लाहौल स्पीति: बदली-बदली सी है फिजा

शिमला से अश्विनी शर्मा
अटल सुरंग के मुहाने का नजारा
अटल सुरंग के मुहाने का नजारा

शिमला से अश्विनी शर्मा
अटल रोहतांग सुरंग से अब बर्फबारी के दौरान भी लाहौल स्पीति बाकी दुनिया से जुड़ा रहेगा, लोगों की आवाजाही के साथ कृषि उपज को बाजार पहुंचाना भी हुआ आसान लेकिन पर्यटकों की भारी आमद से चिंता

हिमाचल प्रदेश में ऊंचाई वाले जनजातीय इलाके लाहौल स्पीति और केंद्र शासित प्रदेश लेह-लद्दाख में सर्दियों ने दस्तक दे दी है। लेकिन हर साल की तरह लाहौल स्पीति के लोग अपना गांव-घर छोड़कर कुल्लू-मनाली रवाना नहीं हो रहे हैं, जहां यहां की करीब 32,000 आबादी में अधिकांश लोगों का सर्दियों का घर है। यह रवायत दशकों से चली आ रही थी, लेकिन इस साल 3 अक्टूबर को प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी के 9.02 किमी. की दुनिया की सबसे लंबी अटल सुरंग के उद्घाटन के साथ बदल गई। इससे समुद्र तल से 13,059 फुट ऊंचाई पर बसा यह इलाका दुनिया से जुड़ गया, जो सर्दियों में बर्फबारी से दुर्गम रोहतांग दर्रे के बंद हो जाने से कट जाता था।

भारतीय सेना के सीमा सड़क संगठन के 32,000 करोड़ रुपये की लागत से बनाए इस सुरंग से लाहौल-स्पीति, पांगी (चंबा जिले का लैंडलॉक क्षेत्र) के लोगों का वर्षों पुराना सपना सच हो गया है। सेना की वैकल्पिक सुरक्षित मार्ग की प्रतीक्षा भी पूरी हो गई है।

दरअसल रोहतांग दर्रे के नीचे सुरंग बनाने का विचार 1962 के चीन युद्घ के बाद से ही शुरू हो गया था। फिर, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यहां के दौरे पर आईं तो स्पीति में सुरंग के लिए सर्वेक्षण कराया गया। आखिरकार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में 2002 में इसकी मंजूरी दी गई। वाजपेयी ने अपने मित्र, इस इलाके के प्रतिष्ठित नेता ताशी दावा को इसके लिए आश्वस्त किया था। हालांकि सुरंग की आधारशिला यूपीए सरकार में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 2010 में रखी।

स्‍थानीय लोगों के जीवन में वाकई सुरंग बहार बनकर आई है लेकिन पर्यटकों की भारी आमद से पर्यावरण और संस्कृति को लेकर कुछ चिंताएं भी घर करने लगी हैं। दरअसल सुरंग से मनाली और केलांग के बीच 46 किलोमीटर की दूरी आसान हो गई है, जो लाहौल-स्पीति का जिला मुख्यालय है। सुरंग से पहला सफर उस विशेष बस का था, जिसमें 15 यात्रियों के साथ ताशी दावा के बेटे रामदेव कपूर सवार थे। पुराने दिनों की कठिनाइयों को याद करके कपूर आउटलुक से कहते है, “बचपन में मैंने एक बार मनाली से अपने चाचा के साथ लाहौल के लिए चलना शुरू किया था। रोहतांग दर्रे पर कम से कम 30 फुट बर्फ थी। हमारे पास कुछ खच्चरों पर सामान भी था। इस बीच बर्फीला तूफान आया तो हमें एक चट्टान की गुफा के अंदर शरण लेनी पड़ी।” इन दुर्गम रास्तों पर लाहौल-स्पीति के न जाने कितने लोग, सड़क निकासी कारीगर और सेना के जवान मौत को गले लगा चुके हैं। उन्हीं पीड़ाजनक यादों के चलते अटल सुरंग से क्षेत्र की उम्मीदें काफी हैं।

लाहौल-स्पीति के लोगों को आवागमन दुरुस्त होने से यहां की नकदी फसलों, विदेशी सब्जियों, और कुछ समय पहले शुरू हुई सेब की बागवानी की उपज बाजार तक पहुंचाना भी आसान हो गया है। इन वर्षों में वहां नकदी फसलों की नई क्रांति आ गई है। जनजातीय मामलों के मंत्री तथा स्थानीय विधायक डॉ. रामलाल मार्कंडा कहते हैं कि इससे पहले मटर, फूलगोभी और आलू, हॉप्स, फूल और सेब बर्फबारी के दौरान कई बार खेत में या ट्रकों में ही सड़ जाते थे। यह क्षेत्र अपनी जलवायु के कारण चिकित्सकीय जड़ी-बूटियों और मसालों की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है। हींग की खेती के लिए पहले ही पालमपुर में हिमालयन बॉयो-सोर्सेस टेक्नोलॉजी संस्थान कार्यरत है।

लाहौल-स्पीति के डिप्टी कमिश्नर पंकज राय भी इससे सहमत हैं, “आर्थिक गतिविधियों या पर्यटन विकास की योजनाएं स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ तैयार की जाएंगी। आदिवासियों की एक अलग प्रेम शैली और संस्कृति है। हम देखेंगे कि उनकी संस्कृति पर किसी तरह की आंच न आए।”

पर्यावरण और संस्कृति रक्षा की चिंताओं की वजहें भी हैं। पिछले एक महीने में लाहौल घाटी में पर्यटकों की बेरोकटोक आवाजाही बढ़ गई है। इससे स्थानीय लोगों में गुस्सा है। इस तरह का पर्यटन स्थानीय पर्यावरण के लिए खतरा है। स्‍थानीय लोगों को डर है कि सुरंग कहीं वरदान के बदले अभिशाप न बन जाए।

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