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पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं
पिछले अंक पर आईं प्रतिक्रियाएं

पुरस्कृत पत्र

इन पर भी हो लेख

आउटलुक का 30 नवंबर का अंक अच्छा लगा। लेकिन चुनाव, उनके परिणाम, पार्टी की जीत-हार के गणित के साथ-साथ कुछ अन्य लेख भी होने चाहिए। हालांकि चुनाव पर पत्रिका में बहुत अच्छी और तथ्यपरक जानकारी थी। बिहार चुनाव के नतीजों ने सभी को चौंकाया, लिहाजा सभी इसके बारे में जानना चाहते थे। लेकिन जो पाठक राजनीति में रुचि नहीं रखते उन्हें चुनाव से पहले और बाद में आने वाले अंकों में पढ़ने को सामग्री कम मिलती है। आउटलुक में वैसे तो समय-समय पर स्वास्थ्य, खेल पर लेख प्रकाशित होते रहते हैं लेकिन यदि साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए नियमित कुछ सामग्री रहे, तो यह सराहनीय पहल होगी।  शिक्षा के क्षेत्र में भी कई कार्य होते रहते हैं, उन पर भी सामग्री होनी चाहिए।

कनक तिवारी |बीकानेर, राजस्थान

 

जद-यू का घटा कद

आउटलुक के 30 नवंबर अंक में, “जनादेश’20 बिहार : बिहार के बड़के भैया कौन?” पढ़ा। नीतीश की अगुवाई में राजग गठबंधन ने चुनाव तो जीत लिया मगर चिराग और भाजपा के भितरघात वाले गठबंधन ने नीतीश को हरा दिया। चिराग पासवान के कंधे पर बंदूक रख कर भाजपा ने सटीक निशाना साध कर पहले नीतीश को धराशायी किया, फिर मुख्यमंत्री बना दिया ताकि नीतीश भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के आगे नतमस्तक रहें। नीतीश के पास अब गिने-चुने दिन ही बचे हैं। दरअसल, आज की भाजपा राजनीतिक आत्मनिर्भरता चाहती है। आज की भाजपा राज्यों की सत्ता की चाबी अपने पास रखना चाहती है जिससे वह राज्यसभा में भी मजबूत हो सके। इसी एकाधिकारवादी रणनीति के तहत शिवसेना और अकाली दल जैसे सहयोगियों से अलग होने के बाद भाजपा ने अब जद-यू का कद छोटा कर दिया है।

बृजेश माथुर | गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

 

स्टारडम का विकल्प

इस बार की आवरण कथा, “दबंग” ने बहुत कुछ बयां कर दिया है। बिहार के चुनाव परिणामों को भुलाया नहीं जा सकता। “तेजस्वी के तेवर” सिर्फ भीड़ खींचने के लिए थे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। निश्चित तौर पर उनका दबदबा था और उनके हाथ से बस बाजी फिसल गई। बिहार में भाजपा की रैलियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि मोदी है तो मुमकिन है। आखिर प्रधानमंत्री होते हुए भी उन्हें इतनी रैलियां क्यों करनी पड़ीं? इस स्टारडम के विकल्प में भाजपा एवं घटक दलों ने अभी तक कुछ नहीं किया है। बिहार और अन्य राज्यों के उपचुनावों ने यह साफ संकेत दे दिया है कि बड़ी-बड़ी बातों का कोई फायदा नहीं होता। विकास ही है, जो काम आएगा।

देवेश त्रिपाठी | संत कबीर नगर, उप्र

 

मेहनत में कमी

आउटलुक में 30 नवंबर की आवरण कथा पढ़ी। आपने आवरण पृष्ठ पर ही मोदी के चित्र के साथ “दबंग” शब्द का इस्तेमाल किया है। हर तरफ कहा भी यही जा रहा है कि यह मोदी का करिश्मा है, लेकिन दूसरे नजरिए से देखा जाए, तो यह नीतीश की कोताही भी है। जब वे जानते थे कि आने वाले चुनाव कठिन होंगे, तो उन्होंने पहले से ही मेहनत करना शुरू क्यों नहीं किया। लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूरों पर उनके बयान ने और उनके रवैए ने भी उनका बहुत नुकसान किया। उनकी छवि सुशासन बाबू की थी। अगर वे दिल से मेहनत करते, तो उन्हें और उनकी पार्टी को इतना नुकसान नहीं उठाना पड़ता।

