संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आईं पाठको की चिट्ठियां
भारत भर से आईं पाठको की चिट्ठियां

नौ दिन चले

“फिर तख्त पर तालिबान” (6 सितंबर) पढ़ कर निराशा हुई। अफगानी भाई-बहनों के लिए मन भर आया। अमेरिका ने 20 साल पहले तालिबान को खदेड़ा था। लेकिन फिर नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली बात हुई। अफगानिस्तान ने जहां से शुरू किया था दोबारा फिर वहीं पहुंच गया। अमेरिका ने जिस तरह से सेना हटाई उससे तो लगता है कि अमेरिका ने थाल में सजाकर तालिबान को अफगानिस्तान सौंप दिया है। इस पर कहीं बात नहीं हो रही है कि अफगान नेशनल डिफेंस ऐंड सिक्योरिटी फोर्स तालिबानियों का मुकाबला क्यों नहीं कर पाई। यह सब ऐसे हुआ जैसे शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण होता है। सेना ने तो आसानी से हथियार डाल दिए, लेकिन अफगानी नागरिकों का क्या जिन्हें अपने देश के लोगों पर भरोसा था। अफगान के कबीलाई सरदार हमेशा से ही पाला बदलने के लिए जाने जाते थे और इस बार भी यही हुआ।

श्रीधर नागर | नागौर, राजस्थान

 

आजादी की कीमत

अफगानिस्तान के अलावा कहीं किसी बात की चर्चा नहीं है। अमेरिकी सेना की वापसी और तालिबान के दोबारा तख्त पर आ जाने से सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को नुकसान हुआ है। “गुम है रोशनी कहीं” (6 सितंबर) वहां के भयावह मंजर की केवल हल्की सी झलक देती है। वहां जो होगा उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। महिलाएं प्रभावित होंगी, तो यकीनन उसका असर बच्चों पर आएगा। अभी-अभी तो अफगानी महिलाओं ने खुली हवा में सांस लेना शुरू किया था कि फिर उनका दम घोंटा जाने लगा। ऐसा क्यों है कि पूरा विश्व एकजुट होकर इनके खिलाफ नहीं होता। वैश्विक स्तर पर राजनीति हो या स्थानीय स्तर पर निशाने पर हमेशा महिलाएं होती हैं। हर लेख में बुर्खे की वापसी को ऐसे लिखा जा रहा है, जैसे यह कोई सामान्य बात हो। जो महिलाएं फिर कैद हो गई हैं वहीं जानती हैं कि उनके लिए अब रोशनी की बातें बेमानी हैं।

माया नेगी | देहरादून, उत्तराखंड

ताकत से तख्त

आउटलुक के 6 सितंबर अंक में, “फिर तख्त पर तालिबान” पढ़ कर लगा कि तालीबान की अफगानिस्तान में वापसी महज औपचारिकता रह गई थी। यह समझ से परे है कि क्यों अमेरिका बिना किसी शर्त अफगानिस्तान से अपनी सेना बाहर निकालने को तैयार हो गया। पिछले कुछ दिनों से हमें काबुल हवाई अड्डे की जो तस्वीरें दिख रही हैं, वह यह समझने के लिए काफी है कि अपनी सुरक्षा को लेकर वहां कितना भय और चिंता है। हालांकि पिछले महीने दोहा में सर्वसम्मति से यह तय हुआ था कि अगर तालिबान जबरन ताकत से अफगानिस्तान पर कब्जा करने की कोशिश करेगा तो ऐसी स्थिति मे कोई भी उसके साथ नहीं खड़ा होगा और इसका विरोध करेगा। लेकिन अब पाकिस्तान और चीन दोनों तालिबान का खुले तौर पर समर्थन करते दिख रहे हैं। यह दुखद है कि अपने साथी देशों के लोगों को बचाना तो छोड़ो, अमेरिका अपने लोगों को देश वापसी कराने में सक्षम नहीं दिख रहा। पहले ही हम प्रतिरोधी पड़ोसी पाकिस्तान और चीन से घिरे थे। अब तालिबान के रूप में एक और समस्या हमारे सामने आ गई है। अपने देशवासियों को वहां से वापस लाने के बाद हमें इस समस्या को गंभीरता और चतुराई के साथ देखना होगा। अफगानिस्तान ने पिछले दो दशकों में जो भी तरक्की की थी शून्य हो गई है। हमें तालिबान के उस नरम दृष्टिकोण पर नहीं जाना चाहिए जो उन्होंने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाने की कोशिश की है। उनका असली चेहरा जल्द ही दुनिया के सामने आएगा।

