संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आईं पाठको की चिट्ठियां
भारत भर से आईं पाठको की चिट्ठियां

सख्त कार्रवाई हो

23 अगस्त की आवरण कथा, “पसरता पोर्न” में इस धंधे की कई परतें खुलीं। यह सच है कि जब से हर हाथ में स्मार्ट फोन आया है, तब से इस तरह की सामग्री की बाढ़ आ गई है। जो लोग लड़कियों की मजबूरी का फायदा उठा कर उनसे इस तरह का काम कराते हैं, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। यह किसी भी लड़की से वेश्यावृत्ति कराने जितना ही बुरा काम है। सरकार को चाहिए कि इस तरह की सामग्री के प्रचार-प्रसार पर सख्ती से रोक लगे। इसके लिए नियम कड़े करने चाहिए। जो लोग भारत में कामसूत्र की आड़ लेकर बहस की दिशा मोड़ना चाहते हैं, उन्हें तो सख्त सजा मिलनी चाहिए।

विपिन रावत | देहरादून, उत्तरांचल

 

इनके सहारे देश

आउटलुक का 23 अगस्त का अंक पढ़ कर बहुत निराशा हुई। पोर्न ने पूरी पीढ़ी को गिरफ्त में ले लिया है। पिछले अंक में राजद्रोह और यूएपीए कानून के बारे में पढ़ा था। तभी से लग रहा था कि आखिर क्यों सरकार इन कानूनों को बनाए हुए है। सरकार अपने विरोधियों को डराने के लिए इन कानूनों का इस्तेमाल करती है, तो क्या सरकार इन कानूनों से इतना घिनौना काम करने वालों को नहीं डरा सकती? सत्ता अपनी मर्जी से चलती है, लेकिन सत्ता को देखना चाहिए कि पोर्न बनाने वाले भी देश का अहित कर रहे हैं। युवा पीढ़ी इसकी गिरफ्त में आ रही है और यह देश के लिए वाकई खतरनाक है। क्या हम इसी पीढ़ी को नेतृत्व सौंपना चाहते हैं? क्या वाकई ऐसे युवाओं के सहारे देश छोड़ा जा सकता है?

बशीर अहमद | बुलंदशहर, यूपी

 

सत्ता की मनमानी ही कानून

9 अगस्त के अंक में “दहशत का फरमान” स्पष्ट संकेत है कि लोकतंत्र और आदर्श संविधान के बावजूद यूपीए, एनएसए, राजद्रोह कानून नागरिक आजादी को बंधक बना देते हैं। जो कानून न्याय न दे सके वह आजादी के लिए घातक है। सत्ता की मनमानी ही कानून होती जा रही है। कानून का दुरुपयोग करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। अंग्रेजों के समय के गुलामों को नियंत्रित करने वाले कानून से कोई जन कल्याणकारी राज्य के उद्देश्य कैसे हासिल कर सकता है? कमजोर समाज और मजबूत सरकार स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं।

श्याम बोहरे | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

 

पुरस्कृत पत्र

जनहित के मुद्दे उठाएं

“डरावना पहरा” (9 अगस्त) बताता है कि लोगों पर नजर रखी जा रही है। उनके फोन में स्पाइवेयर डाले जा रहे हैं। पहले भी सरकारें लोगों की जासूसी कराती रही हैं, तो फिर इस पर इतना हल्ला क्यों। जिन पत्रकारों का नाम इसमें हैं उन्होंने उतना हल्ला नहीं मचाया। कभी-कभी कुछ मामलों को बेवजह तूल दिया जाता है। किसी को लग सकता है कि जासूसी जैसे मुद्दे पर यह असंवेदनशील तर्क है लेकिन सरकारें अपनी सुविधा के लिए बहुत से ऐसे काम करती रहती हैं। हमें हल्ला उन बातों पर करना चाहिए जिनसे बहुसंख्यक लोग प्रभावित हों, जैसे स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा, रोजगार और महंगाई। बाकी सब मसले सियासत से जुड़े हैं।

कादिर खान | नई दिल्ली

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