राजेश्वर पांडे | आरा, बिहार

 

मोदी का करिश्मा

30 नवंबर के अंक में बिहार चुनावों में भाजपा की सफलता और राजद के पिछड़ने का बहुत अच्छा विश्लेषण किया गया है। नतीजे सभी के लिए अप्रत्याशित थे क्योंकि एक्जिट पोल कुछ और ही कहानी कह कह रहे थे। लेकिन इन सबके बीच भी बाजी भारतीय जनता पार्टी के हाथ ही लगी। यह वाकई मोदी का करिश्मा है, जो भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन गए हैं, क्योंकि चाहे जो हो, बागडोर तो भाजपा के हाथ में ही रहेगी। अब पार्टी को चाहिए कि वह बिहार के मूल मुद्दों पर ध्यान दे और वहां मूलभूत सुविधाओं के लिए काम करे।

आशालता नेगी | सुल्तानपुर, उप्र

 

असली नायक

30 नवंबर अंक में, “तेजस्वी की आगे की राह” पढ़ कर लगा कि इस लेख को तेजस्वी यादव को एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। लेखक ने सही लिखा है कि उन्हें आने वाले साल में, ईमानदारी, संवेदनशीलता और रचनात्मकता लानी होगी। क्योंकि उनके माता-पिता का कार्यकाल हमेशा उनके सामने रोड़ा बन कर खड़ा रहेगा। तेजस्वी को मोदी ब्रांड राजनीति का भी विकल्प तलाशना होगा। वह अभी युवा हैं और उनमें बहुत जोश भी है। उम्मीद है कि वे जल्द ही लोकप्रिय जननेता के रूप में अपनी जगह बना लेंगे। अगर वे अपने साथ ऐसे ही युवाओं को जोड़े रख पाते हैं, तो अगली बार उन्हें सफल होने से कोई नहीं रोक पाएगा। इस चुनाव में देखा जाए तो असली नायक के रूप में तो तेजस्वी उभरे हैं, क्योंकि बाकी तो घुटे हुए नेता थे। एक वही अकेले थे, जिन्होंने अपने दम पर शानदार शुरुआत की।

ब्रजमोहन शर्मा | सिरौंज, मप्र

 

तेजस्वी का परचम

30 नवंबर की आवरण कथा, “बिहार के बड़के भैया कौन” ने बिहार चुनाव की बहुत अच्छी समीक्षा की है। युवा तेजस्वी इस चुनाव के नतीजों में भले ही पिछड़ गए हों, लेकिन इतना तो तय है कि उन्होंने अपना परचम लहरा दिया है। अब बिहार की राजनीति में वह स्थापित नेता बन गए हैं क्योंकि उन्होंने अपने बूते बड़ी टक्कर दी। उन्होंने न सिर्फ युवाओं में जोश भरा, बल्कि अपने माता-पिता के कार्यकाल की खराब छवियों को बहुत हद तक मिटा दिया। अगर वे इसी तरह लगातार पांच साल मेहनत करते रहे, तो यकीनन बिहार के अगले मुख्यमंत्री वही होंगे। देश को ऐसे ही युवा नेताओं की जरूरत है।

यश माथुर | दिल्ली

 

कांग्रेस सोचे आगे की

कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल ने बिहार चुनाव में पार्टी के बेहद खराब प्रदर्शन के बहाने शीर्ष नेतृत्व पर करारा हमला बोला है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पार्टी ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपनी नियति मान ली है। इस बार बिहार चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। “कांग्रेस कमजोर कड़ी” (30 नवंबर) लेख में इसे बहुत अच्छी तरह समझाया गया है। बिहार कांग्रेस के बड़े नेता तारिक अनवर ने भी कहा कि बिहार चुनाव परिणाम पर पार्टी के अंदर मंथन होना चाहिए। उधर, आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने इशारों-इशारों में कह दिया कि कांग्रेस देशभर में अपने गठबंधन सहयोगियों पर बोझ बनती जा रही है और उसकी वजह से हर जगह गठबंधन का खेल खराब हो रहा है। इतना कुछ होने के बाद भी कांग्रेस यानी गांधी परिवार जाग नहीं रहा है। अब कांग्रेस को राहुल गांधी के अलावा भी सोचना होगा, तभी बात बनेगी। इससे पहले कि देर हो जाए या कांग्रेस की अंदरूनी कलह के कारण देश की सबसे पुरानी पार्टी में विद्रोह हो, उसे गंभीरता से स्थिति के बारे में विचार करना चाहिए।