बाल गोविंद | नोएडा, उत्तर प्रदेश   

चर्चा से आगे

हर जगह सिर्फ और सिर्फ तालिबान की चर्चा है। लेकिन क्या सिर्फ चर्चा करने से वहां के हालात सुधर जाएंगे? 6 सिंतबर के अंक में तालिबान के कई पहलूओं पर चर्चा की गई है। हर दिन मीडिया में वहां के संकट के बारे में नई-नई खबरें और जानकारियां आ रही हैं। लेकिन इस बीच प्रथम दृष्टि की स्पष्टता ने प्रभावित किया। “किसका अफगानिस्तान” में सही सवाल उठाए गए हैं कि आखिर ये किसका अफगानिस्तान है। क्योंकि यदि ये अवाम का नहीं है, तो फिर किसी का नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा होता तो काबुल एअरपोर्ट पर विमानों के पीछे बदहवास भागती भीड़ का मंजर नहीं दिखता। वो मंजर ही बताता है कि वहां की अवाम तालिबान की वापसी से किस कदर खौफजदा है। अब पूरे विश्व को अमेरिका को सुपरपावर कहना बंद कर देना चाहिए। जो पिछले दो दशकों में अपनी तमाम सैन्य शक्तियों की मौजूदगी के बावजूद वहां सामान्य स्थितियां बहाल करने में नाकाम रहा वो भला कैसा सुपरपावर?

चांदमल वाधवानी | जयपुर, राजस्थान

 

बढ़ेगा भारत का तनाव

अफगान संकट से पाकिस्तान पर गहरा असर पड़ेगा। यदि वहां के हालात गड़बड़ाएंगे, तो भारत का तनाव बढ़ जाएगा। पूरी उम्मीद है कि भारत में फिर आतंकी हमले शुरू हो जाएं। अफगानिस्तान में हालात और बिगड़ने पर अस्थिर पाकिस्तान में और संकट आ सकता है। पाकिस्तान पहले से ही बहुत समस्याग्रस्त है। यहां सीमाई इलाकों में अफगान युद्ध का और बुरा असर होगा। भारत को हर पल सावधान और सचेत रहना चाहिए। खबरें बताती हैं कि मई से पाकिस्तान में आतंकी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांत के सीमाई इलाकों में दो महीने में ही 167 आतंकी हमले हुए हैं। ऐसे में इस संकट से निपटने के लिए भारत को अतिरिक्त मेहनत करनी होगी। सीमा की बाड़बंदी से लगता नहीं कि घुसपैठ पूरी तरह रुक पाएगी। अफगान संकट का दूसरा पहलू शरणार्थी के रूप में भी सामने आएगा। अब देखना है कि भारत इस स्थिति को कैसे संभालता है।

पार्थ कुलकर्णी | मुंबई, महाराष्ट्र

गरिमा पर जोर

आउटलुक के 23 अगस्त के अंक की आवरण, “पसरता पोर्न” पर कुछ बातें साफ होनी थीं। जैसे यह अत्यंत निजी मामला है जो, मानव जाति की निरंतरता के लिए आवश्यक है। विवाह का उद्देश्य भी यही है कि स्त्री-पुरुष अपराध बोध से मुक्त हों और मानव जाति और अपने जीवन को सुखमय तरीके से आगे बढ़ाएं। पोर्न को इसके ठीक विपरीत माना जाता है। पोर्न वह है जो, यौन संबंधों के सौंदर्य, आनंद, प्रतिबद्धता आदि को खत्म कर अपराध बोध देता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है। क्या पोर्न देखने वाले सभी लोग कुंठित हैं। या क्या पोर्न न देखने वालों में किसी में भी यौन संबंधों को लेकर कुंठा नहीं है। पोर्न देखना कुंठित होना नहीं है लेकिन पोर्न की उत्पत्ति कुंठित यौन इच्छाओं की वजह से ही हुई है। बस इसका खतरा यह है कि यह इस क्रिया को न समझने वालों तक पहुंच रहा है। जो लोग ऐसे संबंधों की गरिमा नहीं जानते या ऐसे नाबालिग जिन्हें अभी इसे जानने की जरूरत नहीं है, वहां तक पोर्न ने घुसपैठ कर ली है। पोर्न ने उद्योग का रूप ले लिया है, जो नैसर्गिक भावनाओं को कुचलकर कुंठित यौन इच्छाओं और गतिविधियों को जन्म दे रहा है। भावनाएं और कुंठाएं दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और इनका ये कुचक्र व्यभिचार और यौन अपराधों को जन्म देता है। गैंग रेप और खासतौर पर निर्भया जैसे वीभत्स्व यौन अपराध मोबाइल पर पसरते पोर्न की दुनिया की ही देन है।

