संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आईं पाठको की चिट्ठियां
भारत भर से आईं पाठको की चिट्ठियां

सब राम भरोसे

14 जून की आवरण कथा और यह पूरा अंक पढ़ने के बाद महसूस हुआ कि इस संकटकाल में जागरूक और पारदर्शी विमर्श ही एक सहारा है। इस अंक में कबीर बेदी का इंटरव्यू अच्छा लगा। पीवी सिंधू ने बहुत बेबाकी से अपने विचार प्रकट किए हैं। शर्मिला टैगोर ने तो जैसे फिल्मकार सत्यजित रे को फिर से जीवंत कर दिया। मनोज कुमार झा ने गांव की बेहाल चिकित्सा के बारे में बहुत अच्छी तरह बताया है। बिहार, झारखंड, यूपी और भारत के लगभग सभी पहाड़ी गांव राम भरोसे ही हैं। मनोज जी ने, इन शोषित वंचित पीड़ित जन के देखे, सुने और भोगे यथार्थ का सच्चा हाल बयां किया है। इसे पढ़कर अपनी सुख-सुविधाओं पर सचमुच शर्म और रोना आता है। लगता है जैसे हम अपने मतलब, स्वार्थ के लिए किसी की परवाह नहीं कर रहे हैं। आउटलुक हमें आइना दिखाता है। 

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

नेतृत्व में बदलाव जरूरी

आउटलुक के 14 जून के अंक में लेख 'कांग्रेस: दिन बहुरने का कोरा इंतजार' इस बात की ओर इशारा करता है कि कांग्रेस में जब तक अत्यावश्यक बदलाव नहीं होंगे तब तक पार्टी किसी तरह के सकारात्मक परिणामों की अपेक्षा नहीं कर सकती। कांग्रेस आज भी उसके चमकीले बीते दिनों के अनुरूप ही व्यवहार कर रही है। एक जमाना था जब वह हर लोकसभा चुनाव में विजयी होती थी, बहुमत लाती थी लेकिन तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। देश की जनता की राजनीतिक समझ अलग हुई है। वह मूल्यांकन करने लगी है कि कौन उसकी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं पूरी कर सकता है और कौन सा दल अन्य दलों की तुलना में भ्रष्टाचार रहित शासन दे सकता है। देश के गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखने में कौन ज्यादा काम कर सकता है। अब जनता हर बात पर अपनी राय बनाने लगी है। पिछले 60 सालों से अधिसंख्य मतदाता कांग्रेस से जुड़े रहे। तब न प्रतिद्वंद्वी दलों का अस्तित्व था न उनका कोई प्रभाव। लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस के नेताओं को लगने लगा कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तब से पार्टी पर ग्रहण लगता गया। पश्चिम बंगाल चुनावों में पार्टी ने खुद हार चुनी। भाजपा को हराने के लिए पार्टी ने खुद अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को टीएमसी के पाले में जाने दिया ताकि टीएमसी जीते। कांग्रेस के पास एकमात्र यही विकल्प बचता है कि वह किसी सक्षम, सुयोग्य, जन अपेक्षाओं के अनुरुप और हवा का रुख समझने वाले को नेतृत्व सौंप दे।

हरिकृष्ण बड़ोदिया | रतलाम, मध्य प्रदेश

 

नींद से जागे सरकार

आउटलुक की आवरण कथा, (नई आफत, 14 जून) पढ़ते हुए लगा कि प्रकृति का यह कहर अभी खत्म होने वाला नहीं है। कोरोना का डर अब भी वैसा ही बना हुआ है और साथ में ब्लैक फंगस का डर भी समा गया है। कोरोना के इलाज के बाद ठीक हुए मरीजों में फंगस के मामले देखने को मिल रहे हैं लेकिन सरकार इसके प्रति भी कोरोना की तरह ही उदासीन बनी हुई है। तेजी से बढ़ते ब्लैक फंगस के मामले को देखते हुए सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए। लेकिन हमारे यहां होता यह है कि पहले बीमारी फैलती है, बड़ी संख्या में लोग उससे प्रभावित होते हैं उसके बाद सरकार नींद से जागती है। आपने लेख में भी लिखा है कि एम्स निदेशक का कहना है कि यह न तो नई बीमारी है और न ही यह संक्रामक है। लेकिन यह इलाज में लापरवाही के नतीजे के कारण हो रही है। तब भी सरकार ने अभी तक इसे गंभीरता से नहीं लिया है।