प्रदीप कुमार दुबे | देवास, मप्र

 

परिणाम के बाद

आउटलुक  ने बिहार चुनाव परिणामों पर बहुत अच्छी जानकारी दी। इसमें भाजपा की जीत, जद-यू के पिछड़ने और तेजस्वी के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच न पाने के बारे में अच्छे विश्लेषण थे। अब जब चुनाव परिणाम आ चुके हैं, मीडिया से अपेक्षा रहती है कि वह उस राज्य की वास्तविक परेशानियां बताती हुई रिपोर्ट लाएं, क्योंकि चुनाव के दौरान हर पार्टी और उनके उम्मीदवार बड़े-बड़े दावे करते हैं। बिहार चुनाव में रोजगार बड़ा मुद्दा था, फिर भी दस लाख नौकरियां देने का वादा करने वाले तेजस्वी सरकार नहीं बना पाए। क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि रोजगार के नाम पर हो-हल्ला मचाने वाली पीढ़ी भी मतदान के वक्त इस मुद्दे को गैरजरूरी मानती है? सरकारी नौकरियों की तो बात ही न करें, अब महामारी के बाद प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों पर भी बड़ा सकंट है। इससे उबरना होगा।

विमल नारायण खन्ना | कानपुर, उप्र

 

 

इतिहास का आईना

मेरे ख्यातिप्राप्त मालिक,

मैं प्रयास करूंगा, किसी की भी साख गिराए बगैर महामहिम को अपने बारे में बताऊं। अपने यह भेद मैं आपको बता रहा हूं। फिर यह आपके अधिकार में है कि जब भी सही समय हो आप इन सभी निम्नलिखित बातों को प्रभावी ढंग से सामरिक गतिविधियों में काम में लें। सभी बातें, नीचे सूचीबद्ध हैं:

मेरे पास बहुत हल्के, मजबूत और आसानी से कहीं भी ले जाने योग्य पुलों की योजना है, ताकि किसी अवसर पर दुश्मन या अन्य लोगों को भगाया जा सके। ये न तो आग से नष्ट होंगे न युद्ध में। इन पुलों को उठाना और कहीं भी रखना आसान और सुविधाजनक है। यह शत्रु को नष्ट करने और जलाने का साधन भी हैं...

मेरे पास तोप भी हैं, जो बहुत ही सुविधाजनक और आसानी से कहीं भी ले जाई जा सकती हैं। इसके जरिए फेंके जाने वाले पत्थर लगभग ओलों की मार की तरह लगेंगे और इससे उठने वाला धुंआ दुश्मनों में भय पैदा करेगा और उन्हें गंभीर क्षति पहुंचा कर कुछ भी सोचने-समझने नहीं देगा... इसके अलावा मैं सुरक्षित और अभेद्य, ढंके हुए वाहन बनाऊंगा, जो दुश्मन और उनके असलहे में घुस जाएंगे। कोई भी बंदूकधारी इतना हिम्मती नहीं, जो इसके सामने घुटने न टेक पाए। इसके बाद बिना जख्मी हुए, बिना रुके पैदल सेना आसानी से उन तक पहुंच जाएगी...

शांति के समय में मेरा मानना है कि मैं वास्तुकला के क्षेत्र में किसी भी अन्य के मुकाबले, सार्वजनिक और निजी, दोनों इमारतों का निर्माण बेहतर ढंग से कर सकता हूं और पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकता हूं।

इसके अलावा मैं संगमरमर, कांस्य और मिट्टी की मूर्तियां भी बना सकता हूं। मैं किसी भी दूसरे की तरह हरसंभव कोशिश कर सकता हूं और साथ ही जो भी हो सकता है...

बहुमुखी प्रतिभा के धनी लियोनार्डो द विंची ने 1482 में मिलान के ड्यूक से नौकरी मांगी। उनके आवदेन का संक्षिप्त रूप

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