बृजेश माथुर | गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

समाज भी दोषी

“पोर्न धंधा: गरम मसाला” आवरण कथा (23 अगस्त) आंखें खोल देने वाली है। यह गरम मसाला जिस तेजी के साथ इंटरनेट के माध्यम से फैल रहा है, वह देश की भावी पीढ़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से विकृत तथा जर्जर कर देगा। यह चिंता का विषय होना चाहिए। दुख इस बात का भी है कि राज कुंद्रा जैसे धन, साधन संपन्न लोग भी इस गंदगी से कमाई कर रहे हैं। यूं तो हम बात-बात पर हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति, नैतिक शिक्षा और जगत गुरु कहलाने पर इतराते हैं। लेकिन धन के लालच में हमारा समाज इतना अंधा हो गया है कि किसी को इसका भान नहीं है कि हम पतन की किस दहलीज पर आकर खड़े हो गए हैं। क्या केवल सभ्यता, संस्कृति, नैतिकता यह सब दिखावे की चीज बन गए हैं! हमारा समाज भी इसके लिए दोषी है। अनैतिक धंधे से कमाई करने वाले लोगों को इज्जत और सम्मान देता है। जब समाज में ऐसे खलनायकों की पूजा होगी तो नायक की कामना कैसे की जा सकती है।

हेमा हरि उपाध्याय | उज्जैन, मध्य प्रदेश

 

बेकार विपक्ष

“अब तो सारे देश में खेला” (23 अगस्त) पढ़कर वैचारिक गणित की सहज मुस्कान आती है। राष्ट्र मजबूती चाहता है और विपक्षी रियासती राजनीति का लक्ष्य केवल सत्ता है, राष्ट्र नहीं। विपक्ष सिर्फ कृत्रिम वैचारिक उत्तेजना उपजा रहा है और बेजान गठबंधन कर उलटफेर करने की सोच रहा है। विपक्ष को समझना होगा कि जनादेश के लिए जनता का साथ चाहिए होता है। यहां तो मुख्य पार्टी कांग्रेस नीति और नेता दोनों के लिए भटक रही है, शिवसेना का राजनीतिक हिंदुत्व सत्ता के लिए पिघल गया। तृणमूल नेत्री ने सत्ता के लिए भाजपा से पहले वामपंथियों फिर कांग्रेस को हिंसक रूप से ठिकाने लगाया है। बुजुर्ग पुराने कांग्रेसी नेता और कांग्रेस भंजक बन राष्ट्रवादी कांग्रेस निर्माता बने पंवार साहब की अभिलाषाओं को कौन साकार होने देगा? अवैचारिक पैबंदों की कच्ची सिलाई वाली की गेंद (फुटबाल) विंध्याचल और सतपुड़ा की तलहटी भी पार नहीं कर सकती।

अरविंद पुरोहित | रतलाम, मध्य प्रदेश

सुविधाएं जरूरी

23 अगस्त के अंक में प्रथम दृष्टि में खस्ताहाल सरकारी स्कूलों पर गजब की पैनी नजर से लेखा-जोखा दिया है। आज कई राज्यों के दस हजार से अधिक सरकारी स्कूलों की इमारतें खस्ताहाल हैं। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसइ) के आंकड़ों के अनुसार, दो चार राज्य जैसे दिल्ली, केरल, गोवा, पांडिचेरी  आदि को छोड़कर लगभग हर राज्य के सरकारी स्कूलों की इमारतें  बहुत ही बुरी दशा में हैं। स्कूल में, सीलन, बदबू न हो। कमरों में उजाला हो। साफ शौचालय हों। पानी साफ हो तो मुफ्त शिक्षा लेने से किसी अभिभावक को एतराज क्यों होगा। लाखों मां-बाप सिर्फ सफाई और साफ पानी, शौचालय के कारण सात घंटे अपने बच्चे को महंगे स्कूल में भेजते हैं।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

पुरस्कृत पत्र

संकट का हल जरूरी

“तालिबान दहशत” (6 सितंबर) कोरोनावायरस के बाद उजपी निराशा को और घना कर गया। लगता है जैसे हर जगह से उम्मीद की किरण खत्म हो गई है। इस अंक में हर अफगानी की पीड़ा की झलक थी। तालिबान ने युवाओं, महिलाओं और बच्चों के भविष्य को अंधकारमय कर दिया है। अपने देशहित में सभी को काम करना चाहिए, लेकिन अमेरिका, पाकिस्तान और चीन खुद को बड़ा दिखाने के लिए दूसरे देशों में अशांति फैलाते हैं। इस संकट की घड़ी में भारत को हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा। देखा जाए, तो केंद्र सरकार की अग्निपरीक्षा अब है। अब देखना होगा कि हमारे प्रधानमंत्री अपने भाषणों में जो राष्ट्रवाद का नाम जपते हैं, उसे कैसे अमल में लाते हैं।

सुधा यादव | बक्सर, बिहार

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