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पर्वतारोहण/के-2: शिखर पर पताका

विश्व की दूसरी सबसे ऊंची और दुर्गम चोटी, पीओके स्थित के-2 पर खतरनाक सर्दियों में पहली बार नेपाली शेरपाओं ने विजय पताका फहरा कर इतिहास रच दिया
सर्दियों में दुनिया की सबसे खतरनाक के-2 चोटी फतह करने वाली नेपाली शेरपा टोली

पहाड़ों के प्रति पर्वतारोहियों का प्रेम काफी डरावना होता है। एक समय आल्प्स की मैटरहॉर्न और आइगर जैसी अल्पाइन की चोटियों को ड्रैगन का निवास माना जाता था, लेकिन 1850 और 1860 के दशक में उस समय के अग्रणी पर्वतारोही उन पर भी पहुंच गए। बाद की पीढ़ियों ने हर संभव चट्टानी रास्तों पर चढ़ाई की। उनमें दुर्गम चोटियों पर जाने की प्रतिस्पर्धा भी थी। बीसवीं सदी की शुरुआत से जब पर्वतारोहियों में हिमालय की ऊंची चोटियों को लेकर प्रेम पनपा, तो यहां भी वही प्रतिस्पर्धा दिखी। 1950 में अन्नपूर्णा की चोटी पर पहुंचने के बाद पर्वतारोही जल्दी ही दूसरी चोटियों पर भी पहुंच गए। एवरेस्ट और नंगा पर्वत पर 1953 में, के-2 पर 1954 में और कंचनजंगा पर 1955 में।

लेकिन एक चोटी ऐसी है, जो खासकर सर्दियों में इस साल 16 जनवरी तक पर्वतारोहियों के लिए दुसाध्य बनी हुई थी। वह चोटी है कराकोरम की के-2, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित है। 16 जनवरी की शाम तीन अलग-अलग पर्वतारोही टोलियों के 10 नेपाली शेरपाओं का दल दुनिया में दूसरी सबसे ऊंची और सर्दियों में सबसे खतरनाक के-2 पर विजय पताका फहरा दिया। जो था। नेपाल स्थित सेवन समिट ट्रेक (एसएसटी) के पर्वतारोहण अभियान के टीम लीडर छंग दावा शेरपा ने उस शाम फेसबुक पेज पर ऐलान किया कि के-2 चोटी (8,611 मीटर ऊंची) पर स्‍थानीय समय शाम 5 बजे विजय पा लिया गया है। उन्होंने लिखा, "हमने कर दिखाया, यकीन मानिए, हमने कर दिखाया। सर्दियों के सबसे खतरनाक मौसम में काराकोरम की सबसे दुर्गम चोटी पर विजय पा लिया।"

पर्वतारोहण दिग्गज निर्मल निम्स पुरजा ने उसी शाम सोशल मीडिया पर लिखा, "असंभव संभव हुआ! सर्दियों में के-2! मानव जाति के लिए, नेपाल के लिए इतिहास रच दिया गया!" दरअसल अमेरिकी पर्वतारोही एलन आर्नेट के-2 (या गॉडविन ऑस्टिन) पर पहुंचने की मुश्किलों को बयां करते हुए कहते हैं, "सर्दियों में वहां सिर्फ ठंड, ठंड, ठंड और बर्फीली हवा होती है।" के-2 दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है। कुछ लोग इसे 'हिमालय का आखरी मुकाम' बताते हैं तो कुछ के लिए यह 'पर्वतारोहण का सबसे बड़ा इनाम' है। कई पर्वतारोही 1987 से सर्दियों में इस पर पहुंचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नाकाम रहे। 8000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली दुनिया में 14 चोटियां हैं। के-2 एकमात्र चोटी है जिस पर सर्दियों में अभी तक कोई नहीं पहुंच सका था।

पिछले साल महामारी के कारण पर्वतारोहण के तीन सीजन गर्मी, शरद और वसंत यूं ही निकल गए। इसने दुनियाभर के पर्वतारोहियों में एक तरह की जिद पैदा कर दी कि वे 2020 को पूरी तरह खाली नहीं जाने देंगे। इसलिए 15 देशों के 60 से अधिक पर्वतारोही के-2 पर चढ़ने के लिए एक बार फिर दिसंबर के मध्य में पाकिस्तान पहुंचे। ये चार अलग-अलग टीमों के थे।

के-2 पर जाने की मुश्किलों के बारे में आर्नेट आउटलुक से कहते हैं, "शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस कम तापमान पर चलने वाली बर्फीली हवा से कई तरह की समस्याएं होती हैं। अगर बर्फ अधिक हुई तो हिमस्खलन का खतरा रहता है। चट्टान भी गिर सकती है। के-2 पर अनेक ढीली चट्टानें हैं। उनसे सावधान रहने की जरूरत है, ताकि वे नीचे दूसरे पर्वतारोहियों पर न गिर पड़ें।" आर्नेट ने 2011 में माउंट एवरेस्ट और 2014 में के-2 पर चढ़ाई की थी। ऐसा करने वाले वे सबसे अधिक उम्र के अमेरिकी हैं। के-2 पर जाने के इस नए अभियान को वे सर्दियों का सबसे बड़ा अभियान बताते हैं। वे कहते हैं कि आमतौर पर सर्दियों में के-2 पर जाने वाली टीम में 10 पर्वतारोही होते हैं। यह चोटी काफी जानलेवा साबित होती रही है। इस पर 400 से भी कम पर्वतारोही पहुंच पाए और 86 की मौत हो चुकी है। दो दर्जन पर्वतारोहियों की जान तो उतरते समय गई। 2008 में यहां हिमस्खलन में 14 लोगों की मौत हो गई थी। उसे हॉलीवुड की फिल्म द समिट में फिल्माया भी गया था।

