों में खेल शिक्षक (प्रशिक्षक) के रूप में स्थायी नियुक्ति देनी चाहिए ताकि खेलों में दक्ष और प्रतिभावान बच्चों को परख कर ये शिक्षक तराश सकें। चाहे पदक विजेता हो या पदक न पाने वाले खिलाड़ी, इनके अनुभव, संघर्ष, खेल में ऊंचाई पाने की बारीकियां और इनकी क्षमता का सही दोहन शिक्षण संस्थानों में किया जाना चाहिए। उम्र बढ़ने के साथ इन खिलाड़ियों के लिए नौकरी की भी व्यवस्था करनी चाहिए। विद्यालयों और कॉलेजों की आने वाली पीढ़ी को मार्गदर्शन मिलेगा, तो आने वाले साल हमारे लिए और अच्छे होंगे। इससे निश्चित ही पदकों की संख्या बढ़ेगी।

हेमा हरि उपाध्याय | उज्जैन, मध्य प्रदेश

 

आज भी लोक से दूर

‘लोक’ के नाम, मगर ‘लोक’ से दूर (6 सितंबर) के अंक में कितना सही कहा है कि आजादी की तीन सिल्वर जुबली हो गई पर अपना यह तंत्र आज भी लोक से दूर है। यह बहुत ही सटीक आलेख है। इस लेख में बेहतरीन आंकड़े दिए गए हैं। सच आज भी यही है कि एक औसत भारतीय न तो अपने नागरिक भाव के सर्वोत्तम रूप को जानता है, न इस जीवन में वह उस सर्वोत्तम ढंग को कभी प्राप्त कर सकता है। एक नागरिक का पूर्ण विकास तभी संभव है, जब उसे अपने लिए आवश्यक परिस्थितियों को स्वयं ही निर्धारित करने का अधिकार दे दिया जाए। आज तो पल-पल व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का विकास करने के लिए हजार कोशिशें करनी पड़ती हैं। आम आदमी अपना लक्ष्य न प्राप्त कर ले, इसके लिए सत्ता की बाधाएं कई हैं। इसका निराकरण जरूरी है। आज की स्थिति देख कर तो बहुत निराशा होती है, पता नहीं आने वाले दिन कैसे होंगे।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

समस्त मानवता पर संकट

‘फिर तख्त पर तालिबान’ (6 सितंबर) में अफगानिस्तान के हालात पर बहुत सटीक लेख है। यह केवल अफगानिस्तान नहीं बल्कि समस्त मानवता पर संकट है। तालिबान का कब्जा बताता है कि अमेरिका की विश्व से पकड़ ढीली पड़ रही है। इसमें एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि इससे आतंकवादियों के हौसले बुलंद होंगे। उन्हें लगेगा कि दस-बीस साल लड़ कर, खून-खराबा कर सत्ता पर कब्जा किया जा सकता है। इससे आतंकी सोच वाले दूसरे संगठन भी किसी देश में ऐसा करने का प्रयास करेंगे। सभी को इस संकट से मिल कर लड़ना चाहिए।

प्रीति राज | दिल्ली

 

जीने का अधिकार

‘फिर तख्त पर तालिबान’ (6 सितंबर) लेख पढ़ कर दिल दहल गया। रक्तरंजित अतीत वाले तालिबान के भय से लोग अमेरिकी सैन्य जहाजों के पहियों पर लटक कर भाग जाने को बेहतर समझ रहे हैं, कुछ की आसमान से गिरकर मौत भी हो चुकी है। पूरा अफगानिस्तान असुरक्षा से भयाक्रांत है। जिनके पास बाहर निकलने का कोई साधन नहीं है, वे घरों में कैद हो गए हैं। कामकाजी महिलाएं घरों में कैद हो गई हैं और स्कूल-कॉलेज बंद हो चुके हैं। दशकों से विश्व की महाशक्तियों की शतरंजी चालों का केंद्र बने अफगानिस्तान में रक्तपात का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। काश! अफगानिस्तान में भी सभी को मानवीय ढंग से जीने और सोचने का हक मिले। शहरनामा में वडोदरा का वर्णन किसी शब्द चित्र जैसा है। सचमुच जब शहर को आंखों से नाप लिया जाता है, तभी उस पर ऐसा बेहतरीन लिखा जा सकता है।

संदीप पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

शांति दूतों का इंतजार

अफगानिस्तान में पिछले 40 सालों से आतंकवाद जारी है। ‘फिर तख्त पर तालिबान’ (6 सितंबर) ने तो बस फिर उसकी याद ताजा कराई है। पहले रूस ने वहां तख्ता पलट कर शासन हथियाया। रूस को वहां से खदेड़ने में अमेरिका ने आतंकवादी संगठनों की भरपूर मदद की। बाद में फौजी ताकत का इस्तेमाल और भारी धन निवेश करके अफगानिस्तान में एक तरह से कब्जा कर लिया। बीस साल तक फौज और अकूत धन के सहारे वहां टिका रहा। इस सब के बाद भी जब दाल नहीं गली तो वहां से निकलने में ही अपनी खैर समझी। लगता है बगैर पर्याप्त तैयारी के या किसी तरह के शांति समझौते के ही वहां से अमेरिका भाग खड़ा हुआ और तालिबान की सत्ता का मार्ग प्रशस्त कर दिया। अरबों डॉलर खर्च करके, घातक हथियारों का ढेर लगा कर और सैकड़ों सैनिकों को मरवा कर आखिर क्या हासिल किया अमेरिका ने? वियतनाम के बाद यह उसकी करारी शिकस्त है। उम्मीद करनी चाहिए कि इससे अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया यह सबक सीख सके कि अकूत संपत्ति और फौज की ताकत से कोई दुनिया को नहीं हांक सकता। तालिबान की पूरी तरह स्वीकार्यता न होने, कई हथियारबंद समूहों की उपस्थिति और वहां की खनिज संपदा पर दुनिया की गिद्ध दृष्टि के कारण लंबे समय तक खून-खराबे की इबारत लिखी जाती रहेगी। वहां भविष्य में क्या होगा इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

श्याम बोहरे | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

पुरस्कृत पत्र

इनका है वक्त

आउटलुक की यही खासियत है कि ये मौके की नब्ज पकड़ना जानती है। जब तालिबान संकट चरम पर था, तब तालिबान के बारे में संपूर्ण और सटीक जानकारी उपलब्ध कराई। 20 सितंबर के नए अंक में मनोज बाजपेयी के बारे में हर पहलू से जानना दिलचस्प लगा। इससे पहले कभी उनके बारे में इतने विस्तार से नहीं पढ़ा था। दरअसल बॉलीवुड मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, पंकज त्रिपाठी जैसे लोगों को छोटा कलाकार मानता है, जो सौ करोड़ नहीं कमा सकते। पहले भी बॉलीवुड का यही रवैया था। तब ऐसे सशक्त कलाकारों को चरित्र कलाकार कह कर दरकिनार कर दिया जाता था। वह तो भला हो इस नए माध्यम का की हम इन कलाकारों की असली प्रतिभा देख पा रहे हैं। अब बस ये वक्त इनका ही है।

राजुल कुलकर्णी | मुंबई, महाराष्ट्र 

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