श्रीवत्स कुलकर्णी | नासिक, महाराष्ट्र

गांवों की दुर्दशा

आउटलुक के 14 जून के अंक में प्रथम दृष्टि में अपने हाल पर गांव पढ़ कर मन बहुत मायूस हो गया। ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाली के बारे में पढ़ कर लगा कि जब शहरों में चिकित्सा सुविधा होने के बाद भयावह मंजर था, तो फिर गांवों का क्या होगा। कोरोना काल ने भारत की स्वास्थ्य सेवाओं का भयावह रूप सामने रखा है। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह गांवों के लिए अलग स्वास्थ्य बजट आवंटित करे। यदि तीसरी लहर वहां तक पहुंची, तो यह भारत के लिए बहुत बड़ी त्रासदी होगी। अभी दूसरी लहर ने तो गांवों में सिर्फ दस्तक दी है। ग्रामीण क्षेत्र में रहने के कारण मैं जानता हूं कि यहां पैरासिटामॉल जैसी साधारण दवा भी आसानी से उपलब्ध नहीं होती। लेख में सही लिखा गया है कि कोरोना काल की भयावहता को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को जल्द से जल्द बहाल किया जाना चाहिए। क्योंकि कोई नहीं जानता कि आने वाला वक्त अपने भीतर किस तरह की कठिनाई छुपाए बैठा है। यदि हम समय रहते गांवों के लिए नहीं चेते तो कोरोना जैसी महामारियों से बेहतर ढंग से नहीं निपटा जा सकता।

पुरुषोत्तम व्यास | चूरू, राजस्थान

 

गांधी के गांव बेहाल

अपने हाल पर गांव (प्रथम दृष्टि 14 जून) भारत की स्वास्थ्य सेवा की बदहाली का आइना है। गांवों के ये हाल तब है, जब गांधी कहते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। आजादी के इतने साल बाद भी गांव वहीं के वहीं खड़े हैं। ऐसा नहीं कि इस पर बात नहीं होती। मीडिया समय-समय पर गांव की स्वास्थ्य दुर्दशा के बारे में बताता रहता है, लेकिन उसका नतीजा कुछ नहीं निकलता। भारत की दो तिहाई से ज्यादा आबादी गांवों में रहती है, फिर भी उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। कोरोना महामारी के बाद अब इस पर ध्यान देना जरूरी है। सरकार को गांवों के लिए अलग स्वास्थ्य नीति बनाना चाहिए और उस पर कड़ाई से पालन करना चाहिए।

कृति पाटीदार | मेहसाणा, गुजरात

 

अपूरणीय क्षति

सूना-सूना सा स्मृति का आंगन (14 जून) बहुत अच्छा लेख है। वाकई कोरोना महामारी के दूसरे दौर ने संस्कृति के क्षेत्र में बहुत नुकसान पहुंचाया। खस्ताहाल व्यवस्था ने हर क्षेत्र में तबाही मचाई और इसलिए कला-संस्कृति का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। कलाकारों को भी वक्त पर दवा या इलाज न मिल पाना बहुत दुखद है। बरसों की मेहनत के बाद एक कलाकार, संस्कृतिकर्मी तैयार होता है। वह समाज से जितना लेता नहीं, उससे ज्यादा वह समाज को लौटाता है। इसके बाद भी उसे अपना जीवन बचाने के लिए इतना प्रयत्न करना पड़ा।

मीनल राजपूत | कोलकाता, पश्चिम बंगाल

 

सरकार सचमुच लापता

आउटलुक का 31 मई का अंक लाजवाब था। इस अंक को पढ़ कर सिहरन हुई। क्या इसी को तरक्की और विकास कहते हैं? यदि यही विकास है, तो हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए। आवरण पर शीर्षक “लापता” इतना सटीक था कि इसके आगे कुछ कहा ही नहीं जा सकता। इस कठिन समय में भी सरकार पूरी तरह नदारद है। सरकार अपनी नाकामी अब किसी भी तरह नहीं छुपा सकेगी। इस आवरण कथा ने जैसे हर भारतीय की पीड़ा और दर्द को बयां कर दिया। इस दुख-तकलीफ के वक्त एक मंत्री, एक सासंद ऐसा नहीं था जो पीड़ितों को ढाढ़स बंधाता। ऐसा कोई परिवार नहीं था जो इस दौर में परेशान न हुआ हो। सरकार के हर दावे फेल हुए और वाकई सरकार लापता रही। इस शानदार आवरण कथा के लिए बहुत साधुवाद।

के.के. जारोलिया | मंदसौर, मप्र

 

वह भयानक मंजर

31 मई के आवरण “लापता” के लिए जितने शब्द कहे जाएं, उतने कम हैं। उस भयावह मंजर को अब दोबारा याद करने की हिम्मत भी मुझमें बाकी नहीं है। कोरोना से संक्रमित होने के बाद मैंने खुद अस्पताल में भगवान भरोसे दिन काटे हैं। मैं भाग्यशाली रही, जो घर लौट आई। मैंने अपनी आंखों के सामने लोगों को ऑक्सीजन के लिए मुंह खोले तड़पते देखा, मैंने उनके परिवार वालों को रोते, बिलखते और अस्पताल के स्टाफ के सामने गिड़गिड़ाते देखा। सरकार पर बहुत भरोसा पहले भी नहीं था। लेकिन इस तबाही के बाद मुझे लगता है कि सभी को मिल कर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देना चाहिए। इस स्थिति के बाद भी सरकार लोगों के साथ वैक्सीन को लेकर मजाक कर रही है। लोगों को पता ही नहीं चल रहा है कि वैक्सीन कहां और कैसे मिलेगी। प्रधानमंत्री के मुंह से अभी तक एक शब्द नहीं निकला है। आखिर हम ऐसे नेतृत्व के भरोसे कैसे रह सकते हैं, जो अपने देशवासियों को टीका तक दिलाने में सक्षम नहीं है।

एस. किरण | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 

सरकार की नाकामी

कोरोना महामारी की दूसरी लहर में ऐसा लगा जैसे हम किसी नाटक या फिल्म का सीन देख रहे थे। इतनी तबाही की कल्पना तो किसी ने नहीं की थी। सरकार को तो पता ही था कि दूसरी लहर आएगी। लेकिन यहां तो केंद्रीय नेतृत्व को अपना ढोल बजाने से ही फुर्सत नहीं थी। बिना जाने-समझे ही घोषणा कर दी गई कि कोरोना महामारी खत्म हो चुकी है। भारत ने विश्व को दिखा दिया है कि कोरोना पर कैसे काबू पाया जा सकता है। गाल बजाने का ही यह नतीजा है कि इतने लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। लोगों को साधारण चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध नहीं हुई। अगर वाकई सरकार में जरा भी शर्म बाकी है, तो 31 मई का “लापता” अंक पढ़ कर प्रधानमंत्री को खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए। यह अंक सरकार की नाकामी के मुंह पर तमाचा है।

शैलेन्द्र कोटवार | झांसी, उत्तर प्रदेश

 

वैक्सीन गड़बड़झाला

सरकार कितनी अदूरदर्शी हो सकती है, आज हम सब इसके गवाह हैं। जब समर के लिए कमर कसने का वक्त था, जब दूसरे देश महामारी से लड़ने के लिए वैक्सीन के इंतजाम में लगे थे तब यह सरकार अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त थी। ट्रंप की लाख बुराई हो, उनके कदमों का ही नतीजा है कि आज अमेरिका की आबादी के बड़े हिस्से को वैक्सीन लग चुकी है। एक और बात साबित हुई कि संकट के समय सरकार कभी लोगों के साथ खड़ी नहीं होती। इस महामारी में भी उसे कंपनियों का मुनाफा याद रहा, वह यह भूल गई कि बिना मुफ्त वैक्सीन के लाखों लोगों की जान जा सकती है।

शाहिद सईद | गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

 

 पुरस्कृत पत्र

दूसरी महामारी का अंदेशा

एक महामारी से जनता अभी जूझ ही रही है कि दूसरी का खतरा सिर पर आ गया है। 14 जून की आवरण कथा, ब्लैक फंगस का डरावना फंदा इस पर बहुत अच्छे तरीके से रोशनी डालती है। ब्लैक फंगस भले ही संक्रामक नहीं है लेकिन इसके लिए भी सावधानी जरूरी है। ज्यादातर राज्य सरकारें पूरी तरह लॉकडाउन हटाने के पक्ष में हैं। लेकिन अभी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। छूट से पहले कम से कम दो सप्ताह कड़ाई के साथ स्थिति की समीक्षा की जानी चाहिए और हर पल कड़ी निगरानी रखनी चाहिए। अर्थव्यवस्था उबारने से पहले लोगों की जान बचाना जरूरी है। भारत में अब संक्रमण दर कम हो रही है, लेकिन लोगों को अपने बचाव की तैयारी सबसे बुरे दौर के हिसाब से ही करनी होगी।

प्रदीप कुमार दुबे | देवास

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