के-2 के विपरीत दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर जाना अब पर्यटन जैसा हो गया है। यहां हर साल पर्वतारोहियों का जमावड़ा लगता है। गंभीर पर्वतारोही इसके खिलाफ हैं। लेकिन सबसे कठिन चोटियों में एक के-2 पर जाने का साहस कम लोग ही करते हैं। एवरेस्ट पर रिकॉर्ड 24 बार चढ़ने वाले कामी रीता शेरपा ने नेपाल से आउटलुक को बताया, "इसे जानलेवा पर्वत भी कहा जाता है। यह दुनिया के सबसे खतरनाक पर्वतों में एक है।" कामी इस अभियान का हिस्सा नहीं थीं। उन्होंने के-2 पर गर्मियों में चढ़ाई की थी।

इस अभियान के चार टीमों में एक आइसलैंड और पाकिस्तान के तीन सदस्यों की टीम, शेरपा के तीन सदस्यों की टीम, नेपाल और इंग्लैंड के सात सदस्यों की टीम शामिल थी। चौथी टीम में 50 से ज्यादा लोग थे। इनमें आधे से ज्यादा शेरपा और बाकी अलग-अलग देशों के पर्वतारोही थे। यह सर्दियों में के-2 पर चढ़ने का अब तक का सबसे बड़ा अभियान था।

आइसलैंड के जॉन स्नोरी ने पिछली सर्दियों में भी के-2 पर चढ़ने की कोशिश की थी। तब उनकी टीम में मिंगमा जी. शेरपा भी थे। इस बार उन्होंने पाकिस्तान के जाने-माने पर्वतारोही मोहम्मद अली सदपरा और उनके बेटे साजिद के साथ टीम बनाई। मिंगमा जी. तीन शेरपा वाली टीम की अगुआई कर रहे थे। उनके साथ दावा तेनजिंग शेरपा और किली पेंबा शेरपा थे। 8000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली 14 चोटियों में से 13 पर मिंगमा जी पहुंच चुके हैं। एवरेस्ट पर पांच बार, मानसलू पर चार बार और के-2 पर दो बार।

सात सदस्यों वाले दल का नेतृत्व निर्मल निम्स पुरजा कर रहे थे। नेपाली नागरिक निर्मल पहले ब्रिटिश आर्मी में थे। पर्वतारोहण के लिए उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी थी। 2019 में 8000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली सभी 14 चोटियों पर सिर्फ छह महीने में चढ़कर उन्होंने दुनिया के सभी पर्वतारोहियों को चौंका दिया था। ये सभी चोटियां हिमालय में हैं। उनसे पहले यह रिकॉर्ड आठ साल में बना था। पुरजा की टीम में मिंगमा डेविड शेरपा, दावा तेम्बा शेरपा, पेमछिरी शेरपा, गेलजे शेरपा, मिंगमा तेनजी शेरपा और सेंड्रे ग्रोमन हायस हैं। मिंगमा डेविड सभी 14 चोटियों पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के पर्वतारोही हैं। गेलजे ने इनमें से 10 पर चढ़ाई की है।

शेरपा कभी हिमालय में पश्चिमी देशों के पर्वतारोहियों के लिए सामान लाने-ले जाने का काम करते थे। अब वे जाने-माने गाइड और खुद पर्वतारोही बन गए हैं। मिंगमा जी. और पुरजा की टीम ने इस अभियान के लिए क्लाइंट के तौर पर किसी पर्वतारोही को नहीं रखा। एसएसटी की टीम का अभियान कॉमर्शियल था। इस टीम में शामिल पश्चिमी देशों के पर्वतारोहियों की शेरपा मदद करेंगे, जैसे स्नोरी की मदद सदपरा कर रहे हैं।

बेस कैंप से लेकर शिखर तक चार ठहराव होते हैं। पहला कैंप 6050 मीटर की ऊंचाई पर, दूसरा 6700 मीटर, तीसरा 7250 मीटर और चौथा 7950 मीटर की ऊंचाई पर। खुद को वहां की परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए आमतौर पर पर्वतारोही बेस कैंप से पहले कैंप तक जाते हैं और फिर लौट आते हैं। उसके बाद दूसरे या तीसरे कैंप तक जाते हैं और फिर वहां से लौट आते हैं। इस अभ्यास के बाद ही वे बेस कैंप से शिखर की चढ़ाई करते हैं। इस अभ्यास के दौरान वे कैंप बनाते हैं, वहां अपने औजार रखते हैं और आखिरी चढ़ाई के लिए रस्सियां बांधते हैं। इस वर्ष खराब मौसम के कारण 10 जनवरी तक कोई भी टीम तीसरे कैंप से ऊपर रस्सियां नहीं बांध सकी थी।

शिखर से सुरक्षित उतारना चढ़ने से कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। इस बार की चारों टीमों में कई शेरपा थे, जो पहले काफी ऊंचाई पर बचाव कार्य कर चुके हैं। लेकिन फतह सारी मुश्किलों पर भारी